पटना, 23 अक्टूबर 2025: बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) नेता तेजस्वी यादव को महागठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा बनाए जाने के बाद, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने सबसे पुराने और सबसे धारदार चुनावी हथियार—‘जंगल राज’—को एक बार फिर म्यान से बाहर निकाल लिया है।
केंद्र और राज्य के शीर्ष भाजपा नेताओं ने एकजुट होकर तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर सीधा हमला बोला है और दावा किया है कि महागठबंधन सत्ता में आता है, तो बिहार एक बार फिर लालू-राबड़ी काल (1990-2005) के अराजक, अपराध-ग्रस्त और कुशासन के ‘जंगल राज’ की ओर लौट जाएगा। बीजेपी का यह आक्रामक स्टैंड दिखाता है कि वह तेजस्वी के विकास और रोज़गार के एजेंडे को ‘भय’ और ‘अव्यवस्था’ के भावनात्मक नैरेटिव से काटना चाहती है।
1. भाजपा नेताओं के बयान: ‘जंगल राज’ के आरोप और आधार
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से लेकर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और बिहार के वरिष्ठ नेता सम्राट चौधरी तक, सभी ने अपनी सभाओं और प्रेस कॉन्फ्रेंस में तेजस्वी यादव को उनके पिता लालू प्रसाद यादव के शासनकाल की याद दिलाई।
जेपी नड्डा का भावनात्मक हमला
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक चुनावी रैली में सीधे लालू-राबड़ी काल को याद करते हुए एक भावनात्मक अपील की।
- अपहरण एक उद्योग था: “क्या आपको ‘जंगल राज’ याद है? मेरा बचपन बिहार में बीता है। मैंने वो दिन देखे हैं जब शाम 4 बजे के बाद कोई बाहर नहीं निकल सकता था। अपहरण (Kidnapping) एक उद्योग बन गया था। और सबसे दुखद बात यह है कि यह उद्योग कहीं और से नहीं, बल्कि तत्कालीन मुख्यमंत्री (राबड़ी देवी) के आवास से चलाया जा रहा था।”
- फिरौती की बात सीएम आवास पर होती थी: नड्डा ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री आवास पर अपराधियों द्वारा फिरौती की बातचीत होती थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अपराध को सत्ता का संरक्षण प्राप्त था।
रविशंकर प्रसाद: भ्रष्टाचार और 420 का आरोप
केंद्रीय मंत्री और पटना साहिब से सांसद रविशंकर प्रसाद ने ‘जंगल राज’ के साथ-साथ तेजस्वी यादव पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को भी प्रमुखता से उठाया।
- आईआरसीटीसी घोटाला: “जब हम तेजस्वी यादव की बात करते हैं, तो दिल्ली कोर्ट के आदेश याद आते हैं। अदालत ने आईआरसीटीसी होटल भ्रष्टाचार मामले को 420 (धोखाधड़ी) का गंभीर मामला माना है।1 तेजस्वी यादव, आप आईपीसी की धारा 420 के तहत आरोपी हैं, जिसकी सज़ा सात साल है।”2
- भ्रष्टाचार मुक्त बिहार का दावा खोखला: उन्होंने तेजस्वी के ‘भ्रष्टाचार मुक्त बिहार’ के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि जो व्यक्ति खुद भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना कर रहा हो, वह ‘भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करने’ की बात कैसे कर सकता है?
सम्राट चौधरी: “लुटेरे युवराज” और वादों की पोल
बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने तेजस्वी के वादों को ‘हवा-हवाई’ और उनकी पृष्ठभूमि को ‘अपराधी’ करार दिया।
- संदेह का कारण बनी टिकट सूची: “महागठबंधन ने अपनी टिकट सूची में शहाबुद्दीन के बेटे को टिकट दिया है। क्या आरजेडी आज भी शहाबुद्दीन जैसे बाहुबलियों के बेटे को टिकट देगी, तो बिहार सुरक्षित रह सकता है? भाइयों-बहनों, बिहार को सुरक्षित रखना है तो नरेंद्र मोदी जी और नीतीश कुमार की जोड़ी को फिर से लाना पड़ेगा।”
- तेजस्वी के लोग हर वारदात में शामिल: उन्होंने आरोप लगाया कि तेजस्वी के लोग तकरीबन हर आपराधिक वारदात में शामिल होते हैं। “आरजेडी का ‘ज’ लूट, हत्या, अवैध शराब और बालू कारोबार है।”
2. ‘जंगल राज’ की उत्पत्ति और इसका राजनीतिक महत्त्व
बीजेपी-जेडीयू गठबंधन के लिए ‘जंगल राज’ का टैग एक राजनीतिक हथियार क्यों है, यह समझने के लिए इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है।
शब्द की उत्पत्ति:
- लालू-राबड़ी काल (1990-2005): ‘जंगल राज’ शब्द का जन्म लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी के 15 साल के शासनकाल के दौरान हुआ था। इस दौर में कानून-व्यवस्था की स्थिति बहुत खराब हो गई थी।
- हाई कोर्ट का इस्तेमाल: यह शब्द पहली बार पटना हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश द्वारा राज्य की ख़राब कानून-व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए इस्तेमाल किया गया था, जिसके बाद यह पूरे देश में लालू राज के पर्याय के तौर पर प्रचलित हो गया।
- अपराध और भय का माहौल: इस अवधि में अपहरण, फिरौती, जातीय नरसंहार और संगठित अपराध चरम पर थे। व्यापार, उद्योग और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों से जुड़े लोग डर के कारण बिहार से पलायन कर रहे थे, जिसने राज्य की अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया था।
सुशासन बनाम जंगल राज (2005 के बाद):
- 2005 के विधानसभा चुनाव में, नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ गठबंधन कर ‘जंगल राज’ के नैरेटिव के खिलाफ ‘सुशासन’ का नारा दिया।3 जनता ने इस ‘सुशासन’ को स्वीकार किया और तब से नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में अपराजित रहे।
- बीजेपी का मानना है कि ‘जंगल राज’ आज भी बिहार की जनता के मन में डर और असुरक्षा का प्रतीक है, और तेजस्वी यादव को उनके पिता की राजनीतिक विरासत का प्रतीक बताकर वे मतदाता को आसानी से डरा सकते हैं।
3. तेजस्वी के ‘विकास’ के एजेंडे को काटने की रणनीति
तेजस्वी यादव ने इस चुनाव में अपनी रणनीति बदल दी है। उन्होंने ‘A to Z’ की बात करते हुए अपने पुराने ‘यादव-मुस्लिम’ समीकरण से बाहर निकलने की कोशिश की है और सरकारी नौकरी, विकास, पढ़ाई, दवाई पर ध्यान केंद्रित किया है। भाजपा का ‘जंगल राज’ का नैरेटिव इसी सकारात्मक एजेंडे को काटने के लिए लाया गया है।
| तेजस्वी का एजेंडा (सकारात्मक) | बीजेपी का काउंटर-नैरेटिव (नकारात्मक) |
| सरकारी नौकरी (Job) | नौकरी 10 लाख में मिलेगी, जमीन लेकर नौकरी देने की परंपरा लौटेगी। |
| जीविका दीदियों को ₹30,000 (Prosperity) | ये वादे हवाहवाई हैं, राज्य दिवालिया हो जाएगा। |
| विकास और सुशासन (Governance) | लालू का ‘जंगल राज’ वापस आएगा, कानून-व्यवस्था ध्वस्त होगी। |
| युवा और भविष्य (Youth) | 420 का आरोपी युवा नेता, भ्रष्टाचार की विरासत। |
प्रशांत किशोर का समर्थन:
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (पीके) ने भी तेजस्वी के सीएम फेस बनने पर तंज़ कसते हुए कहा कि इसका मतलब ‘जंगल राज’ की वापसी ही होगा। पीके का यह बयान बीजेपी के नैरेटिव को और बल देता है, क्योंकि वह खुद को दोनों गठबंधनों से अलग बताते हैं।
4. तेजस्वी और आरजेडी का बचाव: यह ‘एनकाउंटर राज’ है
‘जंगल राज’ के आरोपों पर तेजस्वी यादव और आरजेडी ने पलटवार करते हुए इसे वर्तमान NDA सरकार का ‘एनकाउंटर राज’ करार दिया है।
- वर्तमान कुशासन: आरजेडी प्रवक्ता ने कहा कि बिहार में अभी भी अपराध हो रहे हैं और मुख्यमंत्री का ‘इकबाल’ ख़त्म हो गया है।4 तेजस्वी यादव ने अपने आवास के बाहर हुई गोलीबारी की घटना का हवाला देते हुए पूछा था, “अगर वीवीआईपी इलाके में गोलियां चल रही हैं, तो कौन सुरक्षित है? इसे ‘जंगल राज’ नहीं तो क्या कहेंगे?”
- विकास पर ध्यान भटकाना: आरजेडी का कहना है कि बीजेपी के पास विकास और रोज़गार के मुद्दे पर कोई जवाब नहीं है, इसलिए वह जानबूझकर पुराने ‘जंगल राज’ के मुद्दे को उठाकर जनता का ध्यान भटका रही है।
- न्यायिक हस्तक्षेप: आईआरसीटीसी घोटाले पर आरजेडी का कहना है कि चुनाव के समय ऐसे न्यायिक मामलों को उठाना NDA की घबराहट को दर्शाता है, क्योंकि तेजस्वी की लोकप्रियता बढ़ रही है।
5. राजनीतिक विश्लेषण: चुनाव में ‘जंगल राज’ की कितनी अहमियत?
तेजस्वी यादव की लोकप्रियता के बावजूद, बीजेपी जानती है कि ‘जंगल राज’ का टैग बिहार के शिक्षित वर्ग, व्यापारियों, उद्योगपतियों और उन मतदाताओं पर बहुत गहरा असर डालता है, जिन्होंने लालू-राबड़ी काल की अराजकता को झेला है।
- सीमित प्रभाव? तेजस्वी यादव का जन्म ही उस दौर के बाद हुआ है, इसलिए युवा मतदाता उन्हें सीधे ‘जंगल राज’ से नहीं जोड़ते। युवा पीढ़ी के लिए बेरोज़गारी एक अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
- पुरानी पीढ़ी पर असर: 40 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के मतदाताओं के बीच, विशेषकर सवर्ण और अति-पिछड़े वर्गों में, ‘जंगल राज’ का डर आज भी एक बड़ा कारक है। बीजेपी इसी वर्ग को मजबूती से बांधे रखना चाहती है।
- नीतीश की विरासत: ‘जंगल राज’ पर हमला करके बीजेपी अप्रत्यक्ष रूप से नीतीश कुमार के ‘सुशासन बाबू’ की छवि को भी मज़बूत कर रही है, भले ही नीतीश अब गठबंधन में न हों, लेकिन ‘जंगल राज’ के विरुद्ध ‘सुशासन’ ही NDA का मूल आधार रहा है।
निष्कर्ष
बिहार का यह चुनाव अब दो विपरीत नैरेटिव के बीच का युद्ध बन गया है:
- तेजस्वी यादव: ‘नया बिहार’ का सपना, रोज़गार, कल्याण और आर्थिक सुरक्षा का एजेंडा।
- भारतीय जनता पार्टी: ‘पुराना बिहार’ का डर, कानून-व्यवस्था का पतन और भ्रष्टाचार की विरासत।
भाजपा का ‘जंगल राज’ का आरोप एक सोची-समझी रणनीति है, जिसका उद्देश्य तेजस्वी के सकारात्मक प्रचार पर नकारात्मकता और भय का पर्दा डालना है। यह टैग महिला मतदाताओं और मध्यम वर्ग को भावनात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। इस चुनाव का परिणाम इसी बात पर निर्भर करेगा कि बिहार की जनता अतीत के ‘जंगल राज’ के डर को अधिक महत्व देती है, या तेजस्वी यादव द्वारा दिए गए ‘विकास और रोज़गार’ के भविष्य के वादों पर भरोसा करती है।