बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 65.08% का ऐतिहासिक मतदान होने के बाद, राजनीतिक गलियारों में एक ज़ोरदार बहस शुरू हो गई है। यह बहस है कि क्या यह बढ़ा हुआ मतदान मौजूदा सरकार (NDA) को बचाएगा या फिर ‘महागठबंधन’ (MGB) की जीत का संकेत है?
इस बहस को समझने के लिए तीन मुख्य बातें जानना ज़रूरी है:
1. दोनों गठबंधनों के अपने-अपने दावे (NDA vs. Mahagathbandhan Claims)
पहले चरण में जब लोगों ने इतनी बड़ी संख्या में वोट डाला, तो NDA (बीजेपी और जेडीयू) और महागठबंधन (आरजेडी और कांग्रेस) दोनों ने तुरंत यह दावा किया कि यह उछाल (surge) उन्हीं के पक्ष में है।
सत्ताधारी NDA का दावा (बीजेपी और जेडीयू):
- ‘विकास’ पर भरोसा: NDA का कहना है कि यह रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ‘सुशासन’ (Good Governance) और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों पर जनता के गहरे विश्वास को दिखाती है।
- ‘मातृ शक्ति’ (महिला) का वोट: NDA के नेता इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि महिलाओं ने बड़ी संख्या में मतदान किया है। उनका मानना है कि सरकार की महिला सशक्तिकरण और कल्याण योजनाओं, जैसे ‘जीविका दीदी’ और अन्य योजनाओं के कारण महिलाओं ने NDA को वोट दिया है।
- मज़बूत जनादेश: उनका तर्क है कि जब ज़्यादा लोग वोट डालते हैं, तो चुनी हुई सरकार को एक मज़बूत जनादेश (Strong Mandate) मिलता है।
विपक्षी महागठबंधन का दावा (आरजेडी और कांग्रेस):
- ‘बदलाव की लहर’: महागठबंधन का दावा है कि यह बढ़ा हुआ मतदान ‘सत्ता विरोधी लहर’ (Anti-Incumbency) का सबसे बड़ा सबूत है। यानी, जनता पिछले 15-20 सालों के शासन से नाराज़ है और अब बदलाव चाहती है।
- युवा और रोज़गार: तेजस्वी यादव (मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार) ने ‘रोज़गार’ को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया है। महागठबंधन का मानना है कि बेरोज़गार युवाओं ने बड़ी संख्या में वोट डाला है, और यह वोट सीधे-सीधे बदलाव लाने के लिए है।
- लालू का ‘रोटी’ तर्क: आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने भी कहा है कि “रोटी को तवे पर पलटते रहना चाहिए, वरना वो जल जाती है।” उनका सीधा इशारा है कि 20 साल का शासन बहुत होता है, और अब सत्ता बदलने का समय आ गया है।
2. इतिहास क्या कहता है? (Historical Trend)
बिहार की राजनीति में एक दिलचस्प ऐतिहासिक पैटर्न रहा है। राजनीतिक विश्लेषक हमेशा इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जब भी मतदान प्रतिशत में एक बड़ा बदलाव आता है, तो अक्सर सरकार बदल जाती है।
- 1967 का चुनाव: 1962 के मुकाबले वोटिंग में 7% की वृद्धि हुई थी। नतीजा— कांग्रेस की सरकार पहली बार गिर गई और गैर-कांग्रेसी गठबंधन सत्ता में आया।
- 1980 का चुनाव: 1977 के मुकाबले वोटिंग में लगभग 7% की वृद्धि हुई थी। नतीजा— जनता पार्टी की सरकार गिर गई और कांग्रेस वापस सत्ता में आई।
- 1990 का चुनाव: 1985 के मुकाबले वोटिंग में लगभग 6% की वृद्धि हुई थी। नतीजा— कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल ने सरकार बनाई।
- निष्कर्ष: इतिहास के ये उदाहरण दिखाते हैं कि बिहार में जब भी 5% से ज़्यादा वोटिंग बढ़ी है, तो सत्ता परिवर्तन हुआ है। इस बार पहले चरण में 8% से ज़्यादा की वृद्धि हुई है, इसलिए महागठबंधन इसे अपने पक्ष में एक बड़ा संकेत मान रहा है।
याद रखें: हालांकि, कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि हाल के कुछ चुनावों में (जैसे 2010 में नीतीश कुमार की वापसी), मतदान बढ़ा था, लेकिन सरकार नहीं बदली। इसलिए यह कोई पक्का नियम (definite rule) नहीं है, लेकिन बदलाव की आशंका ज़रूर बढ़ी है।
3. निर्णायक वोटर कौन? (The Decisive Voter)
यह रिकॉर्ड वोटिंग किस वर्ग ने की है, इस पर भी सबकी नज़र है। जिस वर्ग का वोट ज़्यादा पड़ा है, उसे ही विजेता माना जाएगा:
- महिला मतदाता (Women Voters): NDA को उम्मीद है कि ‘जीविका’ और अन्य योजनाओं के कारण महिलाएं उनके पक्ष में रहीं।
- युवा मतदाता (Youth Voters): महागठबंधन को लगता है कि ‘रोज़गार’ के वादे पर युवाओं ने उत्साह दिखाया और उनके लिए वोट किया।
- नया/मौन मतदाता (New/Silent Voters): कई ‘नए’ या पहले वोट न डालने वाले मतदाता इस बार बाहर निकले हैं। ये मतदाता किसी पार्टी के पक्के वोटर नहीं होते और इनका एकतरफ़ा वोट अंतिम नतीजों को पलट सकता है।
🎯 सारांश (Conclusion)
बिहार के पहले चरण में रिकॉर्ड 65.08% मतदान ने यह साबित कर दिया है कि मतदाता इस बार पूरी तरह से सक्रिय है और गंभीर मुद्दों पर फैसला लेने के लिए बाहर निकला है। दोनों गठबंधन, NDA और महागठबंधन, इसे अपनी-अपनी जीत का आधार मान रहे हैं।
- NDA: इसे विकास और सुशासन पर मुहर बता रहा है।
- महागठबंधन: इसे सत्ता-विरोधी लहर और बदलाव की लहर बता रहा है।
14 नवंबर को जब वोटों की गिनती होगी, तभी पता चलेगा कि बिहार के मतदाताओं ने इतिहास दोहराया है या फिर एक नया रिकॉर्ड कायम किया है।
