पटना, 23 अक्टूबर 2025: बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर विपक्षी महागठबंधन में लंबे समय तक चली सीट बंटवारे की खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व वाले इस गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) ने अंततः अपने 61 उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी कर दी है। यह सूची न केवल महागठबंधन के सीट बंटवारे को औपचारिक रूप देती है, बल्कि उन गंभीर आंतरिक दरारों को भी उजागर करती है, जहाँ कांग्रेस ने सीधे तौर पर गठबंधन के सहयोगियों, खासकर आरजेडी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के उम्मीदवारों के खिलाफ प्रत्याशी उतार दिए हैं।

नेताओं द्वारा इन मुकाबलों को ‘फ्रेंडली फाइट’ (दोस्ताना लड़ाई) कहा जा रहा है, लेकिन चुनावी विश्लेषक इसे गठबंधन की एकता के लिए ‘आत्मघाती’ कदम बता रहे हैं, जिसका सीधा फायदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को होगा।

1. कांग्रेस का दाँव: 61 सीटें और 9 सीटों का बलिदान

2020 के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें उसे केवल 19 सीटों पर जीत मिली थी। इस बार, आरजेडी और वाम दलों की बढ़ती माँगों के बीच, कांग्रेस 61 सीटों पर चुनाव लड़ने पर सहमत हुई।

  • कुल सीटें: 61
  • पिछली बार से अंतर: 9 सीटें कम।

कांग्रेस ने अपने कद्दावर और अनुभवी नेताओं पर भरोसा जताते हुए कई मौजूदा विधायकों को टिकट दिया है, जिनमें बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश कुमार राम (कुटुम्बा), कांग्रेस विधायक दल के नेता शकील अहमद खान (कदवा), और वरिष्ठ नेता अजीत कुमार शर्मा (भागलपुर) शामिल हैं। हालांकि, सीटों की संख्या कम होने के बावजूद, कांग्रेस ने कई ऐसी सीटें भी नहीं छोड़ीं, जिन पर उसकी नज़र थी, जिसके कारण सहयोगी दलों से टकराव हुआ।

2. आरजेडी बनाम कांग्रेस: ‘बड़े भाई’ और ‘छोटे भाई’ में सीधी जंग

कांग्रेस की सूची जारी होने के बाद, यह साफ हो गया है कि कम से कम 6 से 7 महत्वपूर्ण सीटों पर आरजेडी और कांग्रेस के उम्मीदवार आमने-सामने होंगे। यह टकराव आरजेडी द्वारा कुछ सीटों को कांग्रेस के लिए छोड़ने से इनकार करने और कांग्रेस के बागी उम्मीदवारों के नाम वापस न लेने के कारण उत्पन्न हुआ है।

सीट कांग्रेस प्रत्याशी आरजेडी प्रत्याशी टकराव का कारण
वैशाली ई. संजीव सिंह अजय कुशवाहा दोनों दल इस पारंपरिक सीट पर मज़बूत दावेदार हैं।
कहलगांव प्रवीण सिंह कुशवाहा रजनीश आनंद/भारती कांग्रेस का गढ़ मानी जाने वाली सीट पर आरजेडी का दावा।
सिकंदरा (सु.) विनोद चौधरी उदय नारायण चौधरी उदय नारायण चौधरी (आरजेडी) जैसे बड़े नेता के सामने कांग्रेस का टिकट।
सुल्तानगंज ललन यादव चंदन सिन्हा दोनों दलों के उम्मीदवारों ने अंतिम समय तक नाम वापस नहीं लिया।
नरकटियागंज शाश्वत केदार पांडेय दीपक यादव दोनों दलों के बीच वर्चस्व की लड़ाई।
लालगंज आदित्य कुमार राजा शिवानी शुक्ला लालगंज सीट पर अंत तक पेंच फंसा रहा, उम्मीदवार मैदान में डटे रहे।
वारसलीगंज सतीश कुमार/मंटन सिंह अनीता कुमारी दोनों दलों के उम्मीदवारों के बीच सीधा मुकाबला।

विश्लेषण: यह टकराव महागठबंधन के लिए सबसे अधिक चिंता का विषय है। इन सीटों पर दोनों दलों के पारंपरिक वोट बैंक (सवर्ण, मुस्लिम, यादव, दलित) बँट जाएंगे, जिससे सीधे तौर पर एनडीए के उम्मीदवारों को लाभ मिलेगा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने पर्दे के पीछे कई बागी आरजेडी उम्मीदवारों को मनाने की कोशिश की, लेकिन अधिकांश ने नाम वापस लेने से इनकार कर दिया, जिससे ‘दोस्ताना लड़ाई’ एक कड़वी वास्तविकता बन गई है।

3. कांग्रेस बनाम सीपीआई: वाम-कांग्रेस का पुराना पेंच

कांग्रेस की सूची में कम से कम चार सीटें ऐसी हैं, जहाँ उसका सीधा मुकाबला गठबंधन की सहयोगी वाम दल, सीपीआई (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) से है।

सीट कांग्रेस प्रत्याशी सीपीआई प्रत्याशी टकराव का कारण
बछवाड़ा शिव प्रकाश गरीब दास अवधेश कुमार राय यह सीपीआई का मज़बूत गढ़ है, जिसे कांग्रेस नहीं छोड़ना चाहती।
राजापाकर (सु.) प्रतिमा सिंह मोहित पासवान दोनों दलों द्वारा अपने ज़मीनी कैडर की उपेक्षा न करने का दबाव।
करगहर संतोष मिश्रा महेंद्र गुप्ता वाम दल और कांग्रेस दोनों ने अपने उम्मीदवार उतारे।
बिहारशरीफ ओमैर खान शिवकुमार यादव (सीपीआईएमएल) इस सीट पर सीपीआई नहीं, बल्कि सीपीआई (माले) से भी कांग्रेस का टकराव है, जो वाम दलों के साथ भी कांग्रेस के मतभेदों को दर्शाता है।

विश्लेषण: वाम दलों को इस बार महागठबंधन में अधिक सीटें (कुल 30, जिसमें सीपीआई को 9 सीटें) दी गई हैं। इसके बावजूद, कांग्रेस के साथ टकराव यह बताता है कि दोनों ही दलों ने कुछ ऐसी सीटों पर टिकट दे दिए, जिन्हें वे अपने जनाधार वाला क्षेत्र मानते हैं। यह स्थिति भी वोटों के बंटवारे को बढ़ावा देगी और एनडीए की राह आसान करेगी।

4. ‘फ्रेंडली फाइट’ की थ्योरी और गठबंधन का बचाव

महागठबंधन के नेताओं ने इन टकरावों को कम करके आँकने की कोशिश की है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने पटना दौरे के दौरान कहा था कि 5-10 सीटों पर ‘दोस्ताना मुकाबले’ होते रहते हैं और इससे गठबंधन की एकता प्रभावित नहीं होगी।

  • आरजेडी का रुख: आरजेडी भी इस बात पर जोर दे रही है कि यह एकतरफा गठबंधन है और जिन सीटों पर तालमेल नहीं बैठ पाया, वहाँ ‘फ्रेंडली फाइट’ की अनुमति है, लेकिन उम्मीदवार को गठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवार के पक्ष में काम करने की सख्त हिदायत दी गई है।
  • सीपीआई का रुख: सीपीआई नेताओं ने इन टकरावों पर निराशा व्यक्त की है, लेकिन उन्होंने भी गठबंधन से बाहर जाने का कोई संकेत नहीं दिया है।

5. राजनीतिक निहितार्थ और चुनावी नुकसान

कांग्रेस द्वारा 61 उम्मीदवारों की सूची जारी करने के बाद महागठबंधन के भीतर कुल उम्मीदवारों की संख्या 243 विधानसभा सीटों से अधिक होकर लगभग 254 हो गई है। इसका चुनावी परिणाम निम्नलिखित हो सकता है:

  1. वोटों का स्पष्ट बिखराव: लगभग 12-13 सीटों पर महागठबंधन के वोटों का बंटवारा तय है, जिससे ये सीटें एनडीए को ‘वॉकओवर’ मिल सकती हैं।
  2. एकजुटता पर सवाल: चुनाव से ठीक पहले इस तरह के आंतरिक संघर्ष ने एनडीए को यह प्रचारित करने का बड़ा मौका दे दिया है कि महागठबंधन नेतृत्व विहीन है और वह सीटों का बंटवारा भी नहीं कर पाया।
  3. कांग्रेस का आत्म-सम्मान: 61 सीटें मिलने के बावजूद, कांग्रेस ने अपने प्रभाव वाली सीटों पर उम्मीदवार उतारकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह आरजेडी के सामने आत्म-समर्पण नहीं करेगी, भले ही इससे गठबंधन को नुकसान हो।

कुल मिलाकर, कांग्रेस की 61 उम्मीदवारों की सूची महागठबंधन के लिए एक दोधारी तलवार साबित हुई है। यह गठबंधन को एक औपचारिक आकार तो देती है, लेकिन उन आंतरिक दरारों को भी स्थायी बना देती है, जो चुनावी मैदान में गंभीर नुकसान पहुँचा सकती हैं। चुनावी परिणाम तय करेंगे कि नेताओं की ‘फ्रेंडली फाइट’ की थ्योरी सही साबित होती है या यह बिहार में विपक्षी गठबंधन के लिए एक ‘आत्मघाती’ रणनीति।

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