परिणाम का पूर्वानुमान (विश्लेषणात्मक संभावना)
बखरी (सुरक्षित) विधानसभा सीट को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) का गढ़ माना जाता है, जिसने यहाँ से 11 बार जीत हासिल की है। यह सीट एक ग्रामीण प्रधान क्षेत्र है जहाँ वामपंथियों का मजबूत आधार रहा है। हालांकि, 2020 के चुनाव में जीत का अंतर केवल 777 वोट का था, जो इस बार मुकाबला त्रिकोणीय होने के कारण और भी कठिन हो सकता है।
- संभावित विजेता: सूर्यकांत पासवान (महागठबंधन – CPI)
- NDA के मुख्य दावेदार: संजय पासवान (NDA – LJP-रामविलास)
- तीसरे निर्णायक दावेदार: संजय कुमार पासवान (जन सुराज)
जीत/हार का निर्णायक विश्लेषण (अनुकूल और प्रतिकूल तथ्य)
बखरी सीट पर मुख्य रूप से मुकाबला महागठबंधन (CPI) और NDA (LJP-रामविलास) के बीच है, लेकिन जन सुराज के आने से यह त्रिकोणीय बन गया है। इस सीट पर महतो, मुस्लिम, पासवान और यादव मतदाताओं का निर्णायक प्रभाव है।
1. महागठबंधन (CPI) उम्मीदवार की जीत के पक्ष में विश्लेषण (अनुकूल तथ्य)
सूर्यकांत पासवान की संभावित जीत के मुख्य कारण और अनुकूल तथ्य निम्नलिखित हैं:
- ऐतिहासिक और मजबूत वामपंथी गढ़: बखरी को बिहार का ‘लेनिनग्राद’ कहा जाता है, जहाँ CPI ने 17 में से 11 बार जीत हासिल की है। यह मजबूत कैडर आधारित वोट बैंक वामपंथियों की सबसे बड़ी ताकत है।
- महागठबंधन का MY समीकरण: CPI को RJD के मजबूत MY (मुस्लिम-यादव) वोट बैंक का पूरा समर्थन मिलेगा। इस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी और यादव आबादी निर्णायक भूमिका निभाती है।
- महतो जाति का समर्थन: महतो जाति (करीब ) इस क्षेत्र में सबसे अधिक आबादी वाली है। वामपंथी दल और RJD का परंपरागत रूप से इस जाति के एक बड़े वर्ग पर प्रभाव रहा है, जो जीत का आधार बनेगा।
- मौजूदा विधायक की पकड़: सूर्यकांत पासवान मौजूदा विधायक हैं और उनका लगातार निर्वाचन उनके व्यक्तिगत प्रभाव और वामपंथी आंदोलन के साथ उनके जुड़ाव को दर्शाता है।
2. NDA (LJP-RV) उम्मीदवार की हार/चुनौती के पक्ष में विश्लेषण (प्रतिकूल तथ्य और सांख्यिकी)
NDA के उम्मीदवार संजय पासवान की राह में आने वाली मुख्य चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं:
- BJP के कैडर में नाराजगी और विद्रोह:
- 2020 में यह सीट BJP के पास थी और उनके उम्मीदवार रामशंकर पासवान केवल वोटों से हारे थे। इस बार यह सीट NDA के सीट-शेयरिंग के तहत LJP (रामविलास) को दे दी गई है। इससे स्थानीय BJP कार्यकर्ताओं और पूर्व प्रत्याशी में गहरी नाराजगी है, जिसने बागी (निर्दलीय) उम्मीदवार को नामांकन दाखिल करने के लिए प्रेरित किया।
- फैक्ट: भाजपा के पूर्व प्रत्याशी ने भी बागी के रूप में नामांकन दाखिल किया था, हालांकि बाद में वापस ले लिया, लेकिन कैडर की नाराजगी अब भी भारी है।
- वोटों का बिखराव (त्रिकोणीय मुकाबला):
- जन सुराज के संजय कुमार पासवान के मैदान में आने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। बागी या तीसरे उम्मीदवार अक्सर NDA के सवर्ण और पासवान वोटों में सेंध लगाते हैं, जिससे महागठबंधन के लिए जीत आसान हो सकती है।
- कमजोर ऐतिहासिक आधार:
- 2020 में BJP कड़ी टक्कर में थी, लेकिन 2015 में RJD ने बीजेपी को लगभग वोटों के बड़े अंतर से हराया था। BJP ने इस सीट पर केवल एक बार (2010) जीत हासिल की है।
- लोकसभा बनाम विधानसभा का रुझान:
- 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP ने इस विधानसभा क्षेत्र से बढ़त हासिल की थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में मुद्दे और उम्मीदवार स्थानीय होते हैं। CPI का वामपंथी कार्ड और महागठबंधन का सामाजिक आधार लोकसभा चुनाव के परिणाम को दोहराने से रोकेगा।
निष्कर्ष
बखरी विधानसभा सीट एक अत्यधिक कांटे का मुकाबला है। 2020 में के अंतर से जीत और 2024 के लोकसभा परिणामों में NDA की बढ़त के बावजूद, महागठबंधन (CPI) के सूर्यकांत पासवान के जीतने की संभावना अधिक है।
जीत का कारण: CPI के पास मजबूत वामपंथी कैडर और RJD के MY समीकरण (मुस्लिम-यादव) का संयुक्त समर्थन है।
NDA की हार/चुनौती का कारण: NDA उम्मीदवार की सबसे बड़ी चुनौती BJP के स्थानीय कैडर में सीट-शेयरिंग को लेकर हुई नाराजगी है, जिसके कारण होने वाला वोटों का बिखराव CPI की जीत का मार्ग प्रशस्त करेगा। यह मुकाबला अंत तक रोमांचक रहेगा, लेकिन वामपंथ का ‘लाल किला’ एक बार फिर सुरक्षित रहने की संभावना है।
