चेतावनी: यह विश्लेषण उपलब्ध आँकड़ों, पिछले चुनावी रुझानों और वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम पर आधारित है। चुनाव का परिणाम अप्रत्याशित हो सकता है और यह केवल एक संभावित भविष्यवाणी है, अंतिम परिणाम नहीं।
लौरिया विधानसभा सीट (संख्या 5) पश्चिमी चंपारण जिले के अंतर्गत आती है और इसे भारतीय जनता पार्टी (BJP) का गढ़ माना जाता है।
संभावित विजेता: भारतीय जनता पार्टी (BJP)
लौरिया सीट पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार, विनय बिहारी (वर्तमान विधायक) की जीत की संभावना अधिक है। वह इस सीट पर लगातार तीन बार (2010 में निर्दलीय, 2015 और 2020 में बीजेपी से) जीत हासिल कर चुके हैं और एक मजबूत व्यक्तिगत जनाधार रखते हैं।1
जीतने के पक्ष में विश्लेषणात्मक तथ्य (BJP/विनय बिहारी)
- मजबूत व्यक्तिगत और दलगत पकड़ (हैट्रिक से चौथी बार): विनय बिहारी 2010 से इस सीट पर प्रभावी रहे हैं।2 2020 में, उन्होंने राजद के शंभू तिवारी को 29,004 वोटों (18.80% अंतर) के बड़े मार्जिन से हराया था।3 2015 में भी उनका जीत का अंतर 17,573 वोट था। यह लगातार दूसरी बड़ी जीत उनके और पार्टी के लिए मजबूत आधार को दर्शाती है।
- वोटों का अभेद्य अंतर: 2020 में, विनय बिहारी को 4$77,927$ वोट मिले, जबकि राजद के शंभू तिवारी को 5$48,923$ वोट मिले थे।6 महागठबंधन को इस विशाल अंतर को पाटने के लिए एक असाधारण लहर या रणनीतिक बदलाव की आवश्यकता होगी, जो आसान नहीं दिखता।
- जातीय समीकरण का अनुकूलन: यह क्षेत्र सवर्ण (खासकर ब्राह्मण और भूमिहार) मतदाताओं के साथ-साथ अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) और दलित मतदाताओं के मिश्रण वाला है।
- सवर्ण वोट: बीजेपी का मुख्य सवर्ण वोट बैंक पार्टी और उम्मीदवार के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है।
- EBC/दलित वोट: बीजेपी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और केंद्र/राज्य सरकार की योजनाओं के दम पर EBC और दलित (गैर-पासवान) वोटों के एक बड़े हिस्से को अपने पाले में लाने में सक्षम रही है।
- विपक्षी विभाजन का लाभ: पिछले चुनावों में, राजद और अन्य दलों के बीच बिखराव का सीधा फायदा बीजेपी को मिला था। 2020 में, बसपा के रण कौशल प्रताप सिंह ने भी 7$17,515$ वोट लेकर महागठबंधन के संभावित वोट काटे थे।8 इस बार भी यदि छोटे दल मैदान में उतरते हैं, तो इसका लाभ बीजेपी को मिलेगा।
प्रतिकूल तथ्य और सांख्यिकी (महागठबंधन/विपक्षी उम्मीदवार)
- सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकंबेंसी): विनय बिहारी लगातार तीन बार से विधायक हैं (दो बार बीजेपी से)। इतने लंबे कार्यकाल के बाद कुछ हद तक सत्ता विरोधी भावनाएं होना स्वाभाविक है। यदि महागठबंधन इन भावनाओं को एक मजबूत मुद्दे के रूप में भुनाने में सफल होता है, तो यह चुनौती बढ़ सकती है।
- महागठबंधन का संगठित प्रयास: राजद/महागठबंधन के उम्मीदवार शंभू तिवारी 2020 में उपविजेता रहे थे।9 यदि इस बार महागठबंधन, खासकर राजद प्रमुख तेजस्वी यादव की रैलियों और ‘रोजगार’ के वादे का प्रभाव इस क्षेत्र में ज़ोरदार होता है, तो वह अंतर को कम करने की स्थिति में आ सकते हैं।
- स्थानीय बनाम बाहरी/बदलते चेहरे: यदि बीजेपी, एंटी-इनकंबेंसी को रोकने के लिए विनय बिहारी का टिकट काटती है और कोई नया चेहरा लाती है, तो नए उम्मीदवार को स्थापित होने में समय लग सकता है, जिसका फायदा महागठबंधन उठा सकता है। हालाँकि, वर्तमान स्थिति में विनय बिहारी ही संभावित उम्मीदवार हैं।
प्रमुख विपक्षी उम्मीदवार (RJD/महागठबंधन) के हारने के तथ्य
लौरिया सीट पर महागठबंधन (राजद के शंभू तिवारी मुख्य उम्मीदवार) की हार का मुख्य कारण पिछले दो चुनावों की तरह ही वोटों का विशाल अंतर और सफल राजनीतिक ध्रुवीकरण होगा।
| तथ्य/आँकड़े | लौरिया सीट पर प्रभाव | क्यों हार सकते हैं? |
| विशाल वोट अंतर | 2020 में राजद उम्मीदवार 29,004 वोटों के अंतर से हारे थे। | यह अंतर स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वर्तमान विधायक के पास मजबूत व्यक्तिगत पकड़ और बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक का अटूट समर्थन है। केवल M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण से इसे पाटना मुश्किल होगा। |
| गैर-बीजेपी वोटों का बिखराव | 2020 में बसपा के उम्मीदवार को $17,515$ वोट मिले थे। | राजद अपने पारंपरिक वोटों के अलावा गैर-यादव ओबीसी, दलित और सवर्ण वोटों में सेंध लगाने में विफल रहा है। तीसरे पक्ष के उम्मीदवार (बसपा, जन सुराज आदि) के मैदान में रहने से महागठबंधन के वोट और कटेंगे। |
| महागठबंधन के वादों का सीमित असर | तेजस्वी यादव का मुख्य चुनावी मुद्दा ‘रोजगार’ और ‘स्थायीकर्मी’ का वादा है। | ग्रामीण और जातीय रूप से सवर्ण-प्रभुत्व वाले इस क्षेत्र में, बीजेपी की केंद्रीय नीतियों और राष्ट्रवाद की अपील, महागठबंधन के राज्य स्तरीय वादों पर भारी पड़ सकती है। |
| बीजेपी उम्मीदवार की लोकप्रियता | विनय बिहारी (लोक गायक) की इस क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान और लोकप्रियता है। | एक लोकप्रिय और स्थापित विधायक के खिलाफ लड़ना, जो अपनी पार्टी के मजबूत संगठनात्मक समर्थन के साथ है, महागठबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। |
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