1️⃣ प्रमुख उम्मीदवार और मुकाबला
| गठबंधन/पार्टी | संभावित उम्मीदवार | स्थिति और पृष्ठभूमि |
| NDA (JD(U)) | कृष्णामुरारी शरण उर्फ प्रेम मुखिया (वर्तमान विधायक) | 2020 के विजेता, कुर्मी समुदाय से आते हैं। यह सीट JDU के गढ़ के रूप में देखी जाती है। |
| महागठबंधन (RJD) | शक्ति सिंह यादव (पूर्व उपविजेता और मुख्य प्रवक्ता) | 2020 में केवल 12 वोटों से हारे, यादव समुदाय से आते हैं। मजबूत ‘माई’ (MY) समीकरण पर भरोसा। |
2️⃣ 🏆 शक्ति सिंह यादव (RJD/महागठबंधन) की जीत के कारण (अनुकूल तथ्य)
शक्ति सिंह यादव (RJD) के पक्ष में निम्नलिखित निर्णायक कारक हैं:
- अभूतपूर्व ‘क्लोज कॉल’ का भावनात्मक लाभ: 2020 में, शक्ति सिंह यादव केवल 12 वोटों के ऐतिहासिक रूप से छोटे अंतर से हारे थे।3 इस ‘अन्याय’ (जैसा RJD ने इसे दर्शाया था) और अत्यंत करीबी हार का भावनात्मक वोट इस बार उनके पक्ष में एकजुट हो सकता है।
- मजबूत MY समीकरण: हिलसा में यादव मतदाताओं की संख्या निर्णायक है, जो RJD का मुख्य आधार है। शक्ति सिंह यादव की यादव समुदाय में मजबूत पकड़ और RJD का पारंपरिक MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
- एंटी-इनकम्बेंसी का दबाव: वर्तमान विधायक (प्रेम मुखिया) के खिलाफ पिछले पाँच वर्षों की एंटी-इनकम्बेंसी का सीधा लाभ शक्ति सिंह यादव को मिलेगा, क्योंकि जीत का अंतर पिछली बार शून्य के बराबर था।
- युवा और पिछड़ी जातियों का झुकाव: तेजस्वी यादव का रोजगार और जातिगत गणना पर जोर यादव, दलितों, और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) के युवाओं को बड़े पैमाने पर RJD की ओर आकर्षित कर सकता है।
3️⃣ ❌ कृष्णामुरारी शरण उर्फ प्रेम मुखिया (JD(U)/NDA) की हार के कारण (प्रतिकूल तथ्य)
वर्तमान विधायक प्रेम मुखिया और JD(U) की राह में निम्नलिखित चुनौतियाँ हैं:
- रिकॉर्ड-तोड़ कम जीत का अंतर (12 वोट): यह जीत JD(U) के लिए अनुकूल होने के बजाय एक कमजोर कड़ी है। इतनी कम अंतर से जीत का मतलब है कि थोड़ा सा भी राजनीतिक बदलाव उन्हें सीट गँवा सकता है।
- त्रिकोणीय संघर्ष का खतरा: 2020 में LJP उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहकर 17,471 वोट ले गए थे, जिससे JD(U) का कोर कुर्मी-कोइरी वोट बँट गया था।4 यदि 2025 में भी कोई तीसरी ताकत (जैसे चिराग पासवान की LJP) महत्वपूर्ण वोट काटती है, तो इसका सीधा नुकसान JD(U) को होगा।
- कुर्मी वोट का उप-विभाजन: नालंदा में कुर्मी वोट बैंक निर्णायक है, लेकिन यह कई उप-जातियों में बंटा हुआ है। यदि JD(U) के खिलाफ कुर्मी समुदाय से कोई बागी उम्मीदवार खड़ा होता है या JD(U) किसी कमजोर उम्मीदवार को उतारती है (वर्तमान विधायक की उम्र को लेकर भी अटकलें हैं), तो RJD को फायदा होगा।
- विकास बनाम जाति की बहस: हालांकि यह नीतीश कुमार का गृह जिला है और NDA विकास को मुद्दा बनाएगी, लेकिन हिलसा में जातिगत ध्रुवीकरण और तेजस्वी के रोजगार के वादे का प्रभाव विकास के मुद्दे पर भारी पड़ सकता है।
4️⃣ निर्णायक फैक्टर: तीसरे मोर्चे और सवर्ण वोट
- LJP का रुख: 2020 में LJP ने JD(U) के खिलाफ उम्मीदवार उतारकर उसके वोटों में बड़ी सेंध लगाई थी। यदि 2025 में LJP (रामविलास) NDA के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है, तो यह JD(U) की जीत को आसान बना सकता है, लेकिन अगर LJP फिर से अलग लड़ती है, तो JD(U) के लिए मुश्किल होगी।
- सवर्ण वोट बैंक: हिलसा में भूमिहार मतदाताओं की भी अच्छी संख्या है। यदि यह सवर्ण वोट बैंक पूरी तरह से NDA (BJP/JD(U)) के पक्ष में एकजुट रहता है, तो JD(U) को जीत के लिए ज़रूरी बढ़त मिल सकती है।
- EBC (अति पिछड़ा वर्ग): EBC वोटर दोनों ही गठबंधनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। जो भी पार्टी पासवान, रविदास और EBC के वोट को अपने पक्ष में मोड़ने में सफल होगी, वही हिलसा के ’12 वोट’ के रण को जीतेगी।
निष्कर्ष:
हिलसा सीट का मुकाबला 2020 की तरह एक बार फिर पल-पल बदलता हुआ और अत्यंत करीबी रहने की संभावना है। इस बार, RJD के शक्ति सिंह यादव के पास पिछली हार का भावनात्मक समर्थन, मजबूत MY आधार, और वर्तमान विधायक के खिलाफ एंटी-इनकम्बेंसी का लाभ है।
NDA (JD(U)) की जीत पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगी कि वह LJP के वोटों के बँटवारे को रोक पाती है या नहीं, और अपने कुर्मी-सवर्ण वोट बैंक को पूरी तरह एकजुट कर पाती है या नहीं।
वर्तमान राजनीतिक हवा को देखते हुए, महागठबंधन (RJD) के पास NDA से यह सीट छीनने की प्रबल संभावना है, लेकिन जीत का अंतर फिर से बहुत कम रहने की उम्मीद है।