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कुढ़नी का ‘हाई-वोल्टेज’ मुकाबला: क्या NDA दोहराएगा उपचुनाव की जीत या ‘जाति’ और ‘शह-मात’ देगी महागठबंधन को बढ़त?

कुढ़नी विधानसभा सीट बिहार की सबसे चर्चित और कांटे की टक्कर वाली सीटों में से एक है। पिछले तीन चुनावों (2015, 2020 और 2022 उपचुनाव) के परिणाम बताते हैं कि यह सीट किसी एक पार्टी का गढ़ नहीं है, बल्कि यहाँ जीत-हार का फैसला बहुत कम वोटों के अंतर से होता है और जातीय समीकरण तथा निर्दलीय/छोटी पार्टियों की सेंधमारी अत्यंत निर्णायक होती है।

वर्तमान में इस सीट पर भाजपा के केदार प्रसाद गुप्ता का कब्ज़ा है, जिन्होंने के उपचुनाव में महागठबंधन (जदयू) के मनोज कुशवाहा को वोटों से हराया था।

संभावित विजेता: NDA उम्मीदवार (संभावित: भाजपा केदार प्रसाद गुप्ता/नया चेहरा)


NDA (भाजपा) उम्मीदवार की जीत के पक्ष में विस्तृत विश्लेषण और तथ्य:

  1. उपचुनाव की जीत का मनोबल और गठबंधन की मजबूती:
    • 2022 के उपचुनाव में भाजपा ने महागठबंधन (जदयू+राजद) को हराकर यह सीट जीती थी। यह जीत साबित करती है कि भाजपा के पास यहाँ मजबूत कोर वोटबैंक है और वह कठिन परिस्थिति में भी जीत हासिल कर सकती है।
    • 2025 में भाजपा और जदयू का एक साथ चुनाव लड़ना सबसे बड़ा फायदा है। 2022 उपचुनाव में जदयू और भाजपा अलग-अलग थे, जिससे महागठबंधन को नुकसान हुआ। इस बार दोनों के साथ आने से सवर्ण (ब्राह्मण/राजपूत/भूमिहार), कुर्मी/कोईरी और अन्य मजबूत पिछड़ी जातियों का एकजुट वोट NDA को मिलेगा।
  2. सवर्ण और वैश्य वोटबैंक का ध्रुवीकरण:
    • कुढ़नी में सवर्ण और वैश्य समुदाय का वोट बैंक बड़ी संख्या में है, जो पारंपरिक रूप से भाजपा के साथ मजबूती से खड़ा रहता है। यह कोर वोटबैंक, किसी भी बाहरी सेंधमारी के खिलाफ, NDA की नींव है।
  3. विकास और केंद्र सरकार का प्रभाव:
    • शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में केंद्र सरकार की योजनाओं और ‘डबल इंजन’ की बात का प्रभाव मतदाताओं पर पड़ता है। विधायक केदार प्रसाद गुप्ता (जो अब मंत्री भी हैं) के पास अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाने का मौका होगा।
  4. राजद के कोर वोट में सेंध का खतरा कम:
    • यह सीट राजद के लिए सीटिंग सीट (2020 में जीती गई) थी, लेकिन के उपचुनाव में (विकासशील इंसान पार्टी) और जैसे दलों ने के वोटबैंक (खासकर अति-पिछड़ा और मुस्लिम वोट) में सेंध लगाकर महागठबंधन को कमजोर कर दिया था। 2025 में भी यह खतरा महागठबंधन पर बना रहेगा, जबकि NDA का कोर वोट अपेक्षाकृत अधिक एकजुट रहता है।
  5. उम्मीदवार परिवर्तन की संभावना:
    • कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, भाजपा में मौजूदा विधायक केदार प्रसाद गुप्ता के खिलाफ आंतरिक एंटी-इनकम्बेंसी के चलते टिकट कटने की बात चल रही है। अगर पार्टी एक मजबूत और नया चेहरा लाती है, तो जीत की संभावनाएँ और भी बढ़ जाएँगी।

महागठबंधन (राजद/जदयू का प्रतिद्वंद्वी) उम्मीदवार की हार के प्रतिकूल तथ्य और आंकड़े:

यदि यह सीट महागठबंधन के खाते में जाती है (संभावित रूप से राजद या का उम्मीदवार), तो उनके सामने ये चुनौतियाँ होंगी:

  1. बंटे हुए वोट (सबसे बड़ा खतरा):
    • कुढ़नी में निर्णायक संख्या में सहनी, कुशवाहा और यादव मतदाता हैं। 2022 उपचुनाव में वीआईपी ने सहनी वोटों को काटा था, जबकि (कुशवाहा उम्मीदवार) को के वोट मिले थे।
    • 2025 में की एकजुटता: में और के साथ आने से कुशवाहा वोट के पाले में जाने की प्रबल संभावना है, जो महागठबंधन की जीत की रणनीति को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाएगा।
  2. उपचुनाव की हार का विश्लेषण:
    • उपचुनाव में ने को सपोर्ट किया था, फिर भी महागठबंधन हार गया। यह हार केवल नीतीश कुमार की अस्थिरता पर मतदाताओं के नकारात्मक प्रभाव का परिणाम थी। 2025 में भी महागठबंधन की एकजुटता पर सवाल महागठबंधन के लिए एक चुनौती बनी रहेगी।
  3. कमजोर की उपस्थिति:
    • के के विजेता अनिल सहनी की सदस्यता रद्द हो चुकी है, जिसके कारण को नया और उतना मजबूत चेहरा लाना होगा।
  4. निर्णायक फैक्टर:
    • कुढ़नी में (मुकेश सहनी) और (असदुद्दीन ओवैसी) जैसे दलों के उम्मीदवार लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। लगभग वोट तक काटने की क्षमता रखने वाले ये दल मुख्य रूप से महागठबंधन के अति-पिछड़ा (सहनी) और मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाते हैं, जिससे महागठबंधन के उम्मीदवार का जीतना मुश्किल हो जाता है।

निष्कर्ष और पूर्वानुमान:

कुढ़नी विधानसभा की लड़ाई मतदाताओं के बीच सबसे ज्यादा जातीय समीकरणों और पार्टियों की एकजुटता पर निर्भर करेगी।

  • महागठबंधन (RJD/अन्य): तेजस्वी यादव का करिश्मा और (मुस्लिम-यादव) बेस मजबूत है, लेकिन में के शामिल होने से का बड़ा हिस्सा छिटक जाएगा।
  • (BJP+JDU): उपचुनाव में अकेले की जीत, के साथ आने से सवर्ण और वोट का जुड़ना और संगठन की मजबूती को निर्णायक बढ़त देती है।

तमाम समीकरणों और हालिया उपचुनाव के परिणाम को देखते हुए, उम्मीदवार (भाजपा) के इस सीट पर पुनः जीत दर्ज करने की संभावना अधिक है। यह चुनाव और के बीच एक बेहद करीबी मुकाबला होगा, जिसका फैसला जैसे छोटे दलों द्वारा काटे गए वोटों के मार्जिन पर निर्भर करेगा।

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