बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार एक बड़ा इतिहास रचा गया है। चुनाव के पहले चरण में, मतदाताओं ने रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग करके सभी पुराने रिकॉर्ड्स को पीछे छोड़ दिया है।
1. वोटिंग का रिकॉर्ड (ऐतिहासिक आँकड़े)
- कितनी सीटें: पहले चरण में बिहार की 121 सीटों पर 6 नवंबर को मतदान हुआ।
- कितना मतदान हुआ: इस चरण में कुल 65.08% (पैंसठ दशमलव शून्य आठ प्रतिशत) वोटिंग दर्ज की गई है। चुनाव आयोग के अंतिम आंकड़ों में यह आंकड़ा थोड़ा बदल सकता है, लेकिन यह अब तक का सबसे ज़्यादा मतदान प्रतिशत है।
- पहले के मुकाबले कितना ज़्यादा: यह मतदान 2020 के पिछले विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग (57%) से काफी ज़्यादा है। यह लगभग 8% की बड़ी वृद्धि है!
सीधा मतलब: बिहार के लोगों ने लोकतंत्र के इस पर्व में बहुत बड़े उत्साह के साथ भाग लिया है। पहले से कहीं ज़्यादा लोग अपना नेता और अपनी सरकार चुनने के लिए घरों से बाहर निकले।
2. इस रिकॉर्ड वोटिंग का क्या मतलब है? (सियासी मायने)
राजनीति में, जब भी वोटिंग अचानक इतनी ज़्यादा बढ़ जाती है, तो उसके गहरे मायने निकाले जाते हैं। इस रिकॉर्ड मतदान के बाद राजनीतिक गलियारों में दो मुख्य बातें हो रही हैं:
- सत्ता परिवर्तन का संकेत?
- कई राजनीतिक पंडित (जानकार) मानते हैं कि जब लोग बड़ी संख्या में वोट डालने निकलते हैं, तो इसका मतलब है कि वे वर्तमान सरकार से बदलाव चाहते हैं। अगर जनता नाराज़ होती है, तो वह ज़्यादा वोट डालकर अपना गुस्सा दिखाती है।
- सरकार के समर्थन का संकेत?
- वहीं, कुछ लोग कहते हैं कि यह बढ़ा हुआ मतदान सत्तारूढ़ गठबंधन (अभी की सरकार) के लिए मज़बूत समर्थन भी हो सकता है। यानी, जनता काम से खुश है और उसी सरकार को वापस लाना चाहती है।
- निष्कर्ष: इतिहास बताता है कि हमेशा बढ़ी हुई वोटिंग से सरकार नहीं बदलती, लेकिन 5% से ज़्यादा की वृद्धि को अक्सर बदलाव की आहट माना जाता है। इस बार तो लगभग 8% की बढ़ोतरी हुई है।
3. वोटिंग बढ़ने के मुख्य कारण (लोगों का उत्साह)
आखिर क्या वजह रही कि इतनी बड़ी संख्या में लोग वोट डालने निकले? इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:
- युवा और रोज़गार: इस चुनाव में बेरोज़गारी (Jobs) और रोज़गार सबसे बड़ा मुद्दा है। युवाओं ने बड़ी संख्या में वोट डाला, क्योंकि वे उस पार्टी को चुनना चाहते हैं जो उन्हें नौकरी देने का वादा कर रही है।
- महिलाओं की भागीदारी: पहले चरण के मतदान में महिला मतदाताओं का उत्साह देखने लायक था। कई बूथों पर पुरुषों से ज़्यादा संख्या में महिलाएं वोट डालने के लिए कतार में खड़ी थीं। महिलाओं का वोट हमेशा बिहार के चुनाव नतीजों को प्रभावित करता रहा है।
- प्रवासी मजदूर: बिहार के बहुत से लोग रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों में रहते हैं। इस बार, यह चुनाव छठ पर्व के आसपास हो रहा है। छठ से पहले या उसके दौरान बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने घर लौटे हैं, और उन्होंने भी जमकर वोट डाला है।
- जागरूकता और चुनाव आयोग के प्रयास: चुनाव आयोग (Election Commission) ने भी मतदान बढ़ाने के लिए बहुत कोशिशें कीं। लोगों को वोट डालने के लिए प्रेरित किया गया, और मतदान केंद्रों पर शांतिपूर्ण माहौल रहा।
- मतदाता सूची में सुधार: हाल ही में चुनाव आयोग ने मतदाता सूची (Voter List) से फ़र्जी (नकली) और दोहरी एंट्री वाले नाम हटा दिए थे। इससे मतदान प्रतिशत (वोटर टर्नआउट) का आंकड़ा वास्तविक मतदाताओं के आधार पर ज़्यादा दिखा है।
4. कौन हैं प्रमुख उम्मीदवार?
पहले चरण की इन 121 सीटों पर कई बड़े नेताओं का भाग्य ईवीएम (EVM) में कैद हो गया है, जिनके नाम हैं:
- महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव (Raghopur सीट से)
- उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी
- उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा
- नीतीश कुमार मंत्रिमंडल के 16 मंत्री
इन सभी उम्मीदवारों का चुनावी फैसला अब 14 नवंबर को मतगणना (Counting) के बाद पता चलेगा।