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हथुआ का किला: क्या तेजस्वी के ‘कुशवाहा’ योद्धा को NDA देगा मात? 30 हज़ार वोटों की बढ़त का गणित और जातीय समीकरणों की जंग!

हथुआ विधानसभा सीट बिहार के गोपालगंज जिले में स्थित है।1 यह सीट राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के कब्जे में है, और निवर्तमान विधायक राजेश कुमार सिंह (कुशवाहा) हैं।2 यह सीट लालू प्रसाद यादव के पैतृक जिले गोपालगंज में आती है, और 2020 में RJD ने इस पर एक बड़ी जीत दर्ज की थी।3

जीत की संभावना (पूर्वानुमान)

2020 में मिली 30,527 वोटों की बड़ी जीत, मजबूत जातीय आधार और महागठबंधन के संयुक्त समर्थन को देखते हुए, वर्तमान विधायक राजेश कुमार सिंह (RJD/महागठबंधन) के दोबारा जीतने की संभावना प्रबल है।4 यह सीट महागठबंधन के लिए एक मजबूत और सुरक्षित सीट मानी जा सकती है।


विजेता उम्मीदवार के जीतने के मुख्य कारण और विश्लेषण (राजेश कुमार सिंह – RJD/महागठबंधन)

तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
ऐतिहासिक और निर्णायक जीत का अंतर 2020 में, राजेश कुमार सिंह ने JDU के रामसेवक सिंह को 30,527 वोटों (लगभग 18.00% का अंतर) के विशाल अंतर से हराया था। यह अंतर इतना बड़ा है कि NDA के लिए इसे पाटना एक कठिन चुनौती होगी।
मजबूत M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण हथुआ सीट पर मुस्लिम मतदाता लगभग 17.1% हैं, जो सर्वाधिक हैं, जबकि यादव मतदाता भी एक मजबूत आधार बनाते हैं। RJD उम्मीदवार को इन दोनों समुदायों का एकतरफा समर्थन मिलने की उम्मीद है, जो जीत का सबसे बड़ा आधार है।
राजेश सिंह का व्यक्तिगत जनाधार राजेश सिंह कुशवाहा जाति से आते हैं। 2015 में जब वह निर्दलीय लड़े थे, तब भी उन्होंने 33,000 से अधिक वोट हासिल किए थे, जिससे उनका व्यक्तिगत जनाधार स्पष्ट होता है। RJD के M-Y आधार के साथ उनका कुशवाहा वोट बैंक मिलना, उन्हें अजेय बनाता है।
एंटी-इनकम्बेंसी का कम प्रभाव RJD की पिछली जीत बड़े अंतर से हुई थी, और विधायक ने अपने क्षेत्र में जो काम किया है, उस पर पार्टी भरोसा जता रही है। 2020 की जीत एक सत्ता विरोधी लहर (NDA के खिलाफ) का परिणाम थी, जिसका लाभ इस बार भी महागठबंधन को मिल सकता है।

अन्य उम्मीदवार के न जीतने के प्रतिकूल तथ्य और सांख्यिकी (NDA उम्मीदवार – संभावित JDU/BJP)

प्रतिकूल तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
विशाल वोट अंतर की चुनौती 2020 में NDA उम्मीदवार रामसेवक सिंह (JDU) को 30,527 वोटों के भारी अंतर से हार मिली थी। यह अंतर दर्शाता है कि NDA के पारंपरिक वोट बैंक (उच्च जातियां, कुछ अति-पिछड़े) के बावजूद महागठबंधन का आधार अधिक प्रभावी रहा।
जातीय समीकरण की प्रतिकूलता इस सीट पर सर्वाधिक मुस्लिम और यादव वोटर हैं, जो महागठबंधन का अटूट वोट बैंक हैं। NDA को जीतने के लिए इन दोनों वर्गों में बड़ी सेंध लगानी होगी, जो लगभग असंभव है, क्योंकि NDA का आधार मुख्य रूप से ऊंची जातियों और कुछ अत्यंत पिछड़ी जातियों तक सीमित है।
पिछले प्रदर्शन में गिरावट JDU ने यह सीट 2010 और 2015 में जीती थी, लेकिन 2020 में NDA गठबंधन में होने के बावजूद JDU के वोट शेयर में भारी गिरावट आई और वह 32.29% तक सिमट गया। यह पिछले चुनावों में क्षेत्र में JDU के प्रति कम होती लोकप्रियता को दर्शाता है।
LJP (रामविलास) फैक्टर का अप्रभावी होना 2020 के चुनाव में LJP (तब NDA से बाहर) को 9,894 वोट मिले थे, लेकिन इसने परिणाम को खास प्रभावित नहीं किया। यदि 2025 में भी NDA का वोट बंटता है, तो जीत का अंतर और भी बढ़ सकता है।

निष्कर्ष:

हथुआ विधानसभा सीट पर राजेश कुमार सिंह (RJD/महागठबंधन) की स्थिति बहुत मजबूत दिख रही है। 2020 की निर्णायक जीत और सीट पर मुस्लिम-यादव-कुशवाहा समीकरण का प्रभावी होना उनके पक्ष में काम करता है। NDA के लिए यह सीट जीतना एक अत्यधिक कठिन चुनौती होगी, क्योंकि उन्हें 30 हज़ार से अधिक वोटों के अंतर को पाटने के लिए एक मजबूत एंटी-इंकम्बेंसी फैक्टर, या महागठबंधन के वोटों में बड़ा विभाजन पैदा करना होगा, जिसकी संभावना कम है।

(अस्वीकरण: यह विश्लेषण 2025 के चुनाव से पहले के उपलब्ध ऐतिहासिक आँकड़ों, राजनीतिक रुझानों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। चुनाव परिणाम अंतिम समय के राजनीतिक बदलाव, गठबंधन की स्थिति और मतदान पैटर्न पर निर्भर करते हैं।)

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