बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पूर्णिया सदर विधानसभा सीट एक दिलचस्प मुकाबला प्रस्तुत करती है। यह सीट पिछले 25 वर्षों से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का गढ़ रही है, और वर्तमान में विजय कुमार खेमका (BJP) यहाँ के विधायक हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक आँकड़ों और वर्तमान राजनीतिक विश्लेषण के आधार पर, विजय कुमार खेमका (BJP/NDA) की जीत की संभावनाएँ अत्यधिक प्रबल हैं।
विजेता की संभावित जीत के पक्ष में विश्लेषण (NDA – विजय कुमार खेमका)
संभावित विजेता: विजय कुमार खेमका (BJP)
1. भाजपा का अभेद्य किला और वैश्य समुदाय का एकमुश्त समर्थन:
- लगातार 5 बार से जीत: पूर्णिया सदर सीट पर साल 2000 से लगातार भाजपा का कब्जा रहा है। इसमें विजय खेमका से पहले राजकिशोर केसरी विधायक थे। यह स्पष्ट रूप से भाजपा का गढ़ बन चुका है।
- अभेद्य वैश्य वोट बैंक: यह सीट वैश्य (बनिया) समुदाय की बहुलता वाली मानी जाती है, और यह वर्ग परंपरागत रूप से भाजपा का कोर कैडर वोटर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि वैश्य मतदाता एनडीए के खिलाफ किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं देते, यहाँ तक कि अगर महागठबंधन किसी वैश्य उम्मीदवार को भी उतारता है, तो भी यह वोट बैंक भाजपा से दूर नहीं होता।
2. बड़े अंतर से जीत का इतिहास:
- 2020 के विधानसभा चुनाव में, भाजपा के विजय कुमार खेमका ने कांग्रेस की इंदु सिन्हा को 32,154 वोटों के बड़े अंतर से हराया था। यह जीत का अंतर लगभग 17.50% था, जो दिखाता है कि यहाँ भाजपा को हराना महागठबंधन के लिए कितनी बड़ी चुनौती है।
- विजय खेमका स्वयं 2015 और 2020 में लगातार दो बार बड़े अंतर से जीत चुके हैं।
3. ‘मोदी-नीतीश’ फैक्टर और कैडर वोट का स्थायित्व:
- NDA गठबंधन (BJP और JDU) का संयुक्त वोट बैंक और भाजपा का मजबूत संगठनात्मक ढाँचा (कैडर वोट) इस सीट पर निर्णायक भूमिका निभाता है।
- कोई सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) नहीं: स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, विधायक खेमका के खिलाफ कोई बड़ी सत्ता विरोधी लहर नहीं है, और वैश्य समुदाय का एकमुश्त वोट उन्हें एक मजबूत आधार प्रदान करता रहेगा।
4. 2024 लोकसभा चुनाव के बावजूद दबदबा:
- 2024 के लोकसभा चुनाव में पूर्णिया सीट पर निर्दलीय पप्पू यादव ने जीत हासिल की, लेकिन पूर्णिया विधानसभा क्षेत्र के वोटिंग पैटर्न से पता चला कि भाजपा का जनाधार यहाँ कमजोर नहीं हुआ है। विधानसभा चुनाव में मतदाता विधायक के नाम पर वोट करते हैं, और यहाँ खेमका की व्यक्तिगत पकड़ मजबूत है।
अन्य उम्मीदवार की संभावित हार के प्रतिकूल तथ्य (महागठबंधन – कांग्रेस/RJD)
संभावित उपविजेता: महागठबंधन का उम्मीदवार (संभवतः कांग्रेस)
1. MY समीकरण का सीमित प्रभाव:
- पूर्णिया सदर विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम और यादव (MY) मतदाताओं की अच्छी संख्या है, जो RJD का पारंपरिक वोट बैंक है। हालाँकि, यह वोट बैंक इतना निर्णायक नहीं है कि वह अकेले भाजपा के बड़े वैश्य + सवर्ण + EBC गठबंधन को हरा सके।
- 2020 में भी, महागठबंधन (कांग्रेस के उम्मीदवार) ने MY वोटों के बावजूद 32 हजार से अधिक वोटों के अंतर से हार का सामना किया था।
2. पप्पू यादव का सीधा असर नगण्य:
- पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव का प्रभाव पूरे कोसी-सीमांचल में है, लेकिन विधानसभा चुनाव में उनका सीधा दखल पूर्णिया सदर सीट के परिणामों को पूरी तरह पलटने के लिए काफी नहीं है।
- पप्पू यादव का जोर मुख्य रूप से कांग्रेस को आगे बढ़ाने पर है, लेकिन अगर महागठबंधन RJD या किसी अन्य दल से उम्मीदवार उतारता है, तो पप्पू यादव का समर्थन भ्रमित हो सकता है।
3. कमजोर और परिवर्तनशील उम्मीदवार:
- महागठबंधन ने 2020 में कांग्रेस की इंदु सिन्हा को उतारा था, जिन्हें बड़े अंतर से हार मिली थी। इस बार भी अगर कांग्रेस या RJD से कोई नया चेहरा आता है, तो उसके लिए 25 साल पुराने भाजपा के मजबूत किले को तोड़ना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी।
- महागठबंधन में टिकट को लेकर खींचतान (जैसा कि 2024 लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव को लेकर देखा गया) अंतिम समय में उम्मीदवार की जीत की संभावनाओं को कम कर सकती है।
4. जातीय समीकरण को तोड़ने में असमर्थता:
- महागठबंधन यहाँ वैश्य, सवर्ण और EBC वोटों में सेंध लगाने में लगातार असफल रहा है। इन वर्गों के वोट एकमुश्त भाजपा को मिलते हैं। जब तक महागठबंधन इन वोटों में बड़ी दरार नहीं डालता, तब तक पूर्णिया सदर सीट पर जीत हासिल करना लगभग असंभव है।
निष्कर्ष
पूर्णिया सदर विधानसभा सीट भारतीय जनता पार्टी (NDA) के लिए एक सुरक्षित सीट बनी हुई है। विधायक विजय कुमार खेमका की व्यक्तिगत छवि, वैश्य समुदाय का एकमुश्त और अटूट समर्थन, और भाजपा के मजबूत संगठनात्मक आधार के कारण 2025 के चुनाव में उनकी जीत की संभावनाएँ सबसे अधिक हैं। महागठबंधन को यह सीट जीतने के लिए एक चमत्कारी उम्मीदवार की आवश्यकता होगी जो भाजपा के कोर वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सके, जिसकी संभावना कम है।