1️⃣ प्रमुख उम्मीदवार और मुकाबला
| गठबंधन/पार्टी | संभावित/वर्तमान उम्मीदवार | स्थिति और पृष्ठभूमि |
| NDA (BJP) | संजीव चौरसिया | वर्तमान विधायक। 2015 और 2020 में लगातार दो बार भारी अंतर से जीत दर्ज की। पार्टी का प्रमुख ‘सवर्ण’ चेहरा। |
| महागठबंधन (CPI-ML/RJD) | दिव्या गौतम (संभावित) या नया चेहरा | 2020 में CPI-ML की शशि यादव उपविजेता रही थीं। महागठबंधन इस बार युवा और शिक्षित चेहरा उतारकर मुकाबला कड़ा करने की कोशिश करेगा। |
2️⃣ 🌟 संजीव चौरसिया (BJP) की संभावित जीत के कारण (अनुकूल तथ्य)
वर्तमान विधायक संजीव चौरसिया (BJP) और NDA के पक्ष में उनकी संभावित जीत के निम्नलिखित निर्णायक कारक हैं:
- मज़बूत शहरी और सवर्ण आधार: दीघा सीट उच्च सवर्ण जातियों (कायस्थ, राजपूत, वैश्य) के मतदाताओं के वर्चस्व वाली है, जो पारंपरिक रूप से BJP के मज़बूत समर्थक माने जाते हैं। कायस्थ मतदाता यहां निर्णायक भूमिका में रहते हैं।
- ऐतिहासिक रूप से अभेद्य किला: दीघा विधानसभा सीट 2008 में अस्तित्व में आई और 2015 से यह लगातार BJP के पास है।1 यह सीट BJP के लिए पटना के ‘गढ़’ का हिस्सा है, जहां पार्टी का संगठन मज़बूत है और मतदाता विश्वास गहरा है।
- 2020 की भारी जीत का अंतर: संजीव चौरसिया ने 2020 में CPI-ML उम्मीदवार को 46,073 वोटों के विशाल अंतर से हराया था। यह अंतर दर्शाता है कि यह सीट बीजेपी के लिए कितनी सुरक्षित है।
- कम मतदान प्रतिशत का लाभ: दीघा में मतदाताओं की भागीदारी (2020 में केवल 37.4%) कम रहती है।2 शहरी क्षेत्र में BJP का कोर मतदाता (शिक्षित, मध्यम वर्ग) अक्सर मतदान करने के लिए अधिक प्रेरित होता है, जिसका सीधा लाभ BJP को मिलता है।
3️⃣ 📉 महागठबंधन उम्मीदवार की हार के कारण (प्रतिकूल तथ्य)
महागठबंधन उम्मीदवार की हार के पीछे निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:
- कमज़ोर जातीय समीकरण: महागठबंधन (RJD+वाम दल) का मुख्य आधार MY (मुस्लिम-यादव) और दलित वर्ग है। दीघा में ये मतदाता संख्या में तो हैं, लेकिन सवर्ण मतदाताओं की एकजुटता के सामने इनका प्रभाव कम हो जाता है।
- शहरी मतदाताओं का विरोध: दीघा एक शहरी/अर्ध-शहरी सीट है, जहां मतदाता विकास, सुशासन और कानून व्यवस्था के मुद्दों पर वोट करते हैं। इस क्षेत्र में RJD/वाम दलों को ‘जंगलराज’ की पुरानी छवि से लड़ना पड़ता है, जो शहरी मतदाताओं को NDA की ओर धकेलता है।
- स्थानीय विकास कार्यों पर रोष: स्थानीय जनता ने विधायक पर क्षेत्र से दूर रहने, बाढ़ के दौरान अनुपस्थित रहने और राजीव नगर (1024) भूमि विवाद जैसे स्थानीय मुद्दों को हल न करने का आरोप लगाया है। यह एंटी-इनकम्बेंसी महागठबंधन के लिए एक मौका बन सकता है, लेकिन इस रोष को वोटों में बदलना एक बड़ी चुनौती होगी।
- वाम दल की सीमित अपील: 2020 में महागठबंधन के तहत CPI-ML की उम्मीदवार दूसरे स्थान पर थीं। वाम दलों का आधार ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक मज़बूत है, जबकि दीघा एक शहरी सीट है। यहां वाम दलों की ‘वर्ग संघर्ष’ की विचारधारा की अपील सीमित रहती है।
निष्कर्ष:
दीघा विधानसभा सीट पर NDA (BJP) की स्थिति अत्यंत मज़बूत बनी हुई है। सवर्ण वोट बैंक, शहरी विकास का मुद्दा और 2020 की बड़ी जीत का अंतर BJP के पक्ष में निर्णायक रूप से काम कर रहे हैं।
महागठबंधन (CPI-ML) को यह सीट जीतने के लिए:
- युवा, शिक्षित और स्थानीय मुद्दों पर मुखर उम्मीदवार (जैसे दिव्या गौतम) उतारना होगा।
- कम मतदान वाले क्षेत्रों (जैसे झुग्गी-झोपड़ी/झुग्गी कॉलोनी) के मतदाताओं को भारी संख्या में वोट डालने के लिए प्रेरित करना होगा।
- वर्तमान विधायक के खिलाफ स्थानीय एंटी-इनकम्बेंसी को राष्ट्रीय या राज्य-स्तरीय तेजस्वी लहर के साथ जोड़ना होगा।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में, NDA (BJP) उम्मीदवार संजीव चौरसिया के फिर से जीतने की प्रबल संभावना है।