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गौरा बौराम का महासंग्राम: क्या NDA की स्वर्णा सिंह फिर तोड़ पाएंगी महागठबंधन का MY समीकरण?

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में दरभंगा जिले की गौरा बौराम सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय से सीधा होने की संभावना है, लेकिन जातीय समीकरण और पिछले चुनावी रुझान NDA के पक्ष में संकेत दे रहे हैं।

संभावित विजेता: स्वर्णा सिंह (भारतीय जनता पार्टी – BJP) – NDA गठबंधन

विधायक स्वर्णा सिंह ने 2020 में VIP के टिकट पर जीत हासिल की थी और बाद में भाजपा में शामिल हो गईं। मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और पिछले परिणामों के विश्लेषण के आधार पर, उनका पलड़ा भारी दिख रहा है।


स्वर्णा सिंह (BJP) की जीत के पक्ष में विस्तृत विश्लेषण और तथ्य:

  1. शक्तिशाली NDA गठबंधन का समर्थन:
    • स्वर्णा सिंह 2020 में भले ही VIP के टिकट पर जीती थीं, लेकिन अब वह NDA के प्रमुख घटक भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सदस्य हैं। यह उन्हें NDA के कोर वोट बैंक (सवर्ण, वैश्य, OBC का बड़ा हिस्सा) के साथ-साथ पारंपरिक सहनी (मल्लाह) वोट (जो उन्होंने 2020 में VIP से लड़ा था) का भी लाभ दिलाएगा।
    • 2024 लोकसभा चुनाव में बड़ी बढ़त: इस विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को 20,986 वोटों की अच्छी खासी बढ़त मिली थी। यह मजबूत रुझान 2025 के विधानसभा चुनाव में NDA को बड़ी ताकत देगा।
  2. विधायक के रूप में कार्य (एंटी-इनकम्बेंसी से मुकाबला):
    • गौरा बौराम बाढ़ प्रभावित दियारा क्षेत्र है। विधायक के रूप में स्वर्णा सिंह ने पिछले 5 वर्षों में विकास कार्यों पर विधायक निधि से पर्याप्त खर्च किया है (जैसे सड़क निर्माण, आंबेडकर छात्रावास, अनुमंडल अस्पताल का निर्माण)। यह विकास कार्य उन्हें एंटी-इनकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) से निपटने में मदद कर सकता है।
  3. जातिगत समीकरण (संतुलन):
    • गौरा बौराम में मुस्लिम (लगभग 24.80%) और अनुसूचित जाति (लगभग 17.41%) के मतदाता निर्णायक हैं। RJD का MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण यहाँ प्रभावी है, लेकिन स्वर्णा सिंह सहनी (अति पिछड़ा वर्ग) समुदाय से हैं, और भाजपा का पारंपरिक सवर्ण/वैश्य वोट बैंक मिलकर, महागठबंधन के आधार को चुनौती देने के लिए पर्याप्त साबित हो सकता है।

अन्य उम्मीदवार (अफजल अली खान/संतोष सहनी – महागठबंधन) की हार के प्रतिकूल तथ्य और आंकड़े:

महागठबंधन (RJD और उसके सहयोगी) के लिए यह सीट एक चुनौती बनी हुई है, खासकर पिछले चुनाव के नतीजों के कारण।

  1. 2020 में करीबी हार का सदमा:
    • 2020 के चुनाव में RJD के अफजल अली खान को VIP की स्वर्णा सिंह से 7,280 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था। अफजल अली खान को 52,258 वोट मिले, जबकि स्वर्णा सिंह को 59,538 वोट। यह बताता है कि महागठबंधन का पारंपरिक MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण इस सीट पर अकेले जीत दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
  2. महागठबंधन में संभावित भ्रम और तालमेल की कमी:
    • इस सीट पर महागठबंधन में शुरुआती दौर में भ्रम की स्थिति दिखी है। अगर RJD और VIP (मुकेश सहनी – अब महागठबंधन का हिस्सा) दोनों उम्मीदवार उतारते हैं (जैसा कि खबरों में संभावित संतोष सहनी बनाम अफजल अली खान का मुद्दा उठा था), तो वोटों का बँटवारा महागठबंधन की हार का सबसे बड़ा कारण बन सकता है। मुस्लिम वोट RJD के अफजल अली खान के पक्ष में जा सकता है, लेकिन सहनी वोट अगर VIP और NDA में बँटते हैं, तो RJD के लिए जीत मुश्किल होगी।
  3. स्थानीय समस्याओं से निपटने में विफलता:
    • यह क्षेत्र बाढ़ और जलजमाव जैसी गंभीर समस्याओं से जूझता रहा है। महागठबंधन की पिछली सरकारें इन मूलभूत समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं कर पाई हैं। विधायक के विकास कार्यों के बावजूद, पीने के पानी और शिक्षकों की कमी जैसी बुनियादी समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं, जिस पर महागठबंधन हमला कर सकता है, लेकिन 2020 की हार का अंतर उनकी कमजोरी को दर्शाता है।

निष्कर्ष और पूर्वानुमान:

गौरा बौराम विधानसभा सीट पर मुकाबला कड़ा रहेगा, क्योंकि मुस्लिम (लगभग 25%) और सहनी (अति पिछड़ा वर्ग) मतदाताओं का झुकाव निर्णायक साबित होगा।

  • NDA की ताकत: 2024 लोकसभा चुनाव की बड़ी बढ़त, स्वर्णा सिंह का सहनी समुदाय पर प्रभाव, और BJP का मजबूत सवर्ण/वैश्य आधार।
  • महागठबंधन की चुनौती: 2020 की हार के बाद, महागठबंधन को जीत सुनिश्चित करने के लिए MY (मुस्लिम-यादव) वोट बैंक को पूरी तरह एकजुट करना होगा और साथ ही अति पिछड़ी जाति के वोट में सेंध लगानी होगी।

पूर्वानुमान: स्वर्णा सिंह (BJP-NDA) को 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली बड़ी बढ़त और NDA की संगठनात्मक ताकत के कारण गौरा बौराम सीट पर एक करीबी जीत मिलने की संभावना है।

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