पटना, 23 अक्टूबर 2025: बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेतृत्व वाले महागठबंधन (ग्रैंड अलायंस) ने मुख्यमंत्री पद के लिए तेजस्वी यादव के नाम की घोषणा के साथ ही, विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के प्रमुख मुकेश सहनी को उप-मुख्यमंत्री (Deputy CM) पद का उम्मीदवार घोषित कर एक बड़ा राजनीतिक दांव चला है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पटना में आयोजित संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह ऐलान किया। इस घोषणा ने न केवल महागठबंधन के भीतर के आंतरिक मतभेदों को खत्म किया, बल्कि बिहार के चुनावी समीकरणों को भी एक नया आयाम दे दिया है।
डिप्टी सीएम पद की घोषणा: पर्दे के पीछे का नाटकीय घटनाक्रम
मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम का चेहरा बनाने के पीछे का घटनाक्रम काफी नाटकीय रहा। सूत्रों के मुताबिक, घोषणा से ठीक पहले सहनी ने अपनी मांग पर अड़ गए थे, जिसने गठबंधन के नेताओं के लिए सिरदर्द पैदा कर दिया।
- अंतिम क्षण की मांग: संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस से ठीक पहले, मुकेश सहनी, जो पटना के एक होटल में ठहरे हुए थे, ने गठबंधन की बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया। सूत्रों के अनुसार, सहनी ने तर्क दिया कि उन्होंने कम सीटों (वीआईपी को 15 सीटें मिलीं) पर समझौता इस उम्मीद में किया था कि उन्हें गठबंधन में ‘सम्मानजनक स्थान’ मिलेगा, जिसका अर्थ है उप-मुख्यमंत्री पद। उनका मानना था कि अगर वह बिना किसी बड़े पद के अपने समर्थकों के बीच जाते हैं, तो वह संदेश नहीं दे पाएंगे।
- गहलोत का हस्तक्षेप: इस “आख़िरी वक़्त की डिमांड” को सुलझाने के लिए कांग्रेस के पर्यवेक्षक अशोक गहलोत को दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान से बात करनी पड़ी। सूत्रों के हवाले से पता चला कि हाईकमान से हरी झंडी मिली, जिसमें यह कहा गया कि मल्लाह (निषाद) समुदाय का वोट महागठबंधन के लिए निर्णायक है, इसलिए सहनी को डिप्टी सीएम फेस घोषित कर देना चाहिए।
- सार्वजनिक ऐलान: इसके बाद गहलोत ने घोषणा की कि तेजस्वी यादव सीएम उम्मीदवार होंगे और मुकेश सहनी डिप्टी सीएम। गहलोत ने यह भी कहा कि अगर महागठबंधन की सरकार बनती है, तो सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए अन्य समुदायों (एक मुस्लिम और एक दलित) से भी उप-मुख्यमंत्री बनाए जाएंगे।
सामाजिक इंजीनियरिंग: अति पिछड़ा वर्ग को साधने की रणनीति
मुकेश सहनी को उप-मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना महागठबंधन की एक गहरी सामाजिक इंजीनियरिंग का हिस्सा माना जा रहा है।
- ‘सन ऑफ मल्लाह’ का प्रभाव: मुकेश सहनी खुद को ‘सन ऑफ मल्लाह’ (मल्लाह का बेटा) कहकर पुकारते हैं। बिहार जाति सर्वेक्षण 2023 के अनुसार, निषाद समुदाय (मल्लाह, बिंद, मांझी, केवट, तुरहा सहित) बिहार की आबादी का लगभग 9.6% हिस्सा है, जिसमें सहनी के मल्लाह उप-जाति की हिस्सेदारी 2.6% है। यह वोट बैंक पारंपरिक रूप से अति पिछड़ा वर्ग (EBC) का हिस्सा है, जिसे बिहार में ‘किंगमेकर’ माना जाता है।
- एमवाई (MY) प्लस ईबीसी (EBC) समीकरण: आरजेडी का कोर वोट बैंक मुस्लिम-यादव (MY – लगभग 32%) माना जाता है। सहनी को जोड़कर महागठबंधन इस कोर वोट बैंक में ईबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) के वोट को जोड़ना चाहता है। सहनी के दावे के अनुसार, उनका वोट 12% तक हो सकता है, जिससे गठबंधन की वोट हिस्सेदारी 60% के आंकड़े को छू सकती है।
- नेतृत्व का अभाव भरना: कर्पूरी ठाकुर जैसे समाजवादी नेता के बाद, बिहार में अति पिछड़ा वर्ग का कोई सर्वमान्य नेता नहीं उभरा है। 44 वर्षीय मुकेश सहनी उसी रिक्तता को भरने का प्रयास कर रहे हैं। महागठबंधन को उम्मीद है कि सहनी को डिप्टी सीएम चेहरा बनाने से ईबीसी वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा एनडीए से छिटक कर उनकी तरफ आ सकता है।
मुकेश सहनी: ‘सेट डिज़ाइनर से राजनेता’ का सफर
मुकेश सहनी का राजनीतिक सफर फिल्मी कहानी जैसा है।
- बॉलीवुड से राजनीति तक: दरभंगा के सुपौल बाजार के रहने वाले मुकेश सहनी ने 18 साल की उम्र में बेहतर जिंदगी की तलाश में मुंबई का रुख किया था। स्कूल ड्रॉपआउट रहे सहनी ने कड़ी मेहनत से बॉलीवुड में एक सफल सेट डिज़ाइनर के रूप में पहचान बनाई। उनकी कंपनी ‘मुकेश सिने वर्ल्ड’ ने ‘देवदास’ (2002) और ‘बजरंगी भाईजान’ (2015) जैसी बड़ी फिल्मों में काम किया।
- निषाद आरक्षण की लड़ाई: 2008 में अपने गाँव लौटने पर, निषाद समाज की सामाजिक और आर्थिक स्थिति देखकर उन्होंने समाज के लिए काम करने का फैसला किया। 2010 में उन्होंने ‘सहनी समाज कल्याण संस्था’ की स्थापना की और निषाद समाज के लिए आरक्षण की लड़ाई लड़ी।
- राजनीतिक पारी: 2015 के विधानसभा चुनाव में वह भाजपा के प्रचारक के रूप में उभरे। निषाद समुदाय को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा नहीं मिलने पर, उन्होंने 2018 में अपनी पार्टी ‘विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी)’ की स्थापना की। 2020 में, वह एनडीए का हिस्सा बने और उनकी पार्टी ने 11 सीटों में से चार पर जीत हासिल की। हालांकि, 2022 में भाजपा से रिश्ते बिगड़ने पर उनके तीन विधायक भाजपा में शामिल हो गए और उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद वह फिर से महागठबंधन में शामिल हुए।
मुकेश सहनी की प्रतिक्रिया और बीजेपी पर हमला
डिप्टी सीएम उम्मीदवार घोषित होने के बाद, मुकेश सहनी भाजपा पर पूरी तरह हमलावर हो गए।
- ‘इंतजार खत्म’: सहनी ने कहा, “मैं साढ़े तीन साल से इस घड़ी का इंतजार कर रहा था। अब वो घड़ी आ गई है। सिर्फ मुकेश सहनी ही नहीं, पार्टी के लाखों लोग इसका इंतजार कर रहे थे।”
- ‘बीजेपी को तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं’: उन्होंने भाजपा पर उनकी पार्टी तोड़ने का आरोप लगाते हुए गंगाजल हाथ में लेकर लिया गया अपना संकल्प दोहराया। सहनी ने कहा, “भाजपा को जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं।”
- चुनावी मैदान से दूर, प्रचार पर फोकस: सहनी ने स्पष्ट किया है कि वह खुद विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, बल्कि अपनी पार्टी के सभी 15 प्रत्याशियों और महागठबंधन के लिए पूरे बिहार की 243 सीटों पर प्रचार करेंगे। उनका उद्देश्य अपनी सीट जीतकर डिप्टी सीएम बनना नहीं, बल्कि महागठबंधन की जीत सुनिश्चित कर उस पद को हासिल करना है।
राजनीतिक विश्लेषण और प्रभाव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव के बाद मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम का चेहरा बनाना एक साहसिक कदम है, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं:
- सकारात्मक प्रभाव: यह घोषणा महागठबंधन को एक मजबूत सामाजिक आधार प्रदान करती है, खासकर ईबीसी वोट बैंक को आकर्षित करके। यह महागठबंधन की ‘जंगल राज’ की छवि को भी चुनौती देने की कोशिश करता है, क्योंकि यह निषाद समुदाय के एक युवा नेता को नेतृत्व में जगह देता है।
- चुनौतियाँ: हालांकि, यह घोषणा भाजपा को “यादव राज की वापसी” का डर दिखाकर सवर्ण, बनिया, और अति पिछड़े समुदायों (गैर-निषाद ईबीसी) को एकजुट करने का मौका भी दे सकती है। भाजपा इस घोषणा को एमवाई और निषाद समुदाय के ध्रुवीकरण के रूप में पेश करके शेष हिंदू वोटों को लामबंद करने का प्रयास कर सकती है।
कुल मिलाकर, महागठबंधन का यह फैसला सत्ता की लड़ाई से परे, बिहार की जटिल जाति और सामाजिक राजनीति में संतुलन बनाने का एक प्रयास है। मुकेश सहनी, जिसके पास शून्य विधायक हैं, को इतना बड़ा पद देना आरजेडी और कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी और ईबीसी वोटों की महत्ता को दर्शाता है।
