1️⃣ प्रमुख उम्मीदवार और मुकाबला
| गठबंधन/पार्टी | संभावित उम्मीदवार | स्थिति और पृष्ठभूमि |
| NDA (BJP) | डॉ. सुनील कुमार | वर्तमान विधायक (लगातार 5 बार के विजेता)। कुर्मी-कोइरी समुदाय से आते हैं। |
| महागठबंधन (RJD) | सुनील कुमार (या कोई नया चेहरा) | 2020 के उपविजेता। RJD के यादव+मुस्लिम आधार का प्रतिनिधित्व। |
2️⃣ 🏆 डॉ. सुनील कुमार (BJP/NDA) की जीत के कारण (अनुकूल तथ्य)
NDA उम्मीदवार डॉ. सुनील कुमार की जीत की संभावनाएँ निम्नलिखित कारणों पर टिकी हैं:
- लगातार जीत का रिकॉर्ड: डॉ. सुनील कुमार ने इस सीट पर लगातार 5 बार जीत हासिल की है। यह उनकी मजबूत व्यक्तिगत छवि और पार्टी निष्ठा का प्रमाण है, जिसने उन्हें JDU और BJP दोनों के टिकट पर विजयी बनाया है।
- मजबूत जातीय समीकरण (कुर्मी-कोइरी): बिहारशरीफ सीट पर कुर्मी-कोइरी (EBC/OBC) मतदाताओं की आबादी सर्वाधिक है। डॉ. सुनील कुमार इसी जाति से आते हैं, जिससे उन्हें इस बड़े वोट बैंक का एकतरफा समर्थन मिलता रहा है।
- शहरी सीट और BJP का गढ़: जिला मुख्यालय होने के कारण यह एक शहरी और अर्ध-शहरी सीट है, जहाँ वैश्य, सवर्ण और उच्च वर्ग का मजबूत वोट बैंक है, जो पारंपरिक रूप से BJP का कोर वोटर माना जाता है। 2020 में उन्होंने RJD के उम्मीदवार को 15,102 वोटों के बड़े अंतर से हराया था।
- केंद्र और राज्य सरकार का समर्थन: NDA गठबंधन के तहत, उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विकास कार्यों का दोहरा लाभ मिलता है।
3️⃣ ❌ महागठबंधन (RJD) की हार के कारण (प्रतिकूल तथ्य)
महागठबंधन उम्मीदवार सुनील कुमार (या नए चेहरे) के लिए बिहारशरीफ सीट जीतना एक बड़ी चुनौती है:
- ‘MY’ समीकरण की सीमा: RJD का मुख्य आधार मुस्लिम और यादव (MY) मतदाता यहाँ निर्णायक संख्या में हैं। हालाँकि, शहरी सीट होने के कारण यह समीकरण जीत के लिए पर्याप्त नहीं है। MY के अलावा, RJD को भारी संख्या में कुर्मी-कोइरी और वैश्य वोटों को अपनी ओर खींचना होगा, जो अत्यंत कठिन है।
- JD(U)/BJP का मजबूत अभेद्य किला: यह सीट पिछले दो दशकों से ND A (पहले JD(U), अब BJP) के हाथ में रही है। RJD को केवल एक बार ही यहाँ से जीत मिली है। सीट पर BJP की मजबूत पैठ को तोड़ना महागठबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
- एंटी-इनकम्बेंसी का अप्रभावी होना: सीटिंग विधायक के खिलाफ नाराजगी होने के बावजूद, BJP के संगठनात्मक ढांचे और राष्ट्रीय मुद्दों (मोदी मैजिक) के कारण स्थानीय एंटी-इनकम्बेंसी वोट बिखर जाते हैं और इसका लाभ RJD को नहीं मिल पाता।
- कम मतदान प्रतिशत: 2020 में मतदान प्रतिशत मात्र 49.9% रहा था। कम मतदान अक्सर संगठित कोर वोटर (जो यहाँ NDA के हैं) के पक्ष में जाता है। RJD की जीत तभी संभव है जब वह अपने समर्थकों को बड़ी संख्या में पोलिंग बूथ तक ला सके।
4️⃣ निर्णायक फैक्टर: युवा और EBC/OBC का झुकाव
- बेरोजगारी और रोजगार: राज्य में रोजगार (तेजस्वी यादव का ‘नौकरी’ का वादा) एक बड़ा मुद्दा है। यदि महागठबंधन कुर्मी-कोइरी और अति पिछड़ा वर्ग (EBC/OBC) के युवा मतदाताओं को इस मुद्दे पर BJP/NDA से अलग करने में सफल होता है, तो मुकाबला पलट सकता है।
- स्थानीय बनाम राष्ट्रीय: मतदाता यह तय करेंगे कि वे स्थानीय मुद्दों (विधायक का प्रदर्शन) के आधार पर वोट देंगे या राष्ट्रीय राजनीति (मोदी/नीतीश की छवि) के आधार पर। शहरी मतदाता अक्सर राष्ट्रीय मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं, जो NDA को लाभ पहुँचाता है।
- जातीय ध्रुवीकरण: किसी भी संभावित जातीय या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की स्थिति में, गैर-MY वोट भारी संख्या में NDA के पक्ष में जा सकते हैं, जिससे RJD की हार निश्चित हो सकती है।
निष्कर्ष: उपलब्ध तथ्यों और पिछले परिणामों के आधार पर, BJP के डॉ. सुनील कुमार का पलड़ा बिहारशरीफ सीट पर सबसे भारी है। NDA की जीत की संभावनाएँ सर्वाधिक मजबूत हैं, क्योंकि उनके पास मजबूत जातीय आधार, एक लोकप्रिय सिटिंग विधायक और BJP का शहरी कोर वोट बैंक है। महागठबंधन के लिए यह एक मुश्किल लड़ाई है, और उन्हें जीतने के लिए बड़ी एंटी-इनकम्बेंसी लहर और गैर-MY वोटों में सेंध लगाने की आवश्यकता होगी।