पटना, 23 अक्टूबर 2025: बिहार विधानसभा चुनाव के लिए महागठबंधन द्वारा आधिकारिक सीट बंटवारे की घोषणा के बावजूद, गठबंधन के भीतर की कलह थमने का नाम नहीं ले रही है। अंतिम क्षण तक उम्मीदवारों के चयन और नामांकन को लेकर चली खींचतान अब एक गंभीर संकट में बदल गई है, जहाँ गठबंधन के प्रमुख घटक दल – राष्ट्रीय जनता दल (RJD), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) – कम से कम 12 से 13 महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में उतर आए हैं।

नेताओं द्वारा इन मुकाबलों को भले ही “फ्रेंडली फाइट” (दोस्ताना लड़ाई) का नाम दिया जा रहा हो, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे विपक्षी एकता पर एक गहरा आघात मान रहे हैं, जिसका सीधा फायदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को मिल सकता है।

1. 13 सीटों पर टकराव: कहाँ, कैसे और क्यों?

सीट बंटवारे के औपचारिक ऐलान के बावजूद, महागठबंधन के भीतर कई सीटें ऐसी रहीं, जिन पर किसी भी दल ने दूसरे दल के उम्मीदवार के लिए दावा नहीं छोड़ा और अपने-अपने उम्मीदवार उतार दिए। यह स्थिति मुख्य रूप से तीन प्रकार के टकराव को दर्शाती है:

टकराव का प्रकार सीटों की अनुमानित संख्या मुख्य रूप से शामिल दल
RJD बनाम Congress 6-7 सीटें वैशाली, कहलगांव, सिकंदरा, सुल्तानगंज, नरकटियागंज, वारसलीगंज, (लालगंज)
Congress बनाम CPI 4 सीटें बछवाड़ा, राजापाकर (सु.), करगहर, बिहारशरीफ
RJD बनाम VIP 2 सीटें तारापुर, बाबूबरही / गौराबौराम
कुल सीटें 12-13 महागठबंधन के भीतर महाकलह का केंद्र

2. आरजेडी बनाम कांग्रेस: गठबंधन के ‘बड़े भाई’ और ‘छोटे भाई’ में सीधी टक्कर

महागठबंधन में सबसे अधिक सीटों पर टकराव आरजेडी और कांग्रेस के बीच देखने को मिल रहा है।

  • मूल कारण: कांग्रेस को इस बार 2020 के मुकाबले 9 सीटें कम (70 से 61) मिली थीं। सीटों की संख्या कम होने के बावजूद, कांग्रेस उन सीटों पर दावा कर रही थी, जहां उसका पारंपरिक जनाधार रहा है, या जहाँ 2020 में वह दूसरे स्थान पर रही थी। आरजेडी ने इन सीटों को छोड़ने से मना कर दिया, जिससे दोनों दलों के उम्मीदवारों ने अंतिम समय में एक-दूसरे के खिलाफ नामांकन दाखिल कर दिया।
  • प्रमुख सीटें और प्रत्याशी:
    • वैशाली: आरजेडी ने अजय कुशवाहा को तो कांग्रेस ने संजीव कुमार को मैदान में उतारा है।
    • सिकंदरा (सु.): आरजेडी से उदय नारायण चौधरी और कांग्रेस से विनोद चौधरी आमने-सामने हैं।
    • कहलगांव: कांग्रेस प्रत्याशी प्रवीण कुशवाहा के सामने आरजेडी के रजनीश आनंद ताल ठोक रहे हैं।
    • सुल्तानगंज, नरकटियागंज, वारसलीगंज: इन सीटों पर भी दोनों दलों के उम्मीदवार एक-दूसरे के खिलाफ डटे हुए हैं, जिससे इन महत्वपूर्ण सीटों पर एनडीए के उम्मीदवारों को स्पष्ट बढ़त मिलने की आशंका है।

आरजेडी और कांग्रेस के बीच यह आंतरिक संघर्ष गठबंधन की नींव को हिला रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, अशोक गहलोत, को डैमेज कंट्रोल के लिए पटना भेजा गया था, लेकिन उनके प्रयासों के बावजूद अधिकांश उम्मीदवारों ने नामांकन वापस लेने से इनकार कर दिया। गहलोत ने बाद में कहा, “5-10 सीटों पर ‘फ्रेंडली फाइट’ चलती रहती है, इसे कोई बड़ा मुद्दा नहीं बनाना चाहिए,” लेकिन इस बयान ने एक तरह से पार्टी के भीतर के विरोध को स्वीकार कर लिया।

3. कांग्रेस बनाम वाम दल (CPI): वाम दलों का बढ़ता कद और सीट का विवाद

कांग्रेस और सीपीआई (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) के बीच भी चार सीटों पर सीधा मुकाबला है। यह टकराव वाम दलों को मिली बढ़ी हुई सीटों (सीपीआई को 9 सीटें) के बावजूद हुआ है।

  • मूल कारण: वाम दलों ने इस बार अधिक सीटों की मांग की थी, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका जनाधार ग्रामीण और मज़दूर वर्ग में बढ़ा है। जिन सीटों पर सीपीआई ने अपना दावा मज़बूती से पेश किया, उन्हें कांग्रेस छोड़ने को तैयार नहीं हुई, जिसके चलते दोनों दलों के प्रत्याशियों ने नामांकन दाखिल कर दिए।
  • प्रमुख सीटें:
    • बछवाड़ा: सीपीआई के अवधेश कुमार राय के सामने कांग्रेस के शिव प्रकाश गरीबदास।
    • राजापाकर (सु.): सीपीआई के मोहित पासवान और कांग्रेस की प्रतिमा दास के बीच सीधी टक्कर।
    • करगहर और बिहारशरीफ: इन सीटों पर भी कांग्रेस और सीपीआई के प्रत्याशी आमने-सामने हैं, जिससे वाम दलों और कांग्रेस का वोट बंटना तय माना जा रहा है।

यह विवाद यह भी दर्शाता है कि वाम दल अब आरजेडी या कांग्रेस के दबाव में आकर अपनी ज़मीनी ताक़त वाली सीटों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।

4. आरजेडी बनाम वीआईपी: मुकेश सहनी की नाराज़गी का असर

हालांकि वीआईपी को अंतिम रूप से 14 सीटें दी गईं, लेकिन कुछ सीटें ऐसी थीं, जिन पर आरजेडी और वीआईपी दोनों ने अपने उम्मीदवार उतार दिए।

  • तारापुर (या गौराबौराम) और बाबूबरही: इन सीटों पर आरजेडी के उम्मीदवार ने नामांकन वापस नहीं लिया, जबकि ये सीटें वीआईपी के खाते में गई थीं। मुकेश सहनी की पार्टी को डिप्टी सीएम फेस घोषित करने के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर सीटों की अदला-बदली पर आखिरी समय तक सहमति नहीं बन पाई, जिससे वीआईपी ने भी कई सीटों पर अधिक उम्मीदवार उतार दिए।

5. गठबंधन पर राजनीतिक प्रभाव और एनडीए की प्रतिक्रिया

महागठबंधन में यह आंतरिक कलह चुनाव से पहले ही एनडीए को एक बड़ा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक लाभ दे रही है।

  • वोटों का बिखराव (Vote Splitting): जिन 13 सीटों पर महागठबंधन के अपने ही दल लड़ रहे हैं, वहाँ वोटों का सीधा बिखराव होगा। यदि एनडीए का उम्मीदवार मजबूत है, तो यह सीधा त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबला उसके पक्ष में चला जाएगा।
  • एकजुटता पर सवाल: एनडीए के नेताओं ने इस स्थिति पर तंज कसते हुए कहा है कि जो गठबंधन सीटों का बंटवारा नहीं कर सकता, वह बिहार को कैसे चलाएगा। बीजेपी और जेडीयू ने अपनी सूची और उम्मीदवारों को समय पर जारी कर अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया था, जिसके सामने महागठबंधन की यह ‘महाभारत’ एक गंभीर चुनौती बन गई है।
  • डैमेज कंट्रोल की विफलता: नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि समाप्त होने के बाद भी ज़्यादातर विद्रोही उम्मीदवारों का मैदान में डटे रहना यह साबित करता है कि महागठबंधन का शीर्ष नेतृत्व भी अपने बागी नेताओं को मना पाने में विफल रहा है।

निष्कर्ष:

महागठबंधन में ‘फ्रेंडली फाइट’ की स्थिति राजनीतिक रूप से गंभीर है। यह दिखाता है कि सीट बंटवारे को लेकर तेजस्वी यादव के नेतृत्व को अपने सहयोगियों को संतुष्ट करने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी है। यदि ये ‘दोस्ताना मुकाबले’ वास्तव में होते हैं, तो इन 12-13 सीटों पर महागठबंधन की जीत की संभावनाएँ लगभग समाप्त हो जाएंगी, जो कि कांटे की टक्कर वाले इस चुनाव में एक महत्वपूर्ण अंतर पैदा कर सकती है। अब सारा दारोमदार चुनाव प्रचार और मतदाताओं को यह समझाने पर होगा कि आंतरिक मतभेदों के बावजूद, वे एक साझा लक्ष्य के लिए एकजुट हैं।

 

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