1️⃣ प्रमुख उम्मीदवार और मुकाबला
| गठबंधन/पार्टी | उम्मीदवार | स्थिति और पृष्ठभूमि |
| NDA (BJP) | विजय कुमार सिन्हा | वर्तमान उपमुख्यमंत्री, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष। लगातार तीन बार के विधायक। इस बार फिर से NDA (BJP) के उम्मीदवार हैं। |
| महागठबंधन (INC) | अमरेश कुमार अनीश | 2020 में उपविजेता रहे थे, कांग्रेस के स्थानीय नेता। महागठबंधन की ओर से इस बार भी प्रमुख चुनौती हैं। |
2️⃣ 🏆 NDA उम्मीदवार (विजय कुमार सिन्हा) की जीत के कारण (अनुकूल तथ्य)
उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा का पलड़ा भारी होने के निम्नलिखित कारण हैं:
- व्यक्तिगत और राष्ट्रीय प्रभाव: विजय सिन्हा अब सिर्फ विधायक नहीं, बल्कि बिहार के उपमुख्यमंत्री और बड़े भूमिहार चेहरा बन चुके हैं। उनकी यह बढ़ी हुई राजनीतिक हैसियत मतदाताओं के बीच एक सकारात्मक संदेश देती है। प्रधानमंत्री मोदी और NDA के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन उनके लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है।
- जातीय समीकरण में पकड़: लखीसराय एक भूमिहार बहुल सीट मानी जाती है। सिन्हा खुद भूमिहार समुदाय से आते हैं और इस समुदाय का संगठित वोट उन्हें निर्णायक बढ़त दिलाता है। इसके अलावा, NDA के साथ सवर्ण (ब्राह्मण) और ओबीसी/अतिपिछड़ा का बड़ा वोट बैंक जुड़ा हुआ है।
- रिकॉर्ड और पारंपरिक गढ़: BJP ने इस सीट पर 5 बार जीत हासिल की है, और सिन्हा लगातार 3 बार से जीत रहे हैं। यह सीट BJP का पारंपरिक गढ़ बन चुकी है, जहाँ पार्टी का संगठन मजबूत है।
- विकास पर फोकस: सिन्हा के समर्थक दावा करते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में क्षेत्र में तेजी से विकास किया है, जिससे मतदाता उनके प्रति आस्था दिखाते हैं।
3️⃣ ❌ महागठबंधन उम्मीदवार (अमरेश कुमार अनीश) की हार के कारण (प्रतिकूल तथ्य)
महागठबंधन उम्मीदवार अमरेश कुमार अनीश के लिए यह किला भेदना आसान नहीं होगा:
- भूमिहार वोटों का विभाजन (स्थायी दूरी): लखीसराय विधानसभा क्षेत्र भूमिहार बहुल है, और भूमिहार समुदाय की महागठबंधन (खासकर RJD) से एक स्थायी दूरी रही है। महागठबंधन की ओर से भूमिहार उम्मीदवार होने के बावजूद, यह दूरी वोट में तब्दील होने में बड़ी बाधा है।
- “तेजस्वी लहर” का सीमित प्रभाव: भले ही राज्य भर में तेजस्वी यादव के नाम पर युवा और MY समीकरण का बड़ा समर्थन हो, लेकिन लखीसराय जैसे सवर्ण-बहुल शहरी-ग्रामीण मिश्रण वाली सीट पर जातीय ध्रुवीकरण अक्सर NDA के पक्ष में काम करता है।
- कद्दावर नेता से सीधी टक्कर: महागठबंधन के उम्मीदवार को सीधे बिहार के उपमुख्यमंत्री से मुकाबला करना है, जिसका मतलब है कि उन्हें केवल स्थानीय विधायक की नहीं, बल्कि पूरे NDA गठबंधन की शक्ति और संसाधनों का सामना करना होगा।
- पिछला कम अंतर (10,483 वोट): 2020 में हार का अंतर 10,483 वोट था, जिसे पाट पाना महागठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती है, खासकर जब मुकाबला फिर से सीधा और द्विपक्षीय हो।
4️⃣ निर्णायक फैक्टर: यादव और अतिपिछड़ा वोट
लखीसराय सीट पर सबसे बड़ी आबादी यादवों की है, इसके बाद कुर्मी, पासवान और मुसलमान वोटों का महत्व है।
- जीत की चाबी: यदि महागठबंधन, यादव-मुस्लिम (MY) के मजबूत आधार को अतिपिछड़ा (OBC) और दलित वोटों के साथ सफलतापूर्वक जोड़ पाता है, और सवर्ण वोटों में थोड़ा-सा भी एंटी-इनकम्बेंसी (विरोधी लहर) का फायदा उठाकर सेंध लगा पाता है, तो विजय सिन्हा के लिए चुनौती खड़ी हो सकती है।
- NDA की रणनीति: NDA की जीत सुनिश्चित करने के लिए विजय सिन्हा की रणनीति मुख्य रूप से भूमिहारों को संगठित करने और अतिपिछड़ा/दलित वोटों को विकास और मोदी के नाम पर अपने पाले में बनाए रखने पर केंद्रित होगी।
निष्कर्ष: लखीसराय सीट पर मुकाबला कड़ा है क्योंकि महागठबंधन ने एक बार फिर मजबूत उम्मीदवार दिया है, लेकिन उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा का व्यक्तिगत प्रभाव, मजबूत स्थानीय संगठन और सवर्ण-कुर्मी वोटों पर NDA की मजबूत पकड़ उन्हें 2025 में चौथी बार यह सीट जीतने के लिए मजबूत दावेदार बनाती है।3
