भोरे विधानसभा सीट बिहार के गोपालगंज जिले में स्थित एक अनुसूचित जाति (SC) सुरक्षित सीट है। यह सीट वर्तमान में जनता दल यूनाइटेड (JDU) के कब्जे में है, और निवर्तमान विधायक सुनील कुमार हैं, जो बिहार सरकार में मंत्री भी हैं।1

जीत की संभावना (पूर्वानुमान)

भोरे सीट पर 2020 के चुनाव परिणाम को देखते हुए, यह चुनाव बिहार की सबसे करीबी सीटों में से एक होगा। हालाँकि, निवर्तमान विधायक सुनील कुमार (JDU/NDA) की मंत्री पद की स्थिति, मजबूत गठबंधन समर्थन और व्यक्तिगत छवि के कारण, उनके जीतने की संभावना थोड़ी अधिक है।


विजेता उम्मीदवार के जीतने के मुख्य कारण और विश्लेषण (सुनील कुमार – JDU/NDA)

तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
मंत्री पद का प्रभाव सुनील कुमार वर्तमान में बिहार सरकार में शिक्षा मंत्री हैं। मंत्री होने के कारण उन्हें न केवल प्रशासनिक पहुंच मिलती है, बल्कि उनके द्वारा किए गए विकास कार्यों को गति मिलती है। यह फैक्टर उन्हें महागठबंधन के उम्मीदवार पर बढ़त दिला सकता है।
पारिवारिक राजनीतिक विरासत सुनील कुमार के परिवार का इस सीट पर मजबूत इतिहास रहा है। उनके भाई अनिल कुमार भी 2015 में विधायक थे, और उनके पिता चंद्रिका राम इस क्षेत्र के पहले विधायक और प्रदेश के कृषि मंत्री रह चुके हैं। यह विरासत उन्हें पारंपरिक मतदाताओं का समर्थन सुनिश्चित कराती है।
NDA का संगठित वोट बैंक भोरे सीट पर रविदास (SC) और कोइरी (OBC) जातियों की संख्या 30% से अधिक है। NDA (JDU+BJP) इन जातियों और उच्च जातियों (ब्राह्मण, राजपूत) के वोटों को संगठित करने में सफल रहा है, जो उनकी जीत का मुख्य आधार है।
करीबी जीत के बावजूद निर्णायक कारक 2020 में सुनील कुमार ने CPI(ML) के जितेंद्र पासवान को केवल 462 वोटों (0.30%) के अंतर से हराया था। यह जीत भले ही करीबी थी, लेकिन यह दिखाती है कि निर्णायक क्षण में उनका व्यक्तिगत प्रभाव और JDU का आधार उनके पक्ष में था।

अन्य उम्मीदवार के न जीतने के प्रतिकूल तथ्य और सांख्यिकी (जितेंद्र पासवान – CPI(ML)L/महागठबंधन)

प्रतिकूल तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
सबसे करीबी हार का दबाव CPI(ML)L के जितेंद्र पासवान ने 2020 में केवल 462 वोटों से हार का सामना किया था। इतनी करीबी हार के बाद, महागठबंधन के लिए इस अंतर को पाटना एक बड़ी चुनौती होगी, खासकर तब जब JDU उम्मीदवार मंत्री बन चुके हैं।
गैर-NDA वोट का संभावित विभाजन महागठबंधन का आधार यादव (12.50%) और मुस्लिम (11.10%) वोट हैं। हालाँकि, 2025 में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी द्वारा ट्रांसजेंडर समुदाय की प्रीति किन्नर को टिकट दिए जाने जैसी बाहरी चुनौतियों से गैर-NDA वोट में विभाजन हो सकता है, जिसका सीधा फायदा JDU को मिलेगा।
CPI(ML) की सीमित पहुंच CPI(ML)L की पकड़ मुख्य रूप से दलितों और अति-पिछड़ों के एक विशिष्ट तबके तक सीमित है। JDU उम्मीदवार के मंत्री बनने के बाद, विकास और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने पर, पार्टी के लिए इस आधार में पैठ बनाना कठिन हो सकता है।
एनडीए का मजबूत लोकसभा प्रदर्शन भोरे विधानसभा क्षेत्र गोपालगंज लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है, जहाँ 2009 से अब तक सभी लोकसभा चुनावों में NDA को बढ़त मिलती रही है। यह प्रवृत्ति विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के खिलाफ जा सकती है।

निष्कर्ष:

भोरे (SC) सीट पर मुकाबला 2025 में भी महा-टक्कर वाला ही रहेगा, क्योंकि 2020 में जीत का अंतर बहुत कम था। हालांकि, सुनील कुमार (JDU/NDA) का मंत्री पद, परिवार की राजनीतिक विरासत और NDA का संगठित आधार उन्हें एक छोटी सी बढ़त प्रदान करता है। महागठबंधन के उम्मीदवार जितेंद्र पासवान (CPI(ML)L) को यह सीट जीतने के लिए न केवल अपने पारंपरिक M-Y (मुस्लिम-यादव) और दलित वोटों को एकजुट रखना होगा, बल्कि अन्य छोटे दलों और नए चेहरों से होने वाले संभावित वोट विभाजन को भी रोकना होगा।

(अस्वीकरण: यह विश्लेषण 2025 के चुनाव से पहले के उपलब्ध ऐतिहासिक आँकड़ों, राजनीतिक रुझानों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। चुनाव परिणाम अंतिम समय के राजनीतिक बदलाव, गठबंधन की स्थिति और मतदान पैटर्न पर निर्भर करते हैं।)

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