गोपालगंज जिले का बरौली विधानसभा क्षेत्र (क्रमांक 100) बिहार की राजनीति में एक बार फिर निर्णायक भूमिका निभाने जा रहा है। इस सीट को अपने ऐतिहासिक राजनीतिक संघर्ष, जातीय समीकरण और जनता के बदलते मूड के लिए जाना जाता है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में बरौली एक ऐसी सीट बन चुकी है जहां भाजपा और राजद के बीच परंपरागत टक्कर और अधिक तेज़ हो गई है ।
भूगोल और जनसांख्यिकीय स्थिति
बरौली विधानसभा क्षेत्र गोपालगंज (अनुसूचित जाति) लोकसभा सीट का हिस्सा है। इस विधानसभा में दो प्रमुख प्रखंड शामिल हैं — बरौली और मांझा, जबकि बैकुंठपुर प्रखंड के कुछ पंचायती क्षेत्र (रामपुर, सलेमपुर, सादौआ, पिपरा, खजुरिया आदि) भी इसके अंतर्गत आते हैं ।
कुल मतदाता संख्या लगभग 2,81,456 है, जिनमें महिला मतदाता पुरुषों के लगभग बराबर हैं। 2020 के चुनाव में 58.68% मतदान हुआ था, जो राज्य औसत से थोड़ा कम रहा ।
बरौली की भूमि गंडक नदी के किनारे उपजाऊ है और यहाँ धान, गेहूं और मक्का की खेती अधिक होती है। परंतु, बेहतर औद्योगिक अवसरों के अभाव के कारण युवाओं का पलायन एक गंभीर समस्या बनी हुई है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक यात्रा
1952 के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार अब्दुल गफ्फार इस सीट से विजयी हुए थे। तब से लेकर अब तक बरौली का सियासी परिदृश्य कई बार बदल चुका है ।
1970–80 के दशक में कांग्रेस का दबदबा रहा, लेकिन 1990 के बाद से जनता दल और उसके विभाजन के बाद राजद, जदयू और भाजपा जैसी पार्टियों ने इस सीट पर बारी-बारी से कब्जा जमाया ।
| वर्ष | विजेता उम्मीदवार | पार्टी | मतों का अंतर |
|---|---|---|---|
| 2020 | रामप्रवेश राय | भाजपा | 14,155 |
| 2015 | मोहम्मद नेमतुल्लाह | राजद | 504 |
| 2010 | रामप्रवेश राय | भाजपा | 10,414 |
| 2005 | गजेन्द्र प्रसाद सिंह | राजद | 7,158 |
| 2000 | अशोक कुमार | समाजवादी पार्टी | 1,320 |
| 1995 | गजेन्द्र प्रसाद सिंह | जनता दल | 29,858 |
| 1985 | भोला मंदर | लोकदल | 10,395 |
| 1980 | रामाश्रय राय | कांग्रेस | 34,602 |
| 1977 | प्रयाग मंडल | निर्दलीय | 4,134 |
2020 का चुनावी विश्लेषण
2020 के चुनाव में बरौली सीट पर भाजपा के रामप्रवेश राय ने राजद के रेयाज़ुल हक़ राजू को 14,155 वोटों के अंतर से हराया था। भाजपा को 81,956 वोट (46.55%), जबकि राजद को 67,801 वोट (38.51%) मिले ।
अन्य प्रमुख उम्मीदवारों में रुदल महतो (स्वतंत्र) और शाह आलम (बसपा) शामिल थे। उस चुनाव में कुल 175,390 वोट पड़े थे।
यह परिणाम भाजपा के लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि 2015 में वह मात्र 504 वोटों से इस सीट को हार गई थी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 2020 में “डबल इंजन सरकार” के नारे, रामप्रवेश राय की लोकप्रियता और राजद के आंतरिक विभाजन का भाजपा को लाभ मिला ।
जातीय और सामाजिक समीकरण
बरौली का जातीय संतुलन अत्यंत जटिल है और यही हर चुनाव में परिणाम तय करता है:
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यादव (24%) और मुस्लिम (9%) — आरजेडी का मुख्य आधार।
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राजपूत (18%), भूमिहार (14%), ब्राह्मण (6%) — भाजपा का मजबूत सामाजिक समर्थन।
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कोइरी, निषाद और दलित समुदाय (25–30%) — निर्णायक मतदाता समूह जो बहुधा उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि के अनुसार मतदान करते हैं ।
प्रमुख उम्मीदवार और राजनीतिक परिदृश्य 2025
2025 के चुनाव में भी मुकाबला दो पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच है।
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रामप्रवेश राय (भाजपा – एनडीए)
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चार बार विधायक रह चुके हैं।
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क्षेत्र में सड़कों, पुलों और सरकारी स्कूलों के निर्माण में योगदान का दावा करते हैं।
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इस बार “विकसित गोपालगंज – आत्मनिर्भर बरौली” नारे के साथ प्रचार कर रहे हैं ।
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रेयाज़ुल हक़ राजू (राजद)
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पूर्व प्रत्याशी और क्षेत्रीय मुस्लिम नेता।
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युवाओं के रोजगार और पलायन रोकने को मुख्य एजेंडा बना रहे हैं।
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“बदलाव बनाम बहाना” के नारे के साथ प्रचाररत हैं ।
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धर्मेंद्र क्रांतिकारी (जनशक्ति जनता दल)
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तेज प्रताप यादव की पार्टी से उम्मीदवार, जिनका नामांकन प्रारंभ में विवादों में रहा और बाद में रद्द कर दिया गया ।
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2025 का चुनावी कार्यक्रम
| चरण | मतदान दिवस | परिणाम |
|---|---|---|
| चरण 1 | 06 नवंबर 2025 | 14 नवंबर 2025 |
चुनाव आयोग ने इस सीट को पहले चरण में रखा है। यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गोपालगंज जिला उत्तर बिहार के सबसे संवेदनशील राजनीतिक क्षेत्रों में गिना जाता है।
मुख्य मुद्दे और जनता की प्राथमिकताएं
1. बेरोजगारी और पलायन:
बरौली से हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग पंजाब, गुजरात और दिल्ली काम की तलाश में जाते हैं। युवाओं का मानना है कि स्थानीय उद्योगों की अनुपस्थिति उनके पलायन का कारण है ।
2. सड़क और पुल:
मनकापुर रोड, बरौली-मांझा मार्ग, और बिसुनपुर पुल की अधूरी मरम्मत फिर से मुख्य चुनावी मुद्दा बनी है।
3. कृषि और बाढ़:
गंडक नदी के बारहमासी कटाव से 17 गांव प्रभावित हैं। फसल बीमा और सिंचाई योजनाओं का लाभ किसानों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया ।
4. महिला सशक्तिकरण:
महिला स्व-सहायता समूहों की योजनाएं सीमित असर दिखा रही हैं। ग्रामीण मतदाता इसे “अपूरा वादा” मानते हैं।
5. शिक्षा और स्वास्थ्य:
ग्रामीण प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है। बरौली प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टरों की तैनाती अधूरी है ।
विकास और सरकार की परियोजनाएं
राज्य और केंद्र सरकार की कई परियोजनाएं यहां लागू हैं:
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प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत 22 किलोमीटर सड़क का निर्माण।
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हर घर नल जल योजना के अंतर्गत 86% घरों में पेयजल कनेक्शन।
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सोलर स्ट्रीट लाइट प्रोजेक्ट, ग्रामीण विद्युतीकरण योजना।
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किसान सम्मान निधि योजना के तहत 52% किसानों को लाभ ।
हालांकि विपक्ष का दावा है कि परियोजनाओं की गति सुस्त है और उसका लाभ सीमित वर्ग तक ही पहुंचा।
महिला और युवा मतदाता
2020 के चुनाव में महिलाओं की मतदान दर 59.1% रही, जो पुरुषों से लगभग 3% अधिक थी।
महिलाएं अब जातिवाद के बजाय “विकास और सुरक्षा” मुद्दों को प्राथमिकता दे रही हैं।
युवा मतदाता (18–35 आयु वर्ग) कुल मतदाताओं का करीब 42% हैं और इनका रुझान पलायन, शिक्षा और रोजगार जैसी जटिल समस्याओं से जुड़ा है ।
संभावित चुनावी रुझान 2025
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भाजपा रामप्रवेश राय के कार्यकाल में हुए विकास कार्यों को भुनाना चाहती है।
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राजद तेजस्वी यादव के नेतृत्व में गैस, दाम और रोजगार के मुद्दों को उभार रही है।
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स्थानीय क्षेत्रों में जातीय एकजुटता और युवा लहर इस बार निर्णायक हो सकते हैं ।
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विश्लेषकों का मानना है कि मुकाबला बहुत करीबी रहेगा और 10–12 हज़ार वोट का अंतर संभावना से अधिक नहीं होगा।
निष्कर्ष
बरौली विधानसभा सीट बिहार की राजनीति में एक “मूड इंडिकेटर” मानी जाती है — यह सीट अक्सर पूरे गोपालगंज जिले के रुझान का संकेत देती है।
2025 में यहां का चुनाव केवल भाजपा और राजद के बीच नहीं, बल्कि युवा बनाम परंपरा, विकास बनाम असंतोष, और उम्मीद बनाम अनुभव का मुकाबला बन चुका है ।
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