भोरे विधानसभा क्षेत्र (निर्वाचन क्षेत्र संख्या 103) बिहार के गोपालगंज जिले की एक महत्वपूर्ण विधानसभा सीट है, जो अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित है। यह सीट गोपालगंज लोकसभा सीट का हिस्सा भी है और हमेशा से राजनीतिक रूप से संवेदनशील रही है। यहाँ के मतदाता जातिगत समीकरण, आर्थिक समस्याएं, स्थानीय नेतृत्व और विकास को लेकर बहुत सजग रहते हैं। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी भोरे सीट पर कड़ा मुकाबला प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलेगा, खासकर जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और माकपा (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के बीच ।​


भौगोलिक और जनसांख्यिकीय परिचय

भोरे विधानसभा क्षेत्र में गोपालगंज के कटेया, विजयीपुर और भोरे प्रखंड आते हैं। यह क्षेत्र कृषि प्रधान है और सामाजिक रूप से दलित और पिछड़ी जातियों की आबादी प्रमुख है। कुल मतदाता लगभग 3,32,251 हैं। 2020 में यहां कुल 42.36% वोटिंग हुई थी, जो कि राज्य के औसत के मुकाबले संतोषजनक मानी गई। वोटरों में अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति और मुस्लिम समुदाय की अच्छी भागीदारी होती है ।​


चुनावी इतिहास और प्रमुख नतीजे

भोरे सीट की स्थापना 1957 में हुई थी। तब से लेकर अब तक यह क्षेत्र विभिन्न दलों के लिए राजनीतिक संघर्ष का मैदान रहा है।

  • 2020 में जदयू के सुनील कुमार ने माकपा लिबरेशन के जितेंद्र पासवान को सिर्फ 462 वोटों के अंतर से हराकर जीत हासिल की थी। सुनील कुमार को 74,067 वोट मिले जबकि जितेंद्र पासवान को 73,605 वोट मिले। यह चुनाव क्षेत्र के हिसाब से बेहद करीबी रहा और जिसने उम्मीद जताई कि 2025 में फिर सघन मुकाबला देखने को मिलेगा।

  • पहले के चुनावों में जदयू, राजद, कांग्रेस, माकपा लिबरेशन और एलजेपी सहित कई पार्टियों ने यहां मैदान मारा है, और अक्सर यह सीट राजनीतिक दलों के लिए चुनौती साबित होती रही है ।​

वर्ष विजेता दल वोट अंतर
2020 सुनील कुमार जदयू 462
2015 अनिल कुमार कांग्रेस 14,871
2010 इंद्रदेव मांझी बीजेपी
2005 श्रीनारायण यादव राजद -740

जातीय-सामाजिक समीकरण

भोरे विधानसभा क्षेत्र में दलित, पिछड़ी जाति, अति पिछड़ी जाति और मुस्लिम समुदाय की संख्या अधिकांश है।

  • दलित और अनुसूचित जाति समुदाय यहाँ के चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

  • इस क्षेत्र में पिछड़ी जातियों की भी अच्छी संख्या है, जो कई बार समूचे चुनाव के परिणाम को प्रभावित करती है।

  • मुस्लिम वोटर्स की संख्या भी पर्याप्त है, जिससे क्षेत्र की राजनीति और भी जटिल होती है।

  • यहां के मतदाता मुख्यतः जातिगत पहचान से कुछ ऊपर उठकर उम्मीदवार और पार्टी के विकास के एजेंडे के आधार पर मतदान करते हैं ।​


प्रमुख राजनीतिक मुद्दे

  1. रोजगार और पलायन:
    बेरोजगारी बड़ी समस्या है और युवाओं में पलायन की प्रवृत्ति अधिक है। कृषि सीमित रोजगार उपलब्ध कराता है, जिससे मजबूर मेहनतकश बाहर जाते हैं।

  2. सड़क और आधारभूत सुविधाएं:
    ग्रामीण इलाकों में यातायात और रास्तों की समस्या प्रमुख रही है, जिससे विकास कार्य प्रभावित होते रहे हैं।

  3. शिक्षा और स्वास्थ्य:
    प्राथमिक शिक्षा केंद्रों की कमी, शिक्षक-छात्र अनुपात कम, और स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता में कमी भी वोटरों की चिंता के मुख्य विषय हैं।

  4. कृषि सिंचाई और जल व्यवस्थाएं:
    सिंचाई की अच्छी व्यवस्था नहीं है, जिससे कृषि उत्पादन प्रभावित हो रहा है।

  5. महिला सशक्तिकरण:
    महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए योजनाएं तो हैं, पर उनका व्यापक कार्यान्वयन अभी बाकी है।


2025 के चुनावी समीकरण

2025 विधानसभा चुनाव में भोरे सीट पर मुख्य मुकाबला जदयू के सुनील कुमार और माकपा (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के जितेंद्र पासवान के बीच माना जा रहा है।

  • जदयू की मजबूत पकड़, नीतीश कुमार के विकास मॉडल और सुनील कुमार के व्यक्तिगत प्रभाव पर वोटर भरोसा करते दिख रहे हैं।

  • माकपा लिबरेशन की जमीनी पकड़ और मेहनती संगठनात्मक कार्य क्षेत्र में उन्हें चुनौती देता है।

  • स्थानीय लोगों का रुझान विकास कार्यों और सामाजिक न्याय के साथ दलित और पिछड़ी जाति के मुद्दों पर भी है।


निष्कर्ष

भोरे विधानसभा क्षेत्र बिहार की राजनीति की एक झलक है, जहां विकास की उम्मीदें और सामाजिक चेतना दोनों गहरे जुड़े हुए हैं। 2020 के बेहद करीबी चुनाव ने इस सीट को राजनीतिक नज़रिए से और भी महत्वपूर्ण बना दिया है।
2025 का चुनाव यहां न केवल जदयू और वामपंथ के बीच टक्कर होगा, बल्कि यह एक सामाजिक और विकासात्मक परीक्षा भी है। जनता तय करेगी कि विकास की राह पर आगे बढ़ना है या पुरानी राजनीति को नया मौका देना है।
भोरे की जनता की यह लड़ाई बिहार के उन हिस्सों में से है जहां बदलाव की पुकार सबसे तेज है और परिणाम प्रदेश के लिए महत्वपूर्ण संकेत होंगे.

 

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