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बैकुंठपुर का महायुद्ध 2025: राजनीति, पलायन और जनता का जनादेश

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में गोपालगंज जिले की बैकुंठपुर विधानसभा सीट (क्रमांक 99) ने फिर से पूरे राज्य का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। यह क्षेत्र न केवल पुराने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का अखाड़ा है, बल्कि यहां की जनता विकास, रोजगार और पलायन जैसे ज्वलंत मुद्दों पर अपनी आवाज़ बुलंद करने को तैयार है ।​


भौगोलिक स्थिति और सामाजिक परिदृश्य

बैकुंठपुर विधानसभा क्षेत्र गंडक नदी के मैदान में स्थित है और गोपालगंज जिले के दो प्रमुख प्रखंडों – बैकुंठपुर और सिधवलिया – के साथ-साथ बरौली प्रखंड के कुछ पंचायतों (रामपुर, सलेमपुर पूर्वी/पश्चिमी, हसनपुर, सादौआ, पिपरा और खजुरिया) को सम्मिलित करता है ।​
यह क्षेत्र गोपालगंज (अनुसूचित जाति) लोकसभा सीट के अंतर्गत आता है। कृषि इसका मुख्य आर्थिक आधार है, जहां धान, गेहूं और गन्ना प्रमुख फसलें हैं ।​

जनसंख्या घनत्व अधिक है, और पलायन यहां की सबसे बड़ी सामाजिक समस्या है। पंजाब, गुजरात, दिल्ली और हरियाणा में बड़ी संख्या में लोग मजदूरी के लिए जाते हैं, जिनकी भेजी गई रकम स्थानीय अर्थव्यवस्था को संबल देती है ।​


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1951 में गठित इस विधानसभा सीट पर अब तक 18 बार चुनाव हो चुके हैं, जिनमें एक उपचुनाव 1996 में हुआ था

बैकुंठपुर की सियासत ने कई दिग्गजों को जन्म दिया। ब्रज किशोर नारायण सिंह ने 1977 से 1990 तक लगातार चार बार जीत दर्ज की। इसके बाद लाल बाबू प्रसाद यादव (जनता दल), मंजीत कुमार सिंह (समता पार्टी/जदयू), देवदत्त प्रसाद यादव (राजद), मिथिलेश तिवारी (भाजपा), और अब प्रेम शंकर प्रसाद (राजद) यहां की राजनीति के प्रमुख चेहरों के रूप में रहे हैं ।​


2020 का चुनाव परिणाम

2020 के विधानसभा चुनाव में बैकुंठपुर में आरजेडी की शानदार वापसी हुई थी।
आरजेडी के प्रेम शंकर प्रसाद ने बीजेपी के मिथिलेश तिवारी को 11,113 वोटों के अंतर से हराकर सीट जीत ली ।​

उम्मीदवार दल वोट वोट शेयर परिणाम
प्रेम शंकर प्रसाद आरजेडी 67,807 37.01% विजेता
मिथिलेश तिवारी बीजेपी 56,694 30.95% पराजित
अन्य उम्मीदवार जदयू/निर्दलीय 35,000 से कम

2015 में इसी सीट पर मिथिलेश तिवारी ने जदयू के मंजीत कुमार सिंह को 14,115 वोटों के अंतर से हराया था। इस बार 2020 की हार बीजेपी के लिए एक राजनीतिक झटका थी, जिसने इसे पुनः “माई समीकरण” (मुस्लिम-यादव गठजोड़) की ओर वापस लौटाया ।​


जातीय समीकरण

बैकुंठपुर का जातीय परिदृश्य बेहद मिश्रित है और यही इसकी राजनीति का मूल आधार है।

जातीय समीकरणों का संतुलन ही बैकुंठपुर के चुनाव का परिणाम तय करता है। यही कारण है कि हर दल यहां मिश्रित सामाजिक रणनीति अपनाता है।


प्रमुख मुद्दे और जनता की चिंताएं

  1. रोजगार और पलायन – रोजगार के अभाव ने युवाओं को बाहर जाने पर मजबूर किया है। गन्ना और धान उत्पादन के बावजूद स्थानीय प्रसंस्करण उद्योग नहीं हैं, जिससे किसान आर्थिक रूप से कमजोर हैं ।​

  2. सड़क और परिवहन – बैकुंठपुर-सिधवलिया मार्ग पूरी तरह जर्जर है। चुनाव घोषणापत्रों में इसका जिक्र बार-बार किया गया है।

  3. शिक्षा और स्वास्थ्य – केवल दो उच्च माध्यमिक विद्यालय और एक डिग्री कॉलेज क्षेत्र में सक्रिय हैं। स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की भारी कमी है ।​

  4. कृषि संकट – गंडक नदी के बारहमासी कटाव से 20 से अधिक गांव प्रभावित हैं। सिंचाई व्यवस्था अव्यवस्थित है।

  5. महिला सुरक्षा और स्व-रोजगार – स्व-सहायता समूहों की योजनाओं का लाभ सीमित समुदायों तक ही पहुंचा है ।​


विकास और सरकार की योजनाएं

राज्य सरकार द्वारा पिछले पांच वर्षों में बैकुंठपुर में कई योजनाएं लागू की गईं:

विरोधी दलों का आरोप है कि जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का असर “असमान” है। युवाओं और किसानों में सरकार के प्रति असंतोष व्याप्त है ।​


राजनीतिक परिदृश्य 2025

2025 के विधानसभा चुनाव में बैकुंठपुर में राजद बनाम भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस क्षेत्र के ग्रामीण और युवा वर्ग के वोट इस चुनाव में निर्णायक होंगे।

एनडीए ने इस बार “विकसित गोपालगंज – आत्मनिर्भर बिहार” नारे के साथ प्रचार शुरू किया है, जबकि आरजेडी “पलायन मुक्त गांव और शिक्षा सुधार” को मुख्य बिंदु बना रही है ।​


महिला और युवा मतदाता

2020 के आंकड़े दर्शाते हैं कि महिला मतदाताओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक रही (पुरुष 56.2% – महिला 57.8%)।
महिला मतदाताओं ने सामाजिक सुरक्षा एवं रोजगार के मुद्दों को प्राथमिकता पर रखा है। युवाओं का रुझान इस बार बहुत निर्णायक हो सकता है, क्योंकि इंजीनियरिंग और ITI प्रशिक्षित बेरोजगारों का समूह “स्थानीय प्रतिनिधित्व” पर सवाल उठा रहा है ।​


संभावित विश्लेषण

चुनावी विशेषज्ञों की राय:


निष्कर्ष

बैकुंठपुर विधानसभा सीट बिहार की राजनीति का एक प्रतीक है — जहां हर दल ने मौका पाया, मगर जनता ने किसी को स्थायी सत्ता नहीं दी। यह सीट चुनावी हवाओं का रुख बदलने की क्षमता रखती है।
2025 का यह चुनाव केवल दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि विकास बनाम पलायनस्थानीय बनाम बाहरी नेतृत्व, और आशा बनाम अविश्वास का निर्णायक संघर्ष होगा ।

 

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