नई दिल्ली/पटना, 23 अक्टूबर 2025: बिहार विधानसभा चुनाव के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने कई दौर की गहन बैठकों और जटिल मोलभाव के बाद आखिरकार अपनी सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप दे दिया है। 243 सीटों वाली विधानसभा के लिए घोषित इस फॉर्मूले में सबसे बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव यह है कि गठबंधन के दो सबसे बड़े दल, भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल यूनाइटेड (JD(U)), अब 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे।1 यह पहली बार है जब बीजेपी बिहार में जेडीयू के बराबर सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जो राज्य की राजनीति में शक्ति संतुलन के एक नए युग का संकेत है।
गठबंधन के छोटे सहयोगियों, खासकर चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) (LJP (R)) के लिए यह समझौता बड़ी सफलता लेकर आया है।
एनडीए सीट बंटवारे का अंतिम फॉर्मूला (कुल 243 सीटें):
| पार्टी का नाम | आवंटित सीटों की संख्या | पिछले चुनाव (2020) में लड़ी गई सीटें | राजनीतिक महत्त्व |
| बीजेपी (BJP) | 101 | 110 (जीती 74) | पहली बार JDU के बराबर; बड़ा भाई होने की छवि स्थापित। |
| जेडीयू (JD(U)) | 101 | 115 (जीती 43) | पिछली बार से 14 सीटें कम; गठबंधन बचाने के लिए त्याग। |
| एलजेपी (रामविलास) (LJP-R) | 28-29 | 137 (जीती 1, NDA से बाहर) | सबसे बड़ा फायदा; ‘हनुमान’ की भूमिका का प्रतिफल। |
| हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) | 6 | 7 (जीती 4, JDU कोटे से) | जीतन राम मांझी; दलित (मुसहर) वोट बैंक को साधने का प्रयास। |
| राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) | 6 | (नई पार्टी) | उपेंद्र कुशवाहा; लव-कुश (कुशवाहा) वोटों को एकजुट करने की कोशिश। |
| कुल सीटें | 243 | 243 | सौहार्दपूर्ण बंटवारा दर्शाने का प्रयास। |
(नोट: कुछ सूत्रों के अनुसार, LJP-R को 29 सीटें आवंटित की गई हैं, जिससे कुल सीटों का योग 243 बनता है।)2
1. 101-101 का फार्मूला: बीजेपी का बड़ा दाँव और जेडीयू का त्याग
इस सीट बंटवारे की सबसे महत्वपूर्ण बात बीजेपी और जेडीयू का 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ना है।3
शक्ति संतुलन में बदलाव:
- बीजेपी का उदय: 2020 के पिछले विधानसभा चुनाव में, बीजेपी 110 सीटों पर लड़ी थी, जबकि जेडीयू 115 पर।4 इस बार 14 सीटों का त्याग करके भी जेडीयू को बीजेपी के बराबर सीटें मिली हैं, जो सांकेतिक रूप से यह दर्शाता है कि गठबंधन में अब बीजेपी कोई ‘छोटा भाई’ नहीं है।5 बीजेपी ने अपनी 9 सीटें कम की हैं, जबकि जेडीयू ने अपनी 14 सीटें घटाई हैं।6
- “छोटे भाई” से “जुड़वाँ भाई”: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी ने जानबूझकर यह बराबरी का फार्मूला अपनाकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को यह संकेत दिया है कि भविष्य में गठबंधन के भीतर उसका कद और बढ़ेगा। बीजेपी के नेता अब यह दावा कर रहे हैं कि एनडीए में कोई बड़ा या छोटा भाई नहीं, बल्कि सभी ‘जुड़वाँ भाई’ हैं।
- जेडीयू की मजबूरी: 2020 के चुनाव में चिराग पासवान की एलजेपी ने जेडीयू को भारी नुकसान पहुँचाया था, जिससे नीतीश कुमार की पार्टी सिर्फ 43 सीटों पर सिमट गई थी।7 गठबंधन को बचाने और अपनी सरकार को बनाए रखने की मजबूरी में जेडीयू को यह बड़ा त्याग करना पड़ा।
2. चिराग पासवान की बड़ी जीत और राजनीतिक पुनर्वास
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान इस सीट बंटवारे के सबसे बड़े विजेता बनकर उभरे हैं।
- 2020 से बड़ी सफलता: 2020 में, चिराग पासवान ने एनडीए से अलग होकर 137 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन सिर्फ एक सीट जीत पाए थे। हालांकि, उन्होंने जेडीयू की लगभग 30-35 सीटों पर हार सुनिश्चित की थी। इस बार, एनडीए के भीतर रहकर उन्हें 28-29 सीटें मिलना उनकी ‘हार्ड बार्गेनिंग’ क्षमता को दिखाता है।
- रामविलास पासवान की विरासत का सम्मान: बीजेपी ने चिराग पासवान को इतनी सीटें देकर न केवल पासवान समुदाय के वोटों को एक मजबूत आधार दिया है, बल्कि दिवंगत नेता रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत को भी सम्मान देने का संदेश दिया है। चिराग अब आधिकारिक तौर पर एनडीए के भीतर एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में स्थापित हो गए हैं।
- जेडीयू का असहज समझौता: यह स्पष्ट है कि जेडीयू, खासकर नीतीश कुमार, चिराग पासवान को लेकर असहज थे, लेकिन बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व (प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह) के हस्तक्षेप के कारण चिराग को गठबंधन में जगह और सम्मानजनक सीटें मिलीं।
3. छोटे सहयोगियों का समन्वय: जातिगत गणित पर फोकस
जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को सम्मानजनक सीटें देकर एनडीए ने अपने कोर अति-पिछड़ा वर्ग (EBC) और दलित (SC/ST) वोट बैंक को साधने की कोशिश की है।
- जीतन राम मांझी (HAM, 6 सीटें): पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) को 6 सीटें मिली हैं।8 मांझी ने 10-15 सीटों की मांग की थी, लेकिन 6 सीटों पर सहमत होना भी दलितों (मुसहर समुदाय) के बीच एनडीए के आधार को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण है।9 मांझी ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वे पार्टी आलाकमान के फैसले से संतुष्ट हैं।
- उपेंद्र कुशवाहा (RLM, 6 सीटें): राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा को भी 6 सीटें मिली हैं।10 कुशवाहा लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) समीकरण के प्रमुख नेता हैं। जेडीयू का यह कोर वोट बैंक हाल के दिनों में थोड़ा विचलित हुआ है, जिसे साधने के लिए कुशवाहा की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है।
4. घटक दलों की प्रतिक्रिया और सामंजस्य का प्रदर्शन
सीट बंटवारे की घोषणा किसी साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं हुई, बल्कि बीजेपी के चुनाव प्रभारी विनोद तावड़े, जेडीयू नेता संजय झा, चिराग पासवान और अन्य नेताओं ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर एक ही फ़ॉर्मूला पोस्ट कर एकजुटता का संदेश दिया।
- खुशी और संतोष: बीजेपी, जेडीयू और लोजपा (आर) के शीर्ष नेताओं ने इस फार्मूले पर खुशी और संतोष व्यक्त किया है। बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “हमने सौहार्दपूर्ण वातावरण में आपसी सहमति से सीटों का वितरण पूर्ण किया है। बिहार है तैयार, फिर से एनडीए सरकार।”
- मांझी का शुरुआती असंतोष: जीतन राम मांझी को शुरुआत में 6 सीटों से असंतोष था, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने कहा, “हमें जो सीटें मिली हैं, हम उससे संतुष्ट हैं। आलाकमान का निर्णय शिरोधार्य है।”
- जेडीयू का सलीका: जेडीयू नेताओं ने भले ही अधिक सीटें खोई हों, लेकिन वे इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि गठबंधन की स्थिरता और जीत सबसे महत्वपूर्ण है।
5. राजनीतिक और चुनावी विश्लेषण: क्या एनडीए का ‘सोशल इंजीनियरिंग’ सफल होगा?
एनडीए का यह सीट बंटवारा फार्मूला विशुद्ध रूप से “सोशल इंजीनियरिंग” पर आधारित है, जिसका लक्ष्य महागठबंधन के एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण को जातीय ध्रुवीकरण से काटना है।
| पार्टी का लक्ष्य | लक्षित वोट बैंक |
| बीजेपी (101) | उच्च जाति (सवर्ण), गैर-यादव ओबीसी, शहरी मतदाता। |
| जेडीयू (101) | लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा), अति-पिछड़ा वर्ग (EBC), महिला मतदाता। |
| एलजेपी (R) (29) | पासवान (दलित) और युवा मतदाता। |
| हम (6) | मुसहर (दलित) समुदाय। |
| आरएलएम (6) | कुशवाहा समुदाय। |
एनडीए की यह रणनीति पांच-दलीय गठबंधन के माध्यम से बिहार के सभी प्रमुख जातिगत समूहों को साधने की है:
- सवर्ण (बीजेपी)
- कुर्मी-कुशवाहा (जेडीयू+आरएलएम)
- अति-पिछड़ा (जेडीयू)
- दलित (पासवान) (एलजेपी-आर)
- दलित (मांझी) (हम)
6. महागठबंधन पर दबाव
एनडीए द्वारा समय पर सीटों के बंटवारे की घोषणा ने विपक्षी महागठबंधन पर भारी दबाव बना दिया है, जहाँ तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले गठबंधन में अभी भी कांग्रेस और अन्य छोटे दलों के बीच सीटों के तालमेल को लेकर खींचतान चल रही है।
- एकजुटता बनाम बिखराव: एनडीए ने अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करके यह संदेश दिया है कि वह चुनाव के लिए पूरी तरह से तैयार है, जबकि महागठबंधन की देरी उसकी कमजोरी और आंतरिक कलह को दर्शा रही है।
- वोट ट्रांसफर की चुनौती: एनडीए के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि क्या सभी घटक दल अपने आवंटित सीटों पर पूरी ताकत से लड़ते हैं और एक-दूसरे के उम्मीदवारों को अपना वोट प्रभावी ढंग से हस्तांतरित (वोट ट्रांसफर) कर पाते हैं या नहीं।
निष्कर्ष
बिहार एनडीए में सीटों का बंटवारा शक्ति संतुलन में बदलाव, चिराग पासवान का उदय और सोशल इंजीनियरिंग पर अत्यधिक फोकस का एक स्पष्ट दस्तावेज है। बीजेपी अब जेडीयू के बराबर आकर गठबंधन के भीतर अपनी बड़ी भूमिका को सुनिश्चित कर चुकी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए, यह समझौता गठबंधन को बचाने और लगातार चौथी बार सत्ता में लौटने की उनकी प्राथमिकता को दर्शाता है। यह फार्मूला आगामी बिहार विधानसभा चुनाव की दिशा तय करेगा, जहाँ एक तरफ एनडीए का पाँच-दलीय जातिगत समीकरण है, वहीं दूसरी तरफ तेजस्वी यादव का विकास और रोज़गार पर केंद्रित युवा नेतृत्व चुनौती पेश कर रहा है। चुनावी रण अब पूरी तरह से सज चुका है।
