छठ महापर्व की धूम: देशभर में छठ महापर्व की धूम मची हुई है। लाखों श्रद्धालुओं ने उगते और डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया। विभिन्न राज्यों, खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के घाटों पर आस्था का जनसैलाब उमड़ा।
छठ महापर्व, सूर्य उपासना का एक अनूठा और अत्यंत पवित्र त्योहार है, जिसकी धूम देश भर में, विशेषकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के साथ-साथ दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में भी देखने को मिली। यह पर्व प्रकृति की पूजा, कठोर तपस्या और लोक आस्था का प्रतीक है, जहाँ डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
यह पर्व चार दिनों तक चलता है: नहाय खाय, खरना, संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को) और उषा अर्घ्य (उगते सूर्य को)। इस वर्ष भी, लाखों व्रतियों (महिला और पुरुष) ने बिना अन्न-जल ग्रहण किए (निर्जला व्रत) छठी मैया और सूर्य देव की आराधना की।
आस्था का जनसैलाब
- बिहार और झारखंड: इन राज्यों में छठ पर्व की छटा देखने लायक थी। पटना में गंगा घाटों पर, राँची में तालाबों और नदियों के किनारे, और अन्य शहरों में कृत्रिम घाटों पर भारी भीड़ उमड़ी। पारंपरिक छठ गीत वातावरण को भक्तिमय बना रहे थे। मुख्यमंत्री और राज्यपाल समेत कई बड़े नेताओं ने भी घाटों पर पहुंचकर अर्घ्य दिया।
- उत्तर प्रदेश: लखनऊ में गोमती नदी के तट पर, वाराणसी के गंगा घाटों पर और अन्य शहरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे। सुरक्षा और व्यवस्था के कड़े इंतजाम किए गए थे।
- दिल्ली-एनसीआर: यमुना नदी के किनारे और विभिन्न कॉलोनियों में बनाए गए छठ घाटों पर पूर्वांचल के लोगों का जनसैलाब उमड़ा। दिल्ली में यमुना की सफाई और प्रदूषण को लेकर राजनैतिक बयानबाजी भी खूब हुई, लेकिन इससे श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं आई।
- अन्य शहर: मुंबई के समुद्र तटों से लेकर कोलकाता के तालाबों तक, जहाँ भी पूर्वांचल के लोग बसे हैं, वहाँ इस महापर्व को पूरी श्रद्धा के साथ मनाया गया।
सूर्य को अर्घ्य का महत्व
छठ पर्व में सूर्य को अर्घ्य देने का समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। व्रतियों ने बाँस की टोकरी (सूप) में ठेकुआ, फल और गन्ना सहित पारंपरिक पूजन सामग्री सजाकर, घुटनों तक पानी में खड़े होकर डूबते (संध्या अर्घ्य) और अगले दिन उगते (उषा अर्घ्य) सूर्य को दूध और जल अर्पित किया।
डूबते सूर्य की पूजा इस बात का प्रतीक है कि जीवन का अंत भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उदय। यह हमें सिखाता है कि हर अस्त के बाद एक नया उदय निश्चित है।
यह महापर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह शुद्धता, सादगी और प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का एक अनूठा तरीका भी है। यह पर्व भारतीय लोक संस्कृति को जीवंत बनाए रखता है।
