1️⃣ प्रमुख उम्मीदवार और मुकाबला
| गठबंधन/पार्टी | संभावित उम्मीदवार | स्थिति और पृष्ठभूमि |
| NDA | जितेंद्र कुमार | वर्तमान विधायक (लगातार 5 बार के विजेता)। क्षेत्र में मजबूत व्यक्तिगत छवि। |
| महागठबंधन (RJD) | अनिल कुमार (या कोई नया चेहरा) | 2020 के उपविजेता। RJD के यादव+मुस्लिम आधार का प्रतिनिधित्व। |
| जन सुराज | लता सिंह (संभावित, आरसीपी सिंह की बेटी) | नए फैक्टर के रूप में उभरने की कोशिश। |
2️⃣ 🏆 जितेंद्र कुमार (JD(U)/NDA) की जीत के कारण (अनुकूल तथ्य)
NDA उम्मीदवार जितेंद्र कुमार की जीत की संभावनाएँ निम्नलिखित कारणों पर टिकी हैं:
- अभेद्य गढ़ और व्यक्तिगत पकड़: यह सीट ऐतिहासिक रूप से JD(U) का अभेद्य गढ़ रही है। जितेंद्र कुमार की यहाँ लगातार 5 जीत उनकी बेजोड़ व्यक्तिगत पकड़ और जमीनी लोकप्रियता को दर्शाती है। नालंदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गृह जिला भी है, जिसका अतिरिक्त लाभ JD(U) को मिलता है।
- जातीय समीकरण (कुर्मी+पासवान+पिछड़ा): अस्थावां में यादव, पासवान और कुर्मी मतदाताओं की संख्या अच्छी है। JD(U) कुर्मी वोट बैंक पर मजबूत पकड़ रखता है, और NDA के साथ होने से पासवान (LJP) और अन्य अति पिछड़ा/पिछड़ा वोट बैंक का बड़ा हिस्सा उनके पक्ष में आने की उम्मीद है। यह मजबूत सोशल इंजीनियरिंग NDA को बढ़त दिलाती है।
- विकास पुरुष की छवि: भले ही स्थानीय लोग कुछ कमियों का जिक्र करते हैं, लेकिन नीतीश कुमार के विकास मॉडल और केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ उन्हें मिलता है। स्थानीय मतदाताओं का एक वर्ग JD(U) की जीत को ‘तय’ मानता है।
- RJD की ऐतिहासिक कमजोरी: RJD को अस्थावां में कभी जीत हासिल नहीं हुई है। यह ऐतिहासिक तथ्य महागठबंधन के लिए एक बड़ी मनोवैज्ञानिक बाधा है।
3️⃣ ❌ महागठबंधन (RJD) की हार के कारण (प्रतिकूल तथ्य)
महागठबंधन उम्मीदवार अनिल कुमार (या नए चेहरे) के लिए यह सीट जीतना सबसे बड़ी चुनौती है:
- लगातार हार का इतिहास: RJD या उसके गठबंधन दलों को इस सीट पर कभी भी जीत नहीं मिली है। यह हार का इतिहास पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के मनोबल को प्रभावित करता है।
- RJD के कोर वोट की सीमा: RJD का मुख्य आधार मुस्लिम और यादव (MY) मतदाता यहाँ निर्णायक संख्या में हैं, लेकिन यह वोट बैंक जीत के लिए पर्याप्त नहीं है। MY के अलावा अन्य जातियों (जैसे कुर्मी, पासवान, अति पिछड़ा) का समर्थन हासिल करना RJD के लिए बहुत मुश्किल रहा है।
- कमजोर मतदान प्रतिशत का प्रभाव: इस क्षेत्र में मतदान प्रतिशत (2020 में 50.8%) अक्सर कम रहता है। जब मतदान कम होता है, तो यह अक्सर JD(U) के संगठित कोर वोटर के पक्ष में जाता है। RJD की जीत तभी संभव है जब वह मतदान प्रतिशत को बढ़ाए और उदासीन मतदाताओं को बाहर निकाले।
- एंटी-इनकम्बेंसी का प्रभावहीन होना: विधायक के प्रति नाराजगी के बावजूद, मतदाता अक्सर यह मानते हैं कि “JD(U) की जीत तय है,” जिसके कारण एंटी-इनकम्बेंसी वोट प्रभावी ढंग से एकजुट नहीं हो पाते।
4️⃣ निर्णायक फैक्टर: क्या एंटी-इनकम्बेंसी और नए चेहरे (जन सुराज) खेल बिगाड़ेंगे?
- वर्तमान विधायक से नाराजगी: जनता में मौजूदा विधायक के कामकाज से नाराजगी के स्पष्ट संकेत हैं। लोग ‘बदलाव’ की बात कर रहे हैं और ’20 साल का हिसाब’ माँग रहे हैं। यदि महागठबंधन इस गुस्से को वोटों में बदल पाया, तो सीट पर उलटफेर हो सकता है।
- जन सुराज की एंट्री: जन सुराज (संभावित लता सिंह) की एंट्री गैर-NDA और गैर-RJD वोटों को बाँट सकती है, खासकर यदि यह पार्टी भूमिहार या अन्य सवर्ण वोटों में सेंध लगाती है। हालांकि, नालंदा में JD(U) की मजबूत पकड़ को देखते हुए, यह विभाजन भी अंततः JD(U) को ही लाभ पहुँचा सकता है।
- तेजस्वी का प्रभाव: तेजस्वी यादव का ‘नौकरी’ का वादा और युवा चेहरा RJD के पक्ष में लहर पैदा कर सकता है। यदि महागठबंधन यादव+मुस्लिम+पिछड़ा के एक हिस्से को एंटी-इनकम्बेंसी के साथ जोड़ लेता है, तो यह मुकाबला कड़ा हो जाएगा।
निष्कर्ष: उपलब्ध तथ्यों और पिछले परिणामों के आधार पर, JD(U) के जितेंद्र कुमार का पलड़ा भारी है, और इस सीट पर NDA की जीत की संभावनाएँ सर्वाधिक मजबूत हैं। हालाँकि, स्थानीय मुद्दों पर नाराजगी और RJD के संगठित MY आधार के कारण महागठबंधन उन्हें कड़ी चुनौती देगा। RJD की जीत तभी संभव है जब वह बदलाव की लहर को वोटों में तब्दील कर पाए और कम मतदान प्रतिशत के मिथक को तोड़ दे।