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कांटी का संग्राम 2025: राजनीति, विकास और जनता की उम्मीदें — एक महागाथा

कांटी विधानसभा क्षेत्र, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से अस्थिर सीटों में से एक है। यहां सत्ता परिवर्तन का सिलसिला हर चुनाव में देखने को मिलता है। औद्योगिक पहचान रखने वाले इस क्षेत्र की सियासत जातीय समीकरणों, स्थानीय मुद्दों, और नेताओं के वादों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांटी फिर एक बार सुर्खियों में है — जहां राजद के मौजूदा विधायक मोहम्मद इसराइल मंसूरी और बीजेपी-एनडीए गठबंधन के नेता अजीत कुमार के बीच सीधा मुकाबला माना जा रहा है ।​


भूगोल और जनसंख्या

कांटी विधानसभा क्षेत्र (क्रम संख्या 95) मुजफ्फरपुर जिले के औद्योगिक बेल्ट में स्थित है। यहां कांटी थर्मल पावर स्टेशन (NTPC Kanti) और छिन्मस्तिका मंदिर इसकी पहचान हैं। वोटरों के दृष्टिकोण से यह क्षेत्र तीन ब्लॉक — कांटी, सकरा और पारू — से आंशिक रूप से जुड़ा हुआ है ।​

2025 के आंकड़ों के अनुसार कांटी में कुल मतदाता लगभग 3,09,654 हैं। इनमें यादव, राजपूत, कुर्मी, कोइरी, भूमिहार, मुस्लिम और पासवान समुदाय की अहम भूमिका रहती है। यादव और कुर्मी कुल आबादी का लगभग 30% हिस्सा हैं, जबकि भूमिहार और राजपूत समुदाय मिलकर करीब 28% मतदाता आधार रखते हैं। मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 10% है ।​


ऐतिहासिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि

1952 में विधानसभा क्षेत्र के गठन के बाद से कांटी सीट पर कुल 18 बार चुनाव हो चुके हैं। यह सीट अपने राजनीतिक प्रयोगों के लिए प्रसिद्ध रही है। यहां कभी कांग्रेस का बोलबाला था, फिर जनसंघ, जनता दल, जदयू और आरजेडी ने बारी-बारी से जीत दर्ज की है ।​

कांटी का सियासी इतिहास बताता है कि यहां कोई भी दल लगातार दो बार सत्ता में नहीं टिक पाया है। 2010 में जदयू, 2015 में निर्दलीय, और 2020 में राजद ने जीत दर्ज की — यानी हर चुनाव में जनता ने नया नेता चुना ।​


2020 का विधानसभा परिणाम

2020 के चुनाव में कांटी विधानसभा का परिणाम बेहद रोचक रहा।

यह परिणाम दर्शाता है कि कांटी की जनता बार-बार स्थानीय उम्मीदवारों को प्राथमिकता देती है, और जातीय के बजाय क्षेत्रीय विकास को मुद्दा बना रही है।


प्रमुख राजनीतिक चेहरे

  1. मोहम्मद इसराइल मंसूरी (आरजेडी) – मौजूदा विधायक, जिन्होंने 2020 में बड़ी जीत दर्ज की। वे शिक्षा और अल्पसंख्यक कल्याण से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दे रहे हैं।

  2. अजीत कुमार (बीजेपी गठबंधन) – पूर्व मंत्री और क्षेत्र के प्रभावशाली नेता। उन्होंने कई बार निर्दलीय के रूप में अपनी पहचान स्थापित की और बिजली, रोजगार, तथा औद्योगिक पुनरुद्धार पर जोर दिया ।​

  3. अशोक कुमार चौधरी (पूर्व निर्दलीय विजेता) – 2015 में उन्होंने निर्दलीय रूप में जीत दर्ज की थी, जब उन्होंने हम पार्टी के प्रत्याशी अजीत कुमार को हराया था।

  4. मो. जमाल (जदयू) – 2020 में तीसरे स्थान पर रहे, परंतु अब एनडीए गठबंधन के तहत भाजपा-जदयू के साथ फिर मैदान में दिख रहे हैं ।​


जातीय समीकरण और सामाजिक विशेषताएं

कांटी में जातीय समीकरण हर चुनाव का मुख्य निर्धारक रहा है।


प्रमुख मुद्दे: जनता की आवाज़

  1. कांटी पावर प्लांट की राख (फ्लाई ऐश) समस्या
    स्थानीय जनता का सबसे बड़ा मुद्दा एनटीपीसी कांटी से निकलने वाली राख और प्रदूषण है। यह राख आसपास के गांवों में फैलकर खेती और स्वच्छता को प्रभावित करती है। ग्रामीणों की मांग है कि राख के निस्तारण की व्यवस्था और मुफ्त बिजली वितरण की वादा पूरा हो ।​

  2. बेरोजगारी और उद्योग ठप
    कांटी का औद्योगिक महत्व घटता गया है। स्थानीय युवक रोजगार के लिए बाहर पलायन कर रहे हैं। 2010 में सरकार ने यहां एक इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की घोषणा की थी, जो अब तक अधूरा है ।​

  3. सड़क और स्वास्थ्य सेवाएं
    ग्रामीण इलाकों में सड़कें जर्जर हैं, और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अव्यवस्थित स्थिति में हैं। खासकर कांटी-सरैया रोड और कांटी-पारू रोड को लेकर लंबे समय से नाराजगी है ।​

  4. नदी कटाव और शिक्षा
    बूढ़ी गंडक नदी के किनारे बसे गांव हर साल बाढ़ से प्रभावित होते हैं। स्कूलों की स्थिति भी चिंताजनक बताई गई है, जहां शिक्षकों की भारी कमी है ।​


विकास योजनाएं और वादे

राज्य सरकार के अंतर्गत कांटी में निम्नलिखित परियोजनाएं चल रही हैं:

लेकिन विपक्ष का आरोप है कि अधिकांश परियोजनाएं केवल कागजों पर सीमित हैं। स्थानीय नागरिक अब काम की अपेक्षा ‘‘नतीजों पर’’ वोट देने की बात करते हैं।


2025 का चुनावी समीकरण

2025 में कांटी का मुकाबला राजनीति की दृष्टि से सबसे पेचीदा माना जा रहा है।

राजद उम्मीदवार इसराइल मंसूरी अपने जनाधार और अल्पसंख्यक समर्थन पर भरोसा कर रहे हैं, जबकि अजीत कुमार अपने वर्षों के राजनीतिक अनुभव और स्थानीय पहचान पर। बीजेपी ने कांटी को ‘‘औद्योगिक पुनर्जागरण’’ का मॉडल घोषित किया है, और मोदी सरकार की नीतियों को प्रमुखता से प्रचारित किया जा रहा है ।​


महिला और युवा मतदाता

कांटी में महिला मतदाताओं का अनुपात पुरुषों से अधिक (लगभग 51.9%) है। 2020 में महिलाओं ने निर्णायक भूमिका निभाई थी, और इस बार भी उनकी प्राथमिकता रोजगार, स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी है।
युवाओं में सरकारी भर्ती और स्टार्टअप योजनाओं को लेकर उत्सुकता है। एनडीए ने इस वर्ग को लुभाने के लिए छात्रवृत्ति और प्रशिक्षण योजनाओं की घोषणा की है ।​


संभावित परिणाम और भविष्यवाणियां

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कांटी में 2025 का चुनाव वोट प्रतिशत और जातीय एकजुटता पर निर्भर करेगा।

  1. यदि यादव-मुस्लिम समीकरण एकजुट रहता है, तो आरजेडी को बढ़त मिल सकती है।

  2. जबकि भूमिहार-राजपूत-कुर्मी समुदाय यदि एनडीए गठबंधन के पक्ष में जाता है, तो चुनाव में पलटवार संभव है ।​
    विश्लेषकों का यह भी मानना है कि कांटी सीट पर हार-जीत का अंतर हमेशा 10–12 हजार के बीच ही रहता आया है।


निष्कर्ष

कांटी विधानसभा सीट बिहार के बदलते राजनीतिक परिदृश्य की जीवंत मिसाल है। यहां की जनता बार-बार सत्ता बदलकर यह संदेश देती है कि ‘‘नेता नहीं, विकास जरूरी है’’।
2025 का यह चुनाव कांटी के लिए निर्णायक साबित हो सकता है — क्या इसराइल मंसूरी जनता के भरोसे को बरकरार रख पाएंगे या अजीत कुमार एक बार फिर रिटर्न करेंगे?
कांटी की यह जंग केवल सत्ता की नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों, औद्योगिक पुनरुत्थान और विकास के असली विमर्श की जंग बन चुकी है ।

 

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