पूर्णिया जिले की कसबा (Kasba) विधानसभा सीट पर 2025 के चुनाव में महागठबंधन (कांग्रेस) के मौजूदा विधायक मो. आफाक आलम और NDA (संभवतः BJP या JDU के सहयोगी दल) के बीच कड़ा मुकाबला होने की संभावना है।
पिछले तीन चुनावों (2010, 2015, 2020) में लगातार जीत दर्ज करने वाले मो. आफाक आलम (कांग्रेस) का पलड़ा इस बार भी भारी दिख रहा है, लेकिन जीत का अंतर कम हो सकता है।
विजेता की संभावित जीत के पक्ष में विश्लेषण (महागठबंधन – INC)
संभावित विजेता: मो. आफाक आलम (INC/महागठबंधन)
1. लगातार जीत और व्यक्तिगत प्रभाव (TINA Factor):
- तीन बार के विधायक: मो. आफाक आलम 2010, 2015 और 2020 में लगातार तीन बार इस सीट से जीत चुके हैं। यह उनकी मजबूत व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय लोकप्रियता और जातिगत समीकरणों पर नियंत्रण को दर्शाता है।
- स्थानीय चेहरा: वह इस क्षेत्र के एक स्थापित और अनुभवी नेता हैं, जिनके सामने NDA को एक ऐसा चेहरा उतारना होगा जो उनके प्रभाव को टक्कर दे सके।
2. मुस्लिम वोट का एकीकरण (Core Vote Bank):
- कसबा एक मुस्लिम बहुल सीट है। सीमांचल क्षेत्र में, मुस्लिम मतदाता आम तौर पर NDA को हराने के लिए सबसे मजबूत धर्मनिरपेक्ष उम्मीदवार के पक्ष में एकजुट होते हैं।
- AIMIM का प्रभाव सीमित: बायसी सीट के विपरीत, कसबा में AIMIM का प्रदर्शन 2020 में काफी कम (लगभग 5,316 वोट) रहा था। इसका मतलब है कि मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा पहले से ही महागठबंधन (आफाक आलम) के पक्ष में केंद्रित है।
- MY (मुस्लिम-यादव) और सवर्ण/अन्य का समर्थन: कांग्रेस के उम्मीदवार को पारंपरिक रूप से मुस्लिम वोटों का मजबूत समर्थन मिलता है, साथ ही महागठबंधन (RJD) के यादव और अन्य वर्गों का समर्थन भी उनके लिए महत्वपूर्ण है।
3. 2020 का बड़ा अंतर:
- 2020 के चुनाव में, आफाक आलम ने LJP के प्रदीप कुमार दास को 17,278 मतों के बड़े अंतर से हराया था। यह अंतर दर्शाता है कि NDA विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण उनके पक्ष में काफी प्रभावी रहा था।
अन्य उम्मीदवारों की संभावित हार के प्रतिकूल तथ्य
1. NDA उम्मीदवार (BJP/JDU/LJP-R)
- स्थानीय गठबंधन का अभाव: 2020 में यह सीट NDA के सहयोगी दल HAM (हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा) के हिस्से में गई थी, जिसे केवल 23,716 वोट मिले और वह तीसरे स्थान पर रहा था। NDA के वोटों का विभाजन LJP (प्रदीप कुमार दास- 60,132 वोट) और HAM में हो गया था, जिससे सीधे तौर पर आफाक आलम को फायदा हुआ।
- वोट ट्रांसफर की चुनौती: यदि NDA इस बार भी सीट सहयोगी (JDU/LJP-R) को देती है, तो BJP के कोर वोट बैंक (सवर्ण/हिंदू) को पूरी तरह से उस सहयोगी उम्मीदवार को स्थानांतरित कराना एक बड़ी चुनौती होगी।
- गैर-मुस्लिम वोट का एकीकरण आवश्यक: NDA को जीतने के लिए गैर-मुस्लिम वोटों को पूरी तरह से एकजुट करना होगा और साथ ही मुस्लिम वोटों में भी सेंध लगानी होगी, जो आफाक आलम की व्यक्तिगत छवि और महागठबंधन के MY समीकरण के कारण मुश्किल है।
- एंटी-इनकम्बेंसी (Anti-Incumbency): यदि NDA प्रदीप कुमार दास (जो 2020 में LJP से लड़े थे और दूसरे स्थान पर थे, लेकिन अब NDA का हिस्सा बन सकते हैं) को टिकट देती है, तो भी उन्हें विधायक के खिलाफ एंटी-इनकम्बेंसी (स्थानीय मुद्दों जैसे पलायन, बाढ़ आदि) का फायदा उठाने के लिए वोटों का मजबूत ध्रुवीकरण करना होगा।
2. तीसरे मोर्चे (AIMIM/अन्य) के उम्मीदवार
- वोट बैंक की सीमा: 2020 के परिणामों से स्पष्ट है कि कसबा में AIMIM की पकड़ बायसी जितनी मजबूत नहीं है। उन्हें केवल 5,316 वोट मिले थे।
- मुस्लिम मतदाता की रणनीति: कसबा के मुस्लिम मतदाता ‘वोट खराब’ करने के बजाय, उस उम्मीदवार को वोट देने की रणनीति अपनाते हैं जो NDA को हराने की सबसे मजबूत स्थिति में होता है। आफाक आलम की तीन बार की जीत ने उन्हें वह “सबसे मजबूत उम्मीदवार” साबित किया है।
- जीत की क्षमता का अभाव: किसी भी तीसरे उम्मीदवार के लिए महागठबंधन के मजबूत चेहरे और NDA के संगठनात्मक ढांचे को एक साथ तोड़ना लगभग असंभव होगा। उनका मुख्य प्रभाव केवल महागठबंधन के वोटों को थोड़ा-बहुत काटकर NDA को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचाना हो सकता है।
निष्कर्ष
कसबा विधानसभा सीट पर मो. आफाक आलम (कांग्रेस/महागठबंधन) को अपनी व्यक्तिगत पकड़, लगातार तीन बार की जीत का इतिहास और मुस्लिम वोटों के मजबूत केंद्रीकरण का सीधा फायदा मिलेगा।
NDA की जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि वे गैर-मुस्लिम वोटों को कितने प्रभावी ढंग से एकजुट करते हैं और क्या वे मो. आफाक आलम के 15 साल के कार्यकाल के खिलाफ मजबूत एंटी-इनकम्बेंसी का माहौल बना पाते हैं। लेकिन मजबूत संगठनात्मक और भावनात्मक समर्थन के कारण आफाक आलम की चौथी बार जीत की संभावना अधिक है।