कटिहार जिले की मनिहारी (सुरक्षित/ST) विधानसभा सीट पर बिहार चुनाव 2025 में एक दिलचस्प मुकाबला देखने को मिलेगा। यह सीट महागठबंधन (कांग्रेस) के मजबूत गढ़ के रूप में स्थापित हो चुकी है।
गहन विश्लेषण के आधार पर, इस सीट पर एक बार फिर मनोहर प्रसाद सिंह (कांग्रेस) की जीत की संभावना अधिक है, लेकिन NDA गठबंधन का नया समीकरण कड़ी चुनौती पेश करेगा।
विजेता की संभावित जीत के पक्ष में विश्लेषण (महागठबंधन – मनोहर प्रसाद सिंह, कांग्रेस)
संभावित विजेता: मनोहर प्रसाद सिंह (कांग्रेस)
1. मजबूत व्यक्तिगत प्रभाव और लगातार जीत का रिकॉर्ड:
- हैट्रिक विधायक: मनोहर प्रसाद सिंह इस सीट से लगातार तीन बार (2010, 2015, 2020) विधायक चुने गए हैं। यह उनकी मजबूत व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय लोगों से जुड़ाव और उम्मीदवार-केंद्रित राजनीति को दर्शाता है।
- बड़ा जीत का अंतर (2020): 2020 के चुनाव में उन्होंने 21,209 वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की थी, जो एक मजबूत जनाधार का प्रमाण है। उन्हें 83,032 वोट मिले थे, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 61,823 वोट मिले।
2. महागठबंधन का अभेद्य ‘MY+ST’ समीकरण:
- मुस्लिम मतदाता: मनिहारी में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 39% है, जो किसी भी चुनाव का रुख तय करने के लिए निर्णायक हैं। यह कोर वोट बैंक (मुस्लिम-यादव, MY) महागठबंधन के पक्ष में मजबूती से खड़ा रहता है।
- अनुसूचित जनजाति (ST) का प्रभाव: यह सीट ST के लिए आरक्षित है, और यहां संथाल और उरांव समुदायों की अच्छी खासी आबादी है (लगभग 13% ST वोटर)। पारंपरिक रूप से, इस क्षेत्र के आदिवासी मतदाता भी कांग्रेस और विपक्षी दलों पर भरोसा दिखाते आए हैं, जिससे मनोहर सिंह को बड़ा लाभ मिलता है।
- कांग्रेस का वर्चस्व: मनिहारी सीट का इतिहास कांग्रेस के प्रभुत्व वाला रहा है। बीजेपी आज तक यहां अपना खाता नहीं खोल पाई है।
3. सत्ता विरोधी लहर का कम प्रभाव:
- विधायक मनोहर प्रसाद सिंह स्वयं विपक्ष से हैं, इसलिए उन पर राज्य सरकार के खिलाफ कोई सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) काम नहीं करेगी, बल्कि उन्हें अपने कार्यकाल के कामों का सीधा फायदा मिलेगा।
अन्य उम्मीदवार की संभावित हार के प्रतिकूल तथ्य (NDA – शंभू कुमार सुमन, JDU)
मुख्य चुनौती/संभावित उपविजेता: शंभू कुमार सुमन (JDU)
1. JDU उम्मीदवार की लगातार हार:
- विपरीत परिणाम: JDU के शंभू कुमार सुमन 2020 में 21,209 वोटों के बड़े अंतर से हारे थे। यह दर्शाता है कि वे कांग्रेस उम्मीदवार के व्यक्तिगत प्रभाव के आगे टिक नहीं पाए।
- गठबंधन की अस्थिरता: जदयू के उम्मीदवार ने 2020 का चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़ा था, लेकिन 2025 में NDA की राजनीतिक स्थिति और गठबंधनों में लगातार बदलाव JDU उम्मीदवार के पक्ष में असमंजस पैदा कर सकता है।
2. पारंपरिक NDA वोट बैंक का कमजोर पड़ना:
- ‘MY’ के सामने कमज़ोर: मनिहारी के मजबूत मुस्लिम-यादव समीकरण के सामने NDA का पारंपरिक उच्च जाति और EBC वोट बैंक संख्या में कम पड़ जाता है।
- लोजपा के वोटों पर निर्भरता: 2020 में लोजपा (LJP) ने यहाँ अकेले चुनाव लड़कर लगभग 20 हजार वोट हासिल किए थे। इस बार अगर लोजपा NDA के साथ मिलकर लड़ती है, तो ये वोट JDU उम्मीदवार को ट्रांसफर हो सकते हैं। यह एकमात्र बड़ा कारक है जो NDA की जीत की उम्मीद जगा सकता है। यदि ये वोट पूरी तरह ट्रांसफर नहीं होते हैं, तो JDU की हार तय है।
3. तीसरा मोर्चा (जन सुराज) की चुनौती:
- वोट-कटवा की भूमिका: जन सुराज पार्टी के बबलू सोरेन जैसे उम्मीदवार अगर मजबूत आदिवासी वोट बैंक में सेंध लगाते हैं, तो यह सीधे तौर पर JDU को उतना नुकसान नहीं पहुंचाएगा, जितना यह महागठबंधन को पहुंचा सकता है। लेकिन अगर ये वोट NDA के EBC वोटों को काटते हैं, तो JDU की राह और कठिन हो जाएगी।
निष्कर्ष
मनिहारी सीट पर मनोहर प्रसाद सिंह (कांग्रेस) की जीत की संभावना सबसे अधिक है, क्योंकि उनके पास मजबूत व्यक्तिगत आधार, मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण का बड़ा समर्थन और आदिवासी (ST) मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा है।
JDU के शंभू कुमार सुमन के लिए जीत की राह तभी खुलेगी जब NDA का पूरा वोट बैंक (जिसमें लोजपा के पुराने वोट शामिल हैं) एकजुट हो जाए और वह कांग्रेस के मजबूत जनाधार में सेंध लगा पाए। वर्तमान राजनीतिक और संख्यात्मक समीकरण महागठबंधन के पक्ष में दिखते हैं।
