मधेपुरा जिले की आलमनगर विधानसभा सीट बिहार की राजनीति में एक अनूठा उदाहरण है। यह सीट पिछले तीन दशकों से लगातार एक ही नेता के कब्जे में रही है, जो इसे जेडीयू (JDU) के लिए सबसे सुरक्षित सीटों में से एक बनाती है।
गहन विश्लेषण के आधार पर, एनडीए (JDU) उम्मीदवार नरेंद्र नारायण यादव के 2025 में यह सीट जीतकर अपना रिकॉर्ड आगे बढ़ाने की संभावना बहुत अधिक है।1
विजेता की संभावित जीत के पक्ष में विश्लेषण (NDA – नरेन्द्र नारायण यादव, JDU)
संभावित विजेता: नरेन्द्र नारायण यादव (JDU)
1. लगातार 7 बार जीत का रिकॉर्ड और व्यक्तिगत प्रभुत्व (The Unbeaten Leader):
- अजेय नेता: नरेंद्र नारायण यादव 1995 से लगातार इस सीट से विधायक रहे हैं (2020 तक 7 बार)।2 यह बिहार विधानसभा में किसी एक सीट पर सबसे लंबी लगातार जीतों में से एक है।
- व्यक्तिगत निष्ठा: उनकी यह जीत केवल पार्टी या गठबंधन की लहर पर आधारित नहीं है, बल्कि उनकी मजबूत व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय स्वीकार्यता और जातिगत समीकरणों से ऊपर उठकर काम करने की छवि का परिणाम है। स्थानीय मतदाता उन पर पार्टी से अधिक भरोसा करते हैं।
2. 2020 की निर्णायक जीत का अंतर:
- बड़ा मार्जिन: 2020 के चुनाव में, उन्होंने आरजेडी (RJD) के नवीन कुमार को 28,680 वोटों (लगभग 13.80% अंतर) के बड़े अंतर से हराया था।3 यह अंतर दर्शाता है कि महागठबंधन की मजबूत लहर भी उनके किले को भेद नहीं पाई थी।
- JDU के लिए कोर वोट: उन्हें 2020 में 1 लाख से अधिक वोट (लगभग 4$48.2\%$ वोट शेयर) मिले थे, जो यह साबित करता है कि जेडीयू का पारंपरिक लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) और अति पिछड़ा/महिला वोट बैंक उनके साथ मजबूती से खड़ा है।5
3. जातिगत समीकरणों पर पकड़:
- आलमनगर में मुस्लिम, यादव, राजपूत, ब्राह्मण और कोइरी मतदाताओं की अच्छी संख्या है। यादव स्वयं यादव होते हुए भी, यादव वोट बैंक के एक हिस्से के साथ-साथ गैर-यादव पिछड़ों (EBC) और सवर्णों का एक बड़ा समर्थन प्राप्त करने में सफल रहते हैं, जो उनकी जीत का मूल कारण है।
4. मंत्री पद/वरिष्ठता का लाभ:
- एक वरिष्ठ मंत्री के रूप में (वे कई बार मंत्री रह चुके हैं), उन्होंने क्षेत्र में विकास कार्यों पर फोकस किया होगा। उनकी वरिष्ठता और सरकार में कद मतदाताओं को यह संदेश देता है कि उनके प्रतिनिधि की पहुँच शीर्ष तक है, जिससे स्थानीय समस्याओं का समाधान हो सकता है।
अन्य उम्मीदवार की संभावित हार के प्रतिकूल तथ्य (महागठबंधन – RJD/नवीन कुमार)
मुख्य चुनौती/संभावित उपविजेता: RJD उम्मीदवार (नवीन कुमार)
**1. MY समीकरण का अपर्याप्त होना (The MY Paradox):
- यह सीट आरजेडी के पारंपरिक MY (मुस्लिम-यादव) गढ़ मधेपुरा जिले में है, लेकिन आलमनगर में MY समीकरण भी नरेंद्र नारायण यादव को नहीं हरा पाता है।
- हार का लगातार सिलसिला: 1995 से आरजेडी इस सीट पर कभी नहीं जीती है। यह दिखाता है कि तेजस्वी यादव की लोकप्रियता भी नरेंद्र नारायण यादव की व्यक्तिगत स्वीकार्यता और पकड़ को तोड़ नहीं पाई है।
2. आंतरिक कलह और अनिश्चितता:
- 2025 के चुनाव से पहले ही महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर अनिश्चितता देखी गई है, जहाँ 2020 के उम्मीदवार नवीन कुमार ने RJD के साथ-साथ VIP की ओर से भी नामांकन दाखिल करने की खबरें आई थीं (हालांकि यह सीट अंततः आरजेडी के खाते में ही मानी जाती है)।6 इस तरह की गठबंधन के भीतर की कलह से मतदाताओं में भ्रम पैदा होता है, जिसका सीधा फायदा स्थापित नेता नरेंद्र नारायण यादव को मिलता है।
3. क्षेत्रीय मुद्दों पर विकास की कमी:
- आलमनगर क्षेत्र के प्रमुख मुद्दे बाढ़, जलजमाव, और क्षेत्र में एक भी कॉलेज न होना जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं। अगर आरजेडी इन स्थानीय मुद्दों को जोर-शोर से नहीं उठा पाई और जनता को यह नहीं समझा पाई कि मौजूदा विधायक इन समस्याओं को हल करने में विफल रहे हैं, तो लोग बदलाव का जोखिम लेने के बजाय पुराने, भरोसेमंद चेहरे को ही चुनना पसंद करेंगे।
निष्कर्ष
आलमनगर सीट पर JDU के नरेंद्र नारायण यादव की लगातार जीत का कारण पार्टी से अधिक उनकी व्यक्तिगत छवि और गहरी जड़ें हैं। 2025 के चुनाव में भी यह प्रवृत्ति जारी रहने की संभावना है। आरजेडी को यह सीट जीतने के लिए जमीनी स्तर पर जबरदस्त सत्ता विरोधी लहर पैदा करने की जरूरत होगी, जिसके साथ ही उसे गैर-यादव पिछड़ों और EBC वोटों में भी बड़ी सेंधमारी करनी होगी।
जब तक कोई बड़ी राजनीतिक सुनामी या नरेंद्र नारायण यादव की व्यक्तिगत लोकप्रियता में भारी गिरावट नहीं आती है, तब तक जेडीयू उम्मीदवार नरेंद्र नारायण यादव की जीत की संभावना सबसे मजबूत है, और वह लगातार आठवीं बार यह सीट जीतकर एक नया रिकॉर्ड बना सकते हैं।