कटिहार जिले की बलरामपुर विधानसभा सीट बिहार चुनाव 2025 में सबसे महत्वपूर्ण सीटों में से एक है। यह सीट वर्तमान में महागठबंधन (CPI-ML लिबरेशन) के दिग्गज नेता महबूब आलम के पास है। 2020 में उनकी जीत का अंतर (53,597 वोट) राज्य में सबसे बड़ा था, जो इस सीट पर उनकी मजबूत पकड़ को दर्शाता है।
गहन विश्लेषण के आधार पर, महबूब आलम (CPI-ML) के जीतने की संभावना बहुत प्रबल है।
विजेता की संभावित जीत के पक्ष में विश्लेषण (महागठबंधन – महबूब आलम)
संभावित विजेता: महबूब आलम (भाकपा-माले)
1. ‘लाल सलाम’ का गढ़ और ऐतिहासिक वोट शेयर:
- अभूतपूर्व जनाधार: महबूब आलम बलरामपुर में लगातार दो बार (2015 और 2020) से विधायक हैं। 2020 में उन्होंने 1,04,489 वोट हासिल किए, जो कुल वोटों का 52.44% था, और यह बिहार में सबसे बड़े जीत के अंतर में से एक था।
- गरीबों और भूमिहीनों के नेता: CPI-ML (भाकपा-माले) की पहचान किसानों, मजदूरों और गरीबों के संघर्ष से जुड़ी है। महबूब आलम की छवि एक ईमानदार और साधारण नेता की है, जिनके पास आज भी पक्का मकान तक नहीं है। यह छवि उन्हें मुस्लिम और अति-पिछड़ा वर्ग (EBC) के गरीब तबके के बीच गहरी पैठ देती है।
2. मुस्लिम-यादव-EBC का मजबूत त्रिकोण:
- मुस्लिम निर्णायक वोट: यह सीट मुस्लिम बाहुल्य है (अनुमानित 50% से अधिक या 60%)। महबूब आलम को मुस्लिम समुदाय का एकमुश्त और व्यापक समर्थन मिलता है, क्योंकि उनकी राजनीति धार्मिक पहचान के बजाय वर्ग संघर्ष पर आधारित है।
- महागठबंधन की मजबूती: CPI-ML, RJD और कांग्रेस के महागठबंधन का हिस्सा है। इससे उन्हें RJD के पारंपरिक यादव वोट बैंक और महागठबंधन के अन्य घटकों के वोटों का पूरा समर्थन मिलता है, जिससे उनका वोट बैंक अजेय बन जाता है।
3. लोकसभा चुनाव 2024 की बढ़त:
- 2024 के लोकसभा चुनाव में, महागठबंधन (कांग्रेस) के उम्मीदवार तारिक अनवर ने बलरामपुर विधानसभा खंड में NDA (JDU) के दुलाल चंद्र गोस्वामी पर 64,158 वोटों की बड़ी बढ़त हासिल की थी। यह ट्रेंड 2025 के विधानसभा चुनाव में महबूब आलम के लिए एक स्पष्ट संकेत है।
अन्य उम्मीदवार की संभावित हार के प्रतिकूल तथ्य (NDA या अन्य)
संभावित उपविजेता/मुख्य चुनौती: NDA या बागी उम्मीदवार
1. एनडीए की अंदरूनी कमजोरी और उम्मीदवार की अनिश्चितता:
- पारंपरिक वोट की कमी: बलरामपुर में NDA (BJP/JDU) का पारंपरिक सवर्ण या ओबीसी वोट बैंक निर्णायक संख्या में नहीं है। यहां की चुनावी गणित पूरी तरह से मुस्लिम, EBC और यादव वोटों पर निर्भर करती है।
- दल-बदल का जोखिम (NDA): पिछली बार NDA समर्थित VIP (अब महागठबंधन का हिस्सा) के बरुण कुमार झा को हार मिली थी। अगर NDA किसी मजबूत उम्मीदवार (जैसे पिछले चुनाव में निर्दलीय रहे दुलाल चंद्र गोस्वामी) को भी उतारती है, तो भी महबूब आलम की व्यक्तिगत लोकप्रियता और माले की मजबूत संगठन क्षमता को तोड़ना मुश्किल होगा।
2. मुस्लिम वोटों का बिखराव महबूब आलम को अप्रभावित रखेगा:
- AIMIM/अन्य मुस्लिम उम्मीदवार: इस सीट पर AIMIM, जनसुराज या कई निर्दलीय मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतर सकते हैं (2020 में भी 9 मुस्लिम उम्मीदवार थे)।
- विश्लेषण: मुस्लिम वोटों का यह बिखराव आमतौर पर महबूब आलम को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि इससे मुख्य रूप से NDA के खिलाफ पड़ने वाले वोटों का बंटवारा होता है, जिससे महबूब आलम की जीत का अंतर और बढ़ जाता है। क्योंकि मुस्लिम वोटों का एक बड़ा, संघर्षशील हिस्सा पहले से ही माले के मजबूत कोर वोटर के रूप में स्थापित है।
3. विकास बनाम विचारधारा का टकराव:
- NDA ‘विकास और राष्ट्रवाद’ के नाम पर वोट मांगती है, लेकिन बलरामपुर में ग्रामीण सड़कें, नल-जल योजना और भ्रष्टाचार जैसे स्थानीय मुद्दे हावी हैं (जैसा कि जमीनी रिपोर्टों में सामने आया है)। महबूब आलम अपनी ‘जनता के साथ सड़क पर संघर्ष’ की विचारधारा के दम पर इन मुद्दों को भुनाने में सफल रहते हैं, जो NDA के दावों पर भारी पड़ता है।
निष्कर्ष
बलरामपुर विधानसभा सीट भाकपा-माले के महबूब आलम का गढ़ बन चुकी है। उनकी लगातार दो जीत, 2020 का सबसे बड़ा जीत का अंतर और 2024 लोकसभा में महागठबंधन की बड़ी बढ़त, यह स्पष्ट करती है कि यह सीट वर्तमान में उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और पार्टी की विचारधारात्मक पकड़ के कारण महागठबंधन के पक्ष में सुरक्षित है। NDA के लिए यह सीट जीतना तब तक लगभग असंभव होगा, जब तक कि वह महबूब आलम के मुस्लिम-EBC के मजबूत वोट बेस में कोई बड़ा सेंध नहीं लगा पाती।
