प्रस्तावना
छठ महापर्व, जिसे सूर्य षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत भारत के कई हिस्सों और प्रवासी भारतीयों के बीच सबसे पवित्र और कठिन त्योहारों में से एक है। यह पर्व सूर्य देवता और छठी मैया (देवी) की आराधना का प्रतीक है। यह एकमात्र ऐसा वैदिक त्योहार है जिसमें उगते और डूबते दोनों सूर्यों को अर्घ्य दिया जाता है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व का आज (28 अक्टूबर 2025) अंतिम और निर्णायक दिन है, जब व्रती (व्रत रखने वाले) उदीयमान सूर्य (Rising Sun) को अर्घ्य देकर अपने 36 घंटे के निर्जला व्रत का पारण करेंगे।
कल शाम (27 अक्टूबर) अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रतियों ने पूरी रात गंगा घाटों और नदी-तालाबों के किनारे या अपने घरों के छठ घाटों पर जागरण किया। अब सारा ध्यान सुबह के स्वर्णिम क्षणों पर केंद्रित है, जब सूर्यदेव अपनी पहली किरण के साथ दर्शन देंगे और व्रती उन्हें अंतिम अर्घ्य देकर यह महाव्रत पूरा करेंगे। यह क्षण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ मानव के गहरे आध्यात्मिक संबंध, सामाजिक सौहार्द और अटूट आस्था का प्रतीक है।
रात भर का जागरण: आस्था और तपस्या का समागम
अंतिम अर्घ्य (सुबह का अर्घ्य) की तैयारी सूर्योदय से कई घंटे पहले ही शुरू हो जाती है। पिछले दिन अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के बाद, व्रती अपने घाटों पर ही या घर लौटकर रात्रि विश्राम करते हैं। लेकिन यह विश्राम सामान्य नहीं होता।
घाटों पर लोकगीतों की गूंज
नदियों और तालाबों के किनारे बने छठ घाटों पर रात भर एक अद्भुत और अलौकिक दृश्य दिखाई देता है। व्रती और उनके परिवार के सदस्य अपने सूपों और डाला (बाँस की टोकरी) के पास बैठकर छठ मैया के पारंपरिक लोकगीत गाते हैं। ये गीत छठ मैया की महिमा, सूर्यदेव की शक्ति, और व्रत की कठिनाई का वर्णन करते हैं। गीतों में अक्सर पुत्र, पति के स्वास्थ्य और परिवार की समृद्धि के लिए प्रार्थनाएँ होती हैं।
- “केलवा के पात पर उगलें सुरूज देव…”
- “काँच ही बाँस के बहंगिया…”
- “छठी मैया दे दुलार…”
इन गीतों से घाटों पर एक आध्यात्मिक माहौल बन जाता है, जहाँ घंटों की थकावट और प्यास के बावजूद, व्रतियों के चेहरे पर एक अपूर्व शांति और तेज दिखाई देता है।
बाँस की टोकरियों (डाला) की सुरक्षा
परिवार के सदस्य रात भर पहरेदारी करते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि अर्घ्य सामग्री से भरी बाँस की टोकरियाँ (डाला या बहंगी) पूरी तरह सुरक्षित रहें। यह टोकरी केवल फल और प्रसाद का संग्रह नहीं है, बल्कि व्रती की तपस्या और उनके परिवार की श्रद्धा का प्रतीक है।
उषा काल का आगमन: अंतिम अर्घ्य की तैयारी
रात के तीन से चार बजे के बीच, जब उषा काल (भोर) का आगमन होता है, तो घाटों पर गतिविधियाँ तेजी से बढ़ जाती हैं।
पुनः शुद्धिकरण और घाट पर वापसी
जो व्रती रात में घर लौट आए थे, वे पुनः नदी या तालाब की ओर प्रस्थान करते हैं। जो घाट पर ही रुके थे, वे अंतिम अर्घ्य के लिए खुद को तैयार करते हैं। व्रती एक बार फिर नदी या तालाब के जल में खड़े हो जाते हैं, जो अक्सर अक्टूबर के अंत में काफी ठंडा होता है। इस समय जल में खड़ा होना उनकी कठोर तपस्या को दर्शाता है।
अर्घ्य सामग्री का अंतिम विन्यास
परिवार के सदस्य सूप और डाला को व्रती के सामने रखते हैं। इनमें चढ़ाए जाने वाले फल, ठेकुआ, चावल के लड्डू (कसार), गन्ना, मूली, नींबू और नारियल के साथ ही मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं। अर्घ्य के लिए दूध और जल को तांबे या पीतल के पात्र में तैयार रखा जाता है।
सूर्य की पहली किरण का इंतजार
यह पूरे पर्व का सबसे भावुक और प्रतीक्षित क्षण होता है। व्रती जल में कमर तक खड़े होकर पूरब दिशा की ओर देखते रहते हैं। लाखों व्रतियों की आँखें क्षितिज पर उस लालिमा को खोजती हैं जो सूर्य के उदय का संकेत देती है। इस इंतजार में भक्ति, आशा और तपस्या का एक अनूठा मेल होता है।
उदीयमान सूर्य को अर्घ्य: महाव्रत की पूर्णाहुति
जैसे ही क्षितिज पर सूर्य की पहली स्वर्णिम किरणें फूटती हैं, पूरा घाट एक साथ प्रार्थना और अर्घ्य की प्रक्रिया में लीन हो जाता है।
अर्घ्य की प्रक्रिया
- अर्घ्य प्रदान: व्रती दोनों हाथों में सूप/डाला थामे हुए होते हैं, जबकि परिवार का कोई सदस्य दूध और गंगाजल का पात्र (लोटा) व्रती के हाथ में देता है। व्रती उस पात्र को सिर के ऊपर उठाकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं।
- छठी मैया की पूजा: इसके बाद छठी मैया को जल और फूल अर्पित किए जाते हैं, और परिवार की खुशहाली व बच्चों के कल्याण के लिए अंतिम प्रार्थना की जाती है।
- सिंदूर लेपन: अर्घ्य देने के बाद, व्रती घाट पर ही सूर्यदेव को अर्पित किए गए सिंदूर को अपने माथे पर लगाती हैं। यह सिंदूर विवाहित महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
आशीर्वाद और पारण (उपवास तोड़ना)
अंतिम अर्घ्य के बाद, व्रती घाट पर उपस्थित सभी बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं और प्रसाद वितरित करते हैं। इसके बाद वे नदी या तालाब के जल से बाहर आकर घाट की मिट्टी को माथे पर लगाते हैं।
- पारण: घर लौटकर, व्रती सबसे पहले अदरक, गुड़ और गंगाजल ग्रहण करके अपना 36 घंटे का निर्जला व्रत तोड़ते हैं। इसे ‘पारण’ कहा जाता है। इसके बाद परिवार के सदस्यों और पड़ोसियों के बीच छठ का विशेष प्रसाद (ठेकुआ, कसार आदि) वितरित किया जाता है।
बिहार में सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था
इस महापर्व के अंतिम दिन, लाखों की संख्या में श्रद्धालु गंगा घाटों, नहरों, तालाबों और नदियों के किनारे इकट्ठा होते हैं। बिहार सरकार और स्थानीय प्रशासन इस विशाल भीड़ के प्रबंधन और सुरक्षा के लिए अत्यधिक संवेदनशील रहता है।
पटना के गंगा घाटों पर विशेष व्यवस्था
बिहार की राजधानी पटना में गंगा नदी के किनारे छठ महापर्व का सबसे भव्य और विशाल आयोजन होता है। पटना के प्रमुख घाटों, जैसे दीघा घाट, कलेक्ट्रियट घाट, गाय घाट, और महेंद्रू घाट पर विशेष सुरक्षा व्यवस्था की जाती है।
- सुरक्षा बल की तैनाती: घाटों पर एनडीआरएफ (NDRF) और एसडीआरएफ (SDRF) की टीमों को मोटर बोट्स के साथ तैनात किया जाता है, ताकि किसी भी डूबने की घटना को रोका जा सके। स्थानीय पुलिस बल और महिला पुलिस कर्मियों को भीड़ नियंत्रण के लिए लगाया जाता है।
- खतरनाक घाटों की घोषणा: प्रशासन पहले ही गहरे और खतरनाक घाटों को “रेड जोन” घोषित कर देता है और रस्सी लगाकर गहरे पानी में जाने से रोकता है।
- चिकित्सा सुविधा: हर बड़े घाट पर अस्थायी चिकित्सा शिविर और एम्बुलेंस की व्यवस्था की जाती है, ताकि आपात स्थिति में व्रतियों और श्रद्धालुओं को तुरंत प्राथमिक उपचार मिल सके।
- सफाई और प्रकाश व्यवस्था: छठ की पवित्रता बनाए रखने के लिए घाटों पर विशेष सफाई अभियान चलाए गए थे। रात भर के जागरण के लिए घाटों पर पर्याप्त प्रकाश (LED लाइट्स) की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।
- यातायात नियंत्रण: सुबह अर्घ्य के दौरान घाटों की ओर जाने वाली सड़कों पर यातायात को नियंत्रित किया जाता है। कई सड़कों को ‘नो-एंट्री ज़ोन’ घोषित किया जाता है ताकि भीड़ और वाहनों के कारण कोई दुर्घटना न हो।
पूरे राज्य में चौकसी
पटना के अलावा, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, गया, और दरभंगा जैसे अन्य प्रमुख शहरों में भी स्थानीय निकाय छठ घाटों पर ऐसी ही व्यवस्था सुनिश्चित करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों और नहरों पर भी होम गार्ड और स्थानीय स्वयंसेवकों को सुरक्षा के लिए तैनात किया जाता है।
छठ: प्रकृति, समाज और विज्ञान का दर्शन
छठ महापर्व का दर्शन इसे अन्य त्योहारों से विशिष्ट बनाता है:
- सूर्य की उपासना: सूर्य एकमात्र ऐसा देवता है जिसे हम हर दिन प्रत्यक्ष रूप से देखते हैं। छठ सूर्य की ऊर्जा, जीवनदायिनी शक्ति और संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए उसके महत्व को स्वीकार करता है।
- डूबते और उगते सूर्य का सम्मान: यह त्योहार हमें सिखाता है कि जीवन में हर चरण (उत्थान और पतन, डूबना और उगना) सम्मान के योग्य है। यह सनातन धर्म के अस्थायित्व और पुनर्जन्म के सिद्धांत को दर्शाता है।
- सामाजिक समरसता: छठ पूजा में जाति-पाति का कोई भेद नहीं होता। अमीर-गरीब, उच्च-निम्न सभी एक ही घाट पर एक साथ अर्घ्य देते हैं। ठेकुआ का प्रसाद बनाने से लेकर घाटों की सफाई तक, सभी मिलकर करते हैं, जो सामाजिक एकता का अनुपम उदाहरण है।
- वैज्ञानिक महत्व: वैज्ञानिक मानते हैं कि छठ का व्रत, खासकर सूर्य की पहली और अंतिम किरण के दौरान जल में खड़ा होना, शरीर को विटामिन-डी और सूर्य की पराबैंगनी किरणों के सकारात्मक स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है। यह अनुष्ठान शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और ऊर्जा को संतुलित करता है।
उपसंहार
आज सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही छठ महापर्व की पूर्णाहुति होगी। यह चार दिवसीय अनुष्ठान बिहार की लोक संस्कृति, अटूट आस्था और प्रकृति के प्रति समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण है। रात भर के जागरण, लोकगीतों की गूंज और सुबह की पहली किरण का इंतजार – ये सभी तत्व मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जो किसी भी आगंतुक को मंत्रमुग्ध कर सकता है। प्रशासन और व्रतियों के संयुक्त प्रयासों से, आज सुबह का यह पवित्र अनुष्ठान न केवल धार्मिक रूप से सफल होगा, बल्कि लाखों लोगों की आस्था का एक सुरक्षित और व्यवस्थित प्रदर्शन भी बनेगा। छठ पूजा केवल एक त्योहार नहीं है; यह जीवन, प्रकृति और तपस्या का एक उत्सव है जो बिहार की आत्मा में रचा-बसा है।
