1️⃣ प्रमुख उम्मीदवार और चुनावी समीकरण
| गठबंधन/पार्टी | संभावित/वर्तमान उम्मीदवार | प्रमुख जाति/पहचान | स्थिति और टिप्पणी |
| NDA (BJP) | संजय कुमार गुप्ता (नए उम्मीदवार) | वैश्य | निवर्तमान विधायक अरुण कुमार सिन्हा (कायस्थ) का टिकट कटने के बाद नए चेहरे। |
| महागठबंधन (RJD) | धर्मेंद्र कुमार (संभावित) | यादव | 2020 में उपविजेता रहे। RJD का परंपरागत MY आधार। |
| जन सुराज (PK) | प्रोफेसर केसी सिन्हा | कायस्थ | मशहूर गणितज्ञ। बीजेपी से नाराज़ कायस्थ वोट बैंक को साधने की कोशिश। |
2️⃣ 🌟 NDA (BJP) की संभावित जीत के कारण (अनुकूल तथ्य)
बांकीपुर की तरह, कुम्हरार भी BJP का एक पारंपरिक गढ़ है, जिसके कारण NDA की जीत की संभावनाएँ मज़बूत रहती हैं:
- ऐतिहासिक अजेय रिकॉर्ड: यह सीट पिछले 35 वर्षों से लगातार BJP के पास है, जिसमें 1990 से 2000 तक सुशील कुमार मोदी और उसके बाद लगातार 5 बार (2005-2020) अरुण कुमार सिन्हा विधायक रहे हैं। यह रिकॉर्ड पार्टी के संगठनात्मक आधार और शहरी मतदाताओं के अटूट विश्वास को दर्शाता है।
- सवर्ण-वैश्य वर्चस्व: यह सीट कायस्थ (लगभग 70,000), वैश्य, और ब्राह्मण मतदाताओं के प्रभुत्व वाली है। BJP उम्मीदवार संजय कुमार गुप्ता वैश्य समुदाय से आते हैं, जो BJP का एक मज़बूत कोर वोटर है।
- 2020 की बड़ी जीत: 2020 के चुनाव में, BJP के अरुण कुमार सिन्हा ने RJD के धर्मेंद्र कुमार को 26,463 वोटों के बड़े अंतर से हराया था। यह जीत का अंतर विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती पेश करता है।
- ‘मोदी फैक्टर’ और शहरी मानसिकता: यह पूरी तरह से शहरी क्षेत्र है जहाँ मतदाता स्थानीय जातिगत समीकरणों के बजाय राष्ट्रीय नेतृत्व (प्रधानमंत्री मोदी) और सुशासन के मुद्दों पर वोट करते हैं। यह कारक हमेशा BJP के पक्ष में रहा है।
- कम मतदान प्रतिशत: कुम्हरार में मतदान का प्रतिशत लगातार बहुत कम (2020 में केवल 35.28%) रहा है। कम मतदान में BJP का कोर सवर्ण/शहरी वोटर अधिक सक्रिय होता है, जिससे उन्हें लाभ मिलता है।
3️⃣ 📉 अन्य उम्मीदवारों की हार के कारण (प्रतिकूल तथ्य और आंकड़े)
विपक्ष के लिए कुम्हरार सीट जीतना अत्यंत कठिन है, हालांकि इस बार BJP के सामने एक नई चुनौती है:
- BJP में कायस्थों की नाराज़गी (प्रमुख प्रतिकूल तथ्य): निवर्तमान 5 बार के विधायक अरुण कुमार सिन्हा (कायस्थ) का टिकट काटकर BJP ने संजय कुमार गुप्ता (वैश्य) को उम्मीदवार बनाया है। कुम्हरार में कायस्थ मतदाता निर्णायक (लगभग 70,000) माने जाते हैं। कायस्थ समुदाय की इस नाराज़गी को विपक्ष भुनाने की कोशिश कर रहा है।
- जन सुराज का दांव (वोट कटवा फैक्टर): प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने मशहूर गणितज्ञ प्रोफेसर केसी सिन्हा को मैदान में उतारा है, जो कायस्थ समुदाय से आते हैं। BJP से नाराज़ कायस्थ वोटों का एक बड़ा हिस्सा प्रोफेसर सिन्हा को मिल सकता है। यह कारक BJP के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा सकता है, जिससे मुख्य मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।
- RJD का सीमित जातीय आधार: RJD उम्मीदवार धर्मेंद्र कुमार यादव समुदाय से आते हैं। RJD का मुख्य आधार (यादव, मुस्लिम) यहां पर्याप्त नहीं है। हालांकि इस सीट पर 11.6% मुस्लिम मतदाता RJD के साथ मज़बूती से खड़े रहते हैं, लेकिन यह सवर्ण मतदाताओं की संख्या को चुनौती देने के लिए काफी नहीं है।
- महागठबंधन का कमज़ोर प्रदर्शन: 2020 में 26 हज़ार से अधिक वोटों से हार, और लोकसभा 2024 में भी BJP की भारी बढ़त यह स्पष्ट करती है कि महागठबंधन इस शहरी सीट पर अपनी पकड़ नहीं बना पाया है। RJD की “MY” (मुस्लिम-यादव) राजनीति शहरी मध्यम वर्ग को आकर्षित नहीं कर पाती है।
निष्कर्ष:
कुम्हरार सीट पर BJP के खिलाफ सबसे बड़ी चुनौती महागठबंधन से नहीं, बल्कि कायस्थ वोट बैंक की नाराज़गी और जन सुराज के प्रोफेसर केसी सिन्हा से है, जो उनके कोर वोट में सेंध लगा सकते हैं।
यदि कायस्थ वोटों का बड़ा बिखराव नहीं होता है और वैश्य-ब्राह्मण वोट NDA के साथ एकजुट रहते हैं, तो NDA (BJP) उम्मीदवार संजय कुमार गुप्ता के जीतने की प्रबल संभावना है। हालाँकि, यदि कायस्थों की नाराज़गी बड़े पैमाने पर प्रो. केसी सिन्हा के पक्ष में जाती है, तो मुकाबला अप्रत्याशित रूप से करीबी हो सकता है, पर फिर भी NDA के गढ़ को तोड़ना महागठबंधन के लिए अत्यंत कठिन रहेगा।