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मांझी का ‘वामपंथी किला’ खतरे में: क्या NDA का ‘राजपूत-सवर्ण’ समीकरण 2025 में करेगा वापसी?

मांझी विधानसभा सीट सारण जिले (छपरा) की एक ऐसी सीट है जिसने हाल के चुनावों में अप्रत्याशित परिणाम दिए हैं। यह सीट वर्तमान में महागठबंधन के घटक दल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) – CPI(M) के कब्जे में है, जिसके विधायक डॉ. सत्येन्द्र यादव हैं। 2025 के चुनाव में, यह सीट एक बार फिर महागठबंधन और NDA के बीच सीधा मुकाबला बनने जा रही है, लेकिन हालिया चुनावी रुझान NDA के लिए सकारात्मक संकेत दे रहे हैं।

जीत की संभावना (पूर्वानुमान)

वर्तमान राजनीतिक माहौल और 2024 लोकसभा चुनाव के विधानसभा-वार नतीजों के आधार पर, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के उम्मीदवार के लिए यह सीट जीतने की संभावना अधिक (Higher) है। 2020 में महागठबंधन की संयुक्त ताकत से मिली जीत को 2024 के लोकसभा चुनाव में NDA ने पलट दिया है, जिससे यहाँ मुकाबला NDA के पक्ष में झुक गया है।


विजेता उम्मीदवार के जीतने के मुख्य कारण और विश्लेषण (NDA – संभावित उम्मीदवार BJP/JD(U))

तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
लोकसभा 2024 में निर्णायक बढ़त 2024 के लोकसभा चुनाव में, NDA उम्मीदवार (BJP/JD(U)) ने मांझी विधानसभा क्षेत्र में 4,866 वोटों की महत्वपूर्ण बढ़त हासिल की। 2020 में विधानसभा सीट हारने के बावजूद, लोकसभा में बढ़त मिलना यह दर्शाता है कि अधिकांश मतदाता ‘मोदी-नीतीश’ के संयुक्त नेतृत्व में विश्वास रखते हैं, जिससे NDA के पास खोई हुई जमीन वापस पाने का मजबूत आधार है।
जातीय समीकरण (राजपूत-सवर्ण प्रभाव) मांझी की राजनीति जातीय समीकरणों से प्रभावित रही है, जहाँ राजपूत सबसे बड़ा जातीय समूह है, जिसके बाद यादव, मुस्लिम, भूमिहार और ब्राह्मण मतदाता आते हैं। यह सीट पारंपरिक रूप से राजपूत और सवर्ण मतदाताओं के वर्चस्व वाली रही है। यदि NDA (संभवतः BJP) एक मजबूत राजपूत या सवर्ण उम्मीदवार को मैदान में उतारता है, तो यह मजबूत कोर वोट बैंक NDA की जीत सुनिश्चित कर सकता है।
2020 में विपक्ष के वोटों का बिखराव 2020 में CPI(M) की जीत (37.56% वोट शेयर) इसलिए संभव हुई क्योंकि NDA के वोट तीन भागों में बँट गए थे: 1. JDU की माधवी कुमारी (34,266 वोट), 2. निर्दलीय राणा प्रताप सिंह (52,736 वोट)। यदि NDA इस बार राणा प्रताप सिंह जैसे मजबूत चेहरे को अपने खेमे में शामिल कर लेता है या एक संयुक्त उम्मीदवार उतारता है, तो बिखराव समाप्त हो जाएगा और NDA की निर्णायक जीत हो सकती है।
एंटी-इनकम्बेंसी का खतरा वर्तमान विधायक डॉ. सत्येन्द्र यादव CPI(M) से हैं। उनके खिलाफ स्थानीय स्तर पर विकास के मुद्दे, विशेषकर बाढ़ और सिंचाई की समस्याओं को लेकर सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) का खतरा हो सकता है। NDA इन स्थानीय मुद्दों को हवा देकर सत्ता विरोधी मतों को अपने पक्ष में मजबूत कर सकता है।

अन्य उम्मीदवार के न जीतने के प्रतिकूल तथ्य और सांख्यिकी (CPI(M) / महागठबंधन)

प्रतिकूल तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
2024 लोकसभा चुनाव में पिछड़ना 2020 में 25,386 वोटों के बड़े अंतर से जीतने के बावजूद, महागठबंधन 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी विधानसभा क्षेत्र से 4,866 वोटों से पीछे रह गया। यह स्पष्ट संकेत है कि महागठबंधन का संयुक्त वोट आधार (M-Y + वामपंथी/SC) पूरी तरह से एकजुट नहीं रह पाया या NDA ने अपने बेस को मजबूत कर लिया।
केवल M-Y पर निर्भरता का जोखिम CPI(M) उम्मीदवार को मुख्य रूप से RJD के यादव (Y) और मुस्लिम (M) वोट बैंक का लाभ मिलता है, साथ ही वाम दलों के पारंपरिक आधार का भी। लेकिन राजपूत, भूमिहार और गैर-यादव ओबीसी (OBC) मतों के NDA के पक्ष में मजबूत ध्रुवीकरण के कारण, केवल M-Y समीकरण के भरोसे जीत दोहराना बहुत कठिन होगा।
विधायक का कम लोकप्रिय होना डॉ. सत्येन्द्र यादव की 2020 की जीत महागठबंधन की ‘साझा रणनीति’ का परिणाम थी, न कि केवल उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता का। यदि NDA एक मजबूत सवर्ण/राजपूत उम्मीदवार उतारता है, तो CPI(M) उम्मीदवार के लिए व्यक्तिगत रूप से उस लहर का मुकाबला करना चुनौतीपूर्ण होगा।
सीट शेयरिंग में खींचतान (संभावित) महागठबंधन के भीतर मांझी सीट को लेकर RJD, कांग्रेस और CPI(M) के बीच टिकट की खींचतान हो सकती है। यदि यह सीट फिर से CPI(M) को मिलती है, तो RJD या कांग्रेस के स्थानीय दावेदार असंतोष व्यक्त कर सकते हैं, जिससे ‘फ्रेंडली फाइट’ (Friendly Fight) या वोटों के आंतरिक बिखराव का खतरा बढ़ सकता है, जिसका सीधा फायदा NDA को मिलेगा।

यह विश्लेषण उपलब्ध चुनावी डेटा, जातीय समीकरणों और हालिया राजनीतिक रुझानों पर आधारित है। 2024 लोकसभा चुनाव में NDA की बढ़त और 2020 विधानसभा चुनाव में वोटों का बिखराव इस बात का संकेत है कि NDA इस बार मांझी सीट पर एक मजबूत दावेदार है।

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