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मुजफ्फरपुर का चुनावी रण: क्या NDA लगाएगा ‘कमबैक’ की हैट्रिक या फिर कांग्रेस का ‘हाथ’ रहेगा मजबूत?

मुजफ्फरपुर विधानसभा सीट बिहार की एक बहुत ही महत्वपूर्ण सीट है, जिसका राजनीतिक इतिहास अप्रत्याशित परिणामों से भरा रहा है। यह शहरी क्षेत्र होने के कारण यहाँ जातीय समीकरण के साथ-साथ विकास, स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवार का चेहरा भी निर्णायक भूमिका निभाता है।

वर्तमान में इस सीट पर कांग्रेस के विजेंद्र चौधरी का कब्जा है, जिन्होंने 2020 में भाजपा के दिग्गज नेता सुरेश कुमार शर्मा को मतों के अंतर से हराया था। 2025 में, मुख्य मुकाबला एक बार फिर इन्हीं दोनों उम्मीदवारों (या इनके दलों) के बीच होने की प्रबल संभावना है।

संभावित विजेता: NDA उम्मीदवार (संभावित: सुरेश कुमार शर्मा – BJP)


NDA (BJP) उम्मीदवार की जीत के पक्ष में विस्तृत विश्लेषण और तथ्य:

  1. भाजपा का पारंपरिक शहरी गढ़ और कोर वोटबैंक:
    • मुजफ्फरपुर शहर विधानसभा सीट पारंपरिक रूप से भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है। यहाँ व्यापारी वर्ग, शहरी मतदाता, उच्च जातियों (ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार) और गैर-यादव OBC/EBC का बड़ा वोटबैंक है, जो मुख्य रूप से भाजपा के साथ मजबूती से खड़ा रहता है।
    • 2010 और 2015 में भाजपा के सुरेश कुमार शर्मा ने लगातार दो बार जीत हासिल की थी। 2020 में हार मामूली अंतर से हुई थी, जो कि एंटी-इनकम्बेंसी और गठबंधन के कमजोर प्रदर्शन का संयुक्त परिणाम था।
  2. केंद्र और राज्य में NDA की सरकार का प्रभाव (पार्टी फैक्टर):
    • मुजफ्फरपुर में पीएम नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की डबल इंजन सरकार की नीतियों और शहरी विकास योजनाओं का सीधा प्रभाव मतदाताओं पर पड़ता है।
    • 2020 में कांग्रेस को व्यक्तिगत ‘हाथ’ फैक्टर का लाभ मिला था, लेकिन 2025 में यह सीट एक बार फिर पार्टी के प्रतीक (कमल) के नाम पर लड़ी जाएगी, जो शहरी क्षेत्रों में बेहद प्रभावी होता है।
  3. कांग्रेस विधायक के खिलाफ ‘एंटी-इनकम्बेंसी’:
    • कांग्रेस विधायक विजेंद्र चौधरी ने 2020 में 30 साल बाद कांग्रेस का सूखा खत्म किया था, लेकिन स्थानीय मतदाताओं में 5 साल के कार्यकाल के प्रति असंतोष होना स्वाभाविक है। भाजपा इस बार इस असंतोष को भुनाने की पूरी कोशिश करेगी।
  4. 2020 में व्यक्तिगत हार, पार्टी की नहीं:
    • 2020 की हार मुख्य रूप से भाजपा के तत्कालीन उम्मीदवार सुरेश कुमार शर्मा के खिलाफ मजबूत व्यक्तिगत एंटी-इनकम्बेंसी का परिणाम थी, न कि भाजपा के खिलाफ। यदि भाजपा इस बार नया चेहरा लाती है या सुरेश शर्मा अपनी व्यक्तिगत छवि को सुधारकर मैदान में उतरते हैं, तो पार्टी का मजबूत वोटबैंक निर्णायक साबित होगा।
  5. बड़ा मतदाता वर्ग (3.15 लाख से अधिक):
    • मुजफ्फरपुर में कुल मतदाता से अधिक हैं। शहरी सीटों पर कम मतदान का सीधा लाभ भाजपा के संगठित शहरी वोटरों को मिलता है, जो अक्सर मतदान के दिन बड़ी संख्या में बाहर निकलते हैं।

महागठबंधन (कांग्रेस) उम्मीदवार की हार के प्रतिकूल तथ्य और आंकड़े:

यदि महागठबंधन (कांग्रेस) वर्तमान विधायक विजेंद्र चौधरी को फिर से टिकट देता है, तो उनके सामने निम्नलिखित प्रतिकूल कारक हो सकते हैं:

  1. कमजोर संगठनात्मक शक्ति:
    • कांग्रेस की संगठनात्मक शक्ति मुजफ्फरपुर शहर में भाजपा की तुलना में काफी कमजोर है। 2020 की जीत मुख्य रूप से तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली महागठबंधन की लहर और राजद के MY (मुस्लिम-यादव) कोर वोटबैंक के कारण संभव हो पाई थी, जिसने कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन किया।
  2. गैर-जातीय वोटों को बनाए रखने की चुनौती:
    • विजेंद्र चौधरी को 2020 में सवर्णों और गैर-यादव ओबीसी के वोटों का भी कुछ समर्थन मिला था, जिसने उन्हें जीत दिलाई थी। 2025 में, भाजपा की मजबूत वापसी की रणनीति के तहत, इन गैर-जातीय वोटों को अपने पाले में वापस लाना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।
  3. बढ़ते निर्दलीय उम्मीदवारों से खतरा:
    • मुजफ्फरपुर सीट पर निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या हमेशा अधिक रहती है (2025 में भी 9 निर्दलीय मैदान में होने की खबर है)। अगर कोई मजबूत निर्दलीय उम्मीदवार कांग्रेस के वोटबैंक (खासकर किसी समुदाय विशेष के वोट) में सेंध लगाता है, तो भाजपा को सीधा फायदा होगा, क्योंकि भाजपा का कोर वोटबैंक अधिक एकजुट माना जाता है।
  4. शहरी मतदाताओं की पहली पसंद:
    • शहरी मतदाता, खासकर मध्यम वर्ग और व्यापारी, कानून व्यवस्था, बेहतर नागरिक सुविधाएं और ‘ब्रांड मोदी’ के नाम पर मतदान करते हैं। इन मामलों में, भाजपा को हमेशा महागठबंधन पर बढ़त मिली है, और यही कारक 2025 में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा बनेगा।

निष्कर्ष और पूर्वानुमान:

मुजफ्फरपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के विजेंद्र चौधरी और भाजपा के सुरेश कुमार शर्मा (या कोई अन्य भाजपा उम्मीदवार) के बीच कांटे की टक्कर होगी। यह सीट भाजपा की प्रतिष्ठा की सीट है, जिसे वह हर हाल में वापस जीतना चाहेगी।

स्थानीय एंटी-इनकम्बेंसी, मजबूत संगठनात्मक शक्ति और शहरी मतदाताओं में भाजपा के पक्ष में रुझान को देखते हुए, NDA (BJP) उम्मीदवार के लिए इस बार अपनी खोई हुई सीट पर ‘कमबैक’ करके जीत दर्ज करने की संभावना अधिक है। जीत का अंतर कम रहने की उम्मीद है, लेकिन NDA का पलड़ा थोड़ा भारी लग रहा है।

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