बिहार विधानसभा चुनाव का दूसरा चरण अब पूरा का पूरा चंपारण (Champaran) और मिथिलांचल (Mithilanchal) क्षेत्रों पर केंद्रित हो गया है। इन दोनों क्षेत्रों को बिहार की सत्ता का ‘फाइनल फैसला’ करने वाला इलाका माना जाता है।
1. चंपारण और मिथिलांचल क्यों हैं महत्वपूर्ण?
दूसरे चरण में 20 जिलों की 122 विधानसभा सीटों पर मतदान होना है, जिसमें ये दोनों क्षेत्र शामिल हैं।1 इन क्षेत्रों की अहमियत को समझने के लिए 2020 के पिछले चुनाव के नतीजों को देखना ज़रूरी है:
| क्षेत्र का नाम | 2020 में क्या हुआ? |
| चंपारण (पूर्वी और पश्चिमी) | यहाँ 21 सीटें हैं। 2020 में NDA (मुख्य रूप से BJP) ने इन 21 में से लगभग 17 सीटें जीती थीं। यह NDA का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है। |
| मिथिलांचल (मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी आदि) | इस क्षेत्र की 31 से ज़्यादा सीटों पर भी 2020 में NDA का दबदबा रहा था। |
सीधा मतलब: 2020 के चुनाव में, शुरुआती चरणों में जहाँ महागठबंधन (RJD) ने अच्छी बढ़त बनाई थी, वहीं अंतिम चरण (तब यह तीसरा चरण था) में चंपारण और मिथिलांचल ने NDA को भारी संख्या में सीटें देकर पूरे समीकरण को पलट दिया था। यही वजह थी कि NDA 125 सीटें जीतकर सरकार बनाने में कामयाब रहा था, और महागठबंधन 110 सीटों पर रुक गया था।
2. इस बार दोनों गठबंधनों का फोकस (The Final Campaign Focus)
इस बार ये दोनों ही क्षेत्र दूसरे चरण में शामिल हैं (कुछ सीटें दोनों चरणों में बंटी हुई हैं)। चंपारण और मिथिलांचल के वोटों का झुकाव (Inclination) ही तय करेगा कि इस बार बदलाव होगा या सत्ता की वापसी।
NDA की रणनीति (NDA Strategy):
- गढ़ को बचाना: NDA (BJP और JDU) की सबसे बड़ी चुनौती है अपने इस गढ़ को बचाए रखना।
- बड़े नेताओं की धुआंधार रैलियां: प्रचार थमने से पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने इसी क्षेत्र में सबसे ज़्यादा रैलियाँ की हैं।
- मोदी का संदेश: प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में ‘जंगलराज’ और ‘भ्रष्टाचार’ के पुराने मुद्दों को उठाया है और लोगों को याद दिलाया है कि नीतीश कुमार के ‘सुशासन’ ने ही इस क्षेत्र का विकास किया है।
- अमित शाह का ज़ोर: गृह मंत्री ने सीधे तौर पर चंपारण और मधुबनी में NDA को पिछले चुनाव से ज़्यादा सीटें दिलाने की अपील की है।
- समीकरण: NDA को यहाँ उच्च जातियों (Upper Castes), अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और महिला वोटरों के मजबूत समर्थन की उम्मीद है।
महागठबंधन की रणनीति (MGB Strategy):
- किले में सेंध लगाना: महागठबंधन (RJD और Congress) का मुख्य उद्देश्य NDA के इस किले (Stronghold) में सेंध लगाना है, यानी NDA से कम से कम 10-15 सीटें छीनना।
- रोज़गार का मुद्दा: तेजस्वी यादव ने इन क्षेत्रों में भी ‘रोज़गार’ और ‘पलायन’ के मुद्दे को सबसे ज़्यादा उठाया है, क्योंकि मिथिलांचल और चंपारण से बड़ी संख्या में युवा काम की तलाश में बाहर जाते हैं।
- राहुल गांधी की उपस्थिति: कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने भी विशेष रूप से चंपारण (जैसे वाल्मीकिनगर) में रैलियाँ करके यह संदेश दिया है कि महागठबंधन इस क्षेत्र को हल्के में नहीं ले रहा है।
- समीकरण: महागठबंधन यहाँ यादव-मुस्लिम वोटबैंक के साथ-साथ, बेरोज़गार युवाओं के वोट को अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश कर रहा है।
3. इन क्षेत्रों के असल मुद्दे क्या हैं?
चंपारण और मिथिलांचल की सीटों पर केवल राजनीतिक समीकरण ही नहीं, बल्कि कुछ ज़मीनी मुद्दे भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं:
- पलायन और रोज़गार: यह यहाँ का सबसे बड़ा मुद्दा है। युवा पूछते हैं कि उन्हें घर छोड़कर क्यों जाना पड़ता है?
- बाढ़ की समस्या: मिथिलांचल का एक बड़ा हिस्सा (जैसे मधुबनी और सुपौल के इलाके) कोसी और अन्य नदियों की बाढ़ से हर साल प्रभावित होता है। जनता जानना चाहती है कि इस समस्या का स्थायी समाधान क्या है।
- किसान और गन्ना: चंपारण क्षेत्र में गन्ना किसान (Sugar Cane Farmers) एक बड़ा वोटबैंक हैं। उनके बकाया भुगतान और चीनी मिलों की स्थिति भी चुनावी मुद्दा है।
- शिक्षा और स्वास्थ्य: अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी भी इन क्षेत्रों में एक प्रमुख चिंता बनी हुई है।
4. निर्णायक परिणाम (The Final Conclusion)
- अगर NDA इस बार भी चंपारण और मिथिलांचल में 2020 जैसा मज़बूत प्रदर्शन दोहराता है, तो सत्ता में उसकी वापसी लगभग तय हो जाएगी।
- अगर महागठबंधन इन क्षेत्रों में NDA को बड़ा नुकसान पहुँचाने में कामयाब होता है (यानी 2020 के मुकाबले 15-20 सीटें ज़्यादा जीत लेता है), तो बिहार में सत्ता परिवर्तन हो सकता है।
इसलिए, 11 नवंबर को होने वाला मतदान और 14 नवंबर को आने वाले नतीजे ही बताएंगे कि चंपारण और मिथिलांचल के मतदाताओं ने बिहार की सत्ता की चाबी किसे सौंपी है।
