बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कटिहार जिले की कदवा सीट एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प मुकाबला पेश कर रही है। यह सीट वर्तमान में महागठबंधन (कांग्रेस) के मजबूत नेता डॉ. शकील अहमद खान के पास है, जिन्होंने लगातार दो बार (2015 और 2020) जीत दर्ज की है। एनडीए इस बार पूर्व सांसद दुलाल चंद्र गोस्वामी (JDU/NDA) को उतारकर इस सीट को वापस पाने के लिए बड़ी रणनीति बना रही है।
ऐतिहासिक और जातीय समीकरणों के गहन विश्लेषण के आधार पर, मुकाबला कड़ा है, लेकिन डॉ. शकील अहमद खान के जीतने की संभावना अधिक है।
विजेता की संभावित जीत के पक्ष में विश्लेषण (महागठबंधन – डॉ. शकील अहमद खान)
संभावित विजेता: डॉ. शकील अहमद खान (कांग्रेस)
1. “MY” (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर मजबूत पकड़:
- अल्पसंख्यक बाहुल्य सीट: कदवा विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिशत काफी अधिक (अनुमानित 32% या उससे अधिक) है, जो इस सीट पर जीत के लिए निर्णायक साबित होता है।
- व्यक्तिगत जनाधार: डॉ. शकील अहमद खान की छवि एक शिक्षित और जमीनी नेता की है, जिसके कारण उन्हें न केवल मुस्लिम समुदाय का एकमुश्त समर्थन मिलता है, बल्कि वे अन्य समुदायों के बीच भी स्वीकार्य हैं।
- महागठबंधन की एकजुटता: महागठबंधन (RJD+INC) के MY समीकरण के बल पर उन्हें एक मजबूत वोट आधार मिलता है, जिसे तोड़ना एनडीए के लिए अत्यंत कठिन है।
2. 2020 की निर्णायक जीत और “एंटी-इनकम्बेंसी” का अभाव:
- बड़ा जीत का अंतर: 2020 के चुनाव में, शकील अहमद खान ने LJP (जो तब NDA से अलग थी) के चंद्र भूषण ठाकुर को 32,402 वोटों के भारी अंतर से हराया था। यह जीत उनकी लोकप्रियता और मजबूती का स्पष्ट प्रमाण है।
- एनडीए की आंतरिक कलह का लाभ: पिछली बार यह सीट JDU के खाते में गई थी, जिसके कारण BJP के मजबूत स्थानीय नेता और पूर्व प्रत्याशी चंद्र भूषण ठाकुर ने बागी होकर LJP से चुनाव लड़ा और एनडीए के वोट को काट दिया। इस ‘बागी फैक्टर’ का सीधा लाभ शकील अहमद खान को मिला।
3. निषाद समुदाय में भी घुसपैठ की संभावना:
- कुछ विश्लेषणों के अनुसार, कदवा सीट पर अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और दलितों की भी अच्छी संख्या है, जिसमें मखाना किसान भी शामिल हैं। शकील खान को EBC समुदाय के कुछ हिस्सों में भी समर्थन मिलता रहा है, जिससे उनका आधार और मजबूत होता है।
अन्य उम्मीदवार की संभावित हार के प्रतिकूल तथ्य (NDA – दुलाल चंद्र गोस्वामी)
संभावित उपविजेता: दुलाल चंद्र गोस्वामी (JDU/NDA)
1. कमजोर जातीय समीकरण और ‘गोस्वामी दांव’ का जोखिम:
- मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण: चूंकि यह सीट मुस्लिम बाहुल्य है, इसलिए NDA का उम्मीदवार (जो इस बार JDU के दुलाल चंद्र गोस्वामी हैं) मुस्लिम समुदाय का वोट हासिल करने में मुश्किल का सामना करेगा।
- पुराना ‘बागी’ घाव: 2020 में JDU को यह सीट देने के कारण स्थानीय BJP कैडर में गहरा आक्रोश था, जिसका परिणाम बागी चंद्र भूषण ठाकुर की 38,865 वोट हासिल करने में दिखा। हालाँकि इस बार JDU ने पूर्व सांसद दुलाल चंद्र गोस्वामी को उतारकर एक मजबूत दांव चला है, लेकिन स्थानीय BJP कार्यकर्ता दुलाल गोस्वामी (JDU) को दिल से स्वीकार करेंगे या नहीं, यह एक बड़ा जोखिम है।
2. मुख्य आधार वोट का बिखराव (EBC/OBC):
- दुलाल चंद्र गोस्वामी (JDU) OBC या EBC समुदाय से आते हैं, और JDU को उम्मीद है कि वह नीतीश कुमार की EBC/पिछड़ा वर्ग वाली छवि का लाभ उठाएंगे। हालांकि, इस क्षेत्र में AIMIM जैसी पार्टियों की मौजूदगी EBC और मुस्लिम वोटों को विभाजित कर सकती है, जिससे एनडीए का लाभ होने के बजाय कांग्रेस को लाभ हो सकता है।
- 2020 में, JDU के सूरज प्रसाद राय तीसरे स्थान पर रहे थे, जिससे पता चलता है कि एनडीए का वोट दो हिस्सों में बंटा था। इस विभाजन को पूरी तरह से रोकना दुलाल गोस्वामी के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
3. स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा:
- डॉ. शकील अहमद खान की छवि क्षेत्र में लंबे समय से स्थापित है, जबकि दुलाल चंद्र गोस्वामी पूर्व सांसद होने के बावजूद, उन्हें विधानसभा स्तर पर शकील खान जैसा सीधा जुड़ाव दिखाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ेगी।
निष्कर्ष
कदवा सीट पर डॉ. शकील अहमद खान (कांग्रेस) की जीत की संभावना अधिक है, जिसका मुख्य आधार उनका मजबूत मुस्लिम जनाधार और महागठबंधन का MY समीकरण है। उन्हें 2020 में एनडीए के वोट विभाजन से भारी बढ़त मिली थी। एनडीए के लिए यह सीट जीतना तब तक मुश्किल होगा जब तक कि वह अपने पारंपरिक वोट बैंक (EBC, सवर्ण) को पूरी तरह एकजुट नहीं कर लेता और साथ ही मुस्लिम वोट में एक बड़ी सेंध नहीं लगा लेता। एनडीए के दुलाल चंद्र गोस्वामी के लिए सबसे बड़ी चुनौती एनडीए के भीतर के बागियों को साधने और डॉ. शकील अहमद खान के भारी व्यक्तिगत जनाधार को भेदने की होगी।
