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महाराजगंज का राजनीतिक उलटफेर: कांग्रेस की ‘पतली जीत’ पर NDA की ‘बड़ी बढ़त’ का साया! क्या 2025 में पलटेगी बाजी?

महाराजगंज विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। यह सीट वर्तमान में कांग्रेस (महागठबंधन का हिस्सा) के पास है, जिन्होंने 2020 में एक बेहद करीबी मुकाबले में जीत हासिल की थी।1 हालांकि, हालिया लोकसभा चुनावों के रुझानों को देखते हुए, 2025 में यह सीट एक बड़ा उलटफेर देख सकती है।

जीत की संभावना (पूर्वानुमान)

वर्तमान में, 2024 लोकसभा चुनाव के विधानसभा-वार परिणामों और पारंपरिक राजनीतिक रुझानों के आधार पर, जनता दल (यूनाइटेड) / NDA के उम्मीदवार के लिए यह सीट जीतने की संभावना अधिक (Higher) है। यह सीट एक कांटे का मुकाबला होगी, लेकिन NDA का मजबूत आधार पलड़ा भारी करता है।


विजेता उम्मीदवार के जीतने के मुख्य कारण और विश्लेषण (JD(U) / NDA)

तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
लोकसभा 2024 में प्रचंड बढ़त 2024 के लोकसभा चुनाव में, NDA उम्मीदवार (BJP के जनार्दन सिंह सिग्रीवाल) ने महाराजगंज विधानसभा क्षेत्र में 20,738 वोटों की भारी बढ़त हासिल की थी। यह बढ़त सीधे तौर पर NDA गठबंधन के पक्ष में मजबूत जनाधार का संकेत देती है, भले ही विधानसभा चुनाव के मुद्दे अलग हों।
सीट का पारंपरिक रुझान इस सीट पर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) या भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कभी जीत हासिल नहीं की है। हालांकि, जनता दल (यूनाइटेड) (JDU) ने 2005 और 2015 सहित (समता पार्टी के साथ मिलाकर) पाँच बार यह सीट जीती है। JDU का यहां मजबूत आधार रहा है, और NDA गठबंधन में JDU के उम्मीदवार (संभावित रूप से हेम नारायण साह, जो 2020 में उपविजेता थे) को BJP का पूरा वोट ट्रांसफर होने से बड़ी मदद मिलेगी।
वैश्य/अति पिछड़ा वोट का ध्रुवीकरण JDU के संभावित उम्मीदवार हेम नारायण साह वैश्य समुदाय से आते हैं। महाराजगंज में वैश्य समुदाय का एक बड़ा हिस्सा है, जो पारंपरिक रूप से NDA का समर्थक रहा है। वैश्य समुदाय के मतों का एकमुश्त और प्रभावी ध्रुवीकरण NDA को निर्णायक बढ़त दिला सकता है।
कम वोट प्रतिशत (2020) 2020 में कांग्रेस की जीत का वोट प्रतिशत केवल 30.1% था, जो एक मजबूत जनादेश नहीं था। साथ ही, पिछली बार LJP के उम्मीदवार द्वारा 18,278 वोट काटे गए थे, जिससे NDA को नुकसान हुआ था। इस बार NDA में एकता से उन वोटों के वापस आने की संभावना है।

अन्य उम्मीदवार के न जीतने के प्रतिकूल तथ्य और सांख्यिकी (कांग्रेस / महागठबंधन)

प्रतिकूल तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
बहुत कम जीत का अंतर (2020) कांग्रेस के विजय शंकर दुबे ने 2020 में यह सीट केवल 1,976 वोटों (1.2% मार्जिन) के बहुत कम अंतर से जीती थी। यह दर्शाता है कि उनकी जीत किसी मजबूत लहर के कारण नहीं, बल्कि JDU विरोधी वोटों के बँटवारे (LJP के कारण) का परिणाम थी। यह मार्जिन 2025 में आसानी से पलटा जा सकता है।
M-Y वोट बैंक का बिखराव हालांकि कांग्रेस महागठबंधन के M-Y (मुस्लिम-यादव) बेस पर निर्भर करती है, 2020 में RJD के बजाय कांग्रेस को टिकट मिलने से यादव वोट का एक हिस्सा कम सक्रिय रहा था। इसके अलावा, JDU के वैश्य उम्मीदवार के सामने मुकेश सहनी की VIP जैसी पार्टियों की संभावित एंट्री से वैश्य वोट पर असर पड़ सकता है, लेकिन अगर JDU वैश्य उम्मीदवार उतारती है, तो RJD/कांग्रेस के लिए गैर-M-Y वोट जुटाना और भी मुश्किल होगा।
वर्तमान विधायक के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) विधायक विजय शंकर दुबे को 48 साल बाद कांग्रेस को यह सीट दिलाने का श्रेय है, लेकिन 2020 के बाद विधायक के प्रदर्शन को लेकर स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधि की अनुपस्थिति के मुद्दे उठते रहे हैं। यह सत्ता विरोधी लहर महागठबंधन को भारी पड़ सकती है।
कम मतदान प्रतिशत इस सीट पर मतदान प्रतिशत (2020 में 53.3%) अपेक्षाकृत कम रहा है। कम मतदान अक्सर उस गठबंधन को नुकसान पहुंचाता है जो अपने आधार मतदाताओं (जैसे महागठबंधन का M-Y) को बड़े पैमाने पर बूथ तक नहीं ला पाता है। यदि 2025 में मतदान कम रहता है, तो इसका लाभ NDA के दृढ़ मतदाता वर्ग को मिल सकता है।

यह विश्लेषण उपलब्ध चुनावी डेटा, जातीय समीकरणों और हालिया राजनीतिक रुझानों पर आधारित है। महाराजगंज एक हाई-रिस्क सीट है जहाँ जीत का अंतर हमेशा कम रहा है। 2024 लोकसभा की बढ़त NDA को स्पष्ट लाभ दे रही है, लेकिन महागठबंधन की स्थानीय रणनीति और उम्मीदवार की व्यक्तिगत लोकप्रियता अंतिम परिणाम को प्रभावित कर सकती है।

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