मधेपुरा जिले की बिहारीगंज विधानसभा सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी और तब से यह लगातार जेडीयू (JDU) का गढ़ बनी हुई है। 2025 में भी यह सीट एनडीए और महागठबंधन के बीच एक कड़े मुकाबले का गवाह बनेगी।
गहन विश्लेषण के आधार पर, यह चुनाव जेडीयू और आरजेडी के प्रत्याशियों के बीच सीधा मुकाबला होगा, जिसमें एनडीए (JDU) उम्मीदवार की स्थिति थोड़ी मजबूत दिखाई देती है।
विजेता की संभावित जीत के पक्ष में विश्लेषण (NDA – निरंजन कुमार मेहता, JDU)
संभावित विजेता: निरंजन कुमार मेहता (JDU) (अगर जेडीयू/एनडीए उन्हें टिकट देता है)
1. लगातार जीत और व्यक्तिगत पकड़ (The Winning Streak):
- दबदबा: निरंजन कुमार मेहता 2015 और 2020 में लगातार दो बार इस सीट से विधायक रहे हैं। इससे पहले 2010 में भी जेडीयू की रेणु कुमारी ने यहाँ जीत दर्ज की थी। यानी, 2010 में सीट के बनने के बाद से लगातार तीन बार JDU का कब्जा रहा है।
- स्थानीय कुर्मी/कुशवाहा नेता: निरंजन कुमार मेहता कुशवाहा समुदाय से आते हैं, जो जेडीयू के कोर वोट बैंक (लव-कुश समीकरण) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 2025 में भी जेडीयू ने उन्हें उम्मीदवार घोषित किया है, जो पार्टी की निरंतरता की रणनीति को दर्शाता है।
2. 2020 की निर्णायक जीत:
- कड़े मुकाबले में जीत: 2020 में, निरंजन कुमार मेहता ने कांग्रेस की हाई-प्रोफाइल उम्मीदवार सुभाषिनी राज राव (दिवंगत शरद यादव की बेटी) को 18,711 वोटों के बड़े अंतर से हराया था। यह जीत दर्शाती है कि शरद यादव जैसे दिग्गज नेता की विरासत भी निरंजन कुमार मेहता के गढ़ को नहीं तोड़ पाई।
- वोट बैंक का स्थायित्व: 2020 में उन्हें लगभग वोट शेयर मिला, जो यह सिद्ध करता है कि एनडीए गठबंधन और जेडीयू का वोट बैंक उनके पक्ष में मजबूती से संगठित रहा।
3. अति पिछड़ा और महिलाओं का समर्थन:
- मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नीतियों के कारण अति पिछड़ा वर्ग और महिला मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा पारंपरिक रूप से जेडीयू के साथ रहता है। निरंजन कुमार मेहता के खुद अति पिछड़ा (कुशवाहा) समाज से आने के कारण उन्हें इस वर्ग का मजबूत समर्थन मिलने की संभावना है।
अन्य उम्मीदवार की संभावित हार के प्रतिकूल तथ्य (महागठबंधन – रेणु कुशवाहा, RJD)
मुख्य चुनौती/संभावित उपविजेता: रेणु कुशवाहा (RJD) (अगर आरजेडी उन्हें टिकट देता है)
1. मजबूत MY (यादव-मुस्लिम) वोट का अपर्याप्त होना:
- बिहारीगंज में यादव और मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी संख्या है, जो आरजेडी का आधार है। हालांकि, निरंजन कुमार मेहता के कुशवाहा वोटों और एनडीए के सवर्ण, अति-पिछड़ा, और ईबीसी वोटों के मजबूत तालमेल के आगे यह समीकरण अकेला जीत नहीं दिला पाता है।
- 2020 में भी हार: पिछले चुनाव में कांग्रेस (महागठबंधन का हिस्सा) की उम्मीदवार वोट शेयर के बावजूद हार गईं, जिससे यह साबित होता है कि महागठबंधन के कोर वोट के अलावा अन्य वर्गों को साधने में वे विफल रहीं।
2. उम्मीदवार की दल-बदल की पृष्ठभूमि:
- आरजेडी की रेणु कुशवाहा इस क्षेत्र की पुरानी नेता हैं और 2010 में जेडीयू के टिकट पर विधायक रह चुकी हैं, लेकिन उन्होंने कई बार दल-बदल किया है (जेडीयू से भाजपा और अब राजद)। बार-बार पार्टी बदलने का रिकॉर्ड मतदाताओं के बीच स्थायित्व और विश्वसनीयता को लेकर संदेह पैदा कर सकता है।
- सीट की दावेदारी पर विवाद: महागठबंधन में यह सीट कांग्रेस या आरजेडी के पास जाएगी, इसको लेकर शुरू में अस्पष्टता थी। इस तरह का आंतरिक तनाव अंतिम उम्मीदवार के प्रचार को प्रभावित करता है।
3. निरंजन मेहता के खिलाफ मजबूत स्थानीय लहर का अभाव:
- भले ही क्षेत्र में बाढ़ और विकास जैसे मुद्दे हों, लेकिन आरजेडी को निरंजन कुमार मेहता के खिलाफ कोई मजबूत, व्यापक सत्ता विरोधी लहर पैदा करने में संघर्ष करना पड़ेगा, खासकर तब जब उनका मुकाबला निरंजन मेहता जैसे दो बार के स्थापित विधायक से हो।
निष्कर्ष
बिहारीगंज सीट पर मुकाबला जेडीयू के निरंजन कुमार मेहता (कुशवाहा) और आरजेडी की रेणु कुशवाहा (कुशवाहा) के बीच कुशवाहा बनाम कुशवाहा के साथ-साथ एनडीए बनाम महागठबंधन की लड़ाई होगी।
निरंजन कुमार मेहता को उनकी लगातार जीत, मौजूदा विधायक के रूप में स्थानीय पहचान, और नीतीश कुमार के मजबूत अति-पिछड़ा/महिला वोट बैंक का लाभ मिलेगा। दूसरी ओर, रेणु कुशवाहा के लिए आरजेडी का एमवाय (MY) वोट बैंक तो मजबूत है, लेकिन उन्हें जेडीयू के कोर कुशवाहा और ईबीसी वोटों में सेंध लगानी होगी।
वर्तमान राजनीतिक और संख्यात्मक विश्लेषण के आधार पर, निरंजन कुमार मेहता (JDU) के इस सीट पर लगातार तीसरी जीत (हैट्रिक) दर्ज करने की संभावना अधिक है।