बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में अररिया (Araria) सीट पर महागठबंधन (INC-RJD) के उम्मीदवार की जीत की प्रबल संभावना है।

यह आकलन सीट के मजबूत मुस्लिम-बहुल जातीय समीकरण, वर्तमान विधायक की मजबूत पकड़ और 2020 के परिणामों में बड़े जीत के अंतर पर आधारित है।


 

विजेता की संभावित जीत के पक्ष में विश्लेषण (महागठबंधन उम्मीदवार – आबिदुर रहमान, कांग्रेस)

 

अररिया विधानसभा सीट पर महागठबंधन की जीत के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

1. निर्णायक मुस्लिम बहुल मतदाता आधार:

  • जातीय समीकरण: अररिया सीट एक स्पष्ट रूप से मुस्लिम-बहुल सीट है। 2020 के आंकड़ों के अनुसार, यहां मुस्लिम मतदाताओं का हिस्सा 56% से अधिक (लगभग 1.79 लाख) है।
  • महागठबंधन का आधार: यह मतदाता वर्ग परंपरागत रूप से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस (INC) के MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण का मजबूत आधार रहा है।
  • 2020 का स्पष्ट जनादेश: 2020 के चुनाव में, कांग्रेस के आबिदुर रहमान को 1,03,054 वोट मिले, जो कुल वोटों का 54.84% था। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर महागठबंधन के पक्ष में मतदान करते हैं।

2. वर्तमान विधायक की व्यक्तिगत पकड़ और मजबूत जीत का अंतर:

  • लगातार जीत: आबिदुर रहमान ने 2015 और 2020 में लगातार दो बार यह सीट जीती है। यह उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और क्षेत्र में स्थापित राजनीतिक प्रभाव को दर्शाता है।
  • बड़ा जीत का अंतर: 2020 में, उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी (JDU की शगुफ्ता अजीम) को 47,936 वोटों के विशाल अंतर से हराया था। इतना बड़ा अंतर किसी भी सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) या अन्य दलों की चुनौती को बेअसर करने की क्षमता रखता है।
  • वंशवादी प्रभाव: आबिदुर रहमान एक पुराने और प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आते हैं; उनके दादा और पिता भी विधायक/मंत्री रहे हैं, जिसका लाभ उन्हें मिलता है।

3. 2024 लोकसभा चुनाव का रुझान:

  • 2024 के लोकसभा चुनाव में, अररिया विधानसभा क्षेत्र में महागठबंधन (RJD) के उम्मीदवार को एनडीए उम्मीदवार पर 48,278 वोटों की बड़ी बढ़त मिली थी। यह हालिया रुझान दर्शाता है कि क्षेत्र में महागठबंधन की पकड़ और मजबूत हुई है।

 

विपक्षी (एनडीए/JDU) की संभावित हार के प्रतिकूल तथ्य

 

1. वोट विभाजन की समस्या (JDU/NDA):

  • 2020 के चुनाव में, एनडीए में शामिल जनता दल (यूनाइटेड) की उम्मीदवार शगुफ्ता अजीम को केवल 55,118 वोट मिले थे।
  • AIMIM फैक्टर: 2020 में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के उम्मीदवार मोहम्मद राशिद अनवर ने 8,924 वोट हासिल किए थे। अगर 2025 में कोई तीसरा मुस्लिम उम्मीदवार (चाहे AIMIM से हो या निर्दलीय) मैदान में आता है, तो भी इसका सबसे ज्यादा नुकसान एनडीए को नहीं, बल्कि महागठबंधन को हो सकता है, लेकिन अररिया में महागठबंधन का जीत का अंतर इतना बड़ा है कि मामूली विभाजन से उसकी हार मुश्किल है।
  • मुख्य चुनौती: एनडीए के लिए यहां सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह गैर-मुस्लिम वोटों (सवर्ण, ओबीसी, दलित) को पूरी तरह से एकजुट नहीं कर पाता। यदि ये वोट विभाजित होते हैं, तो मुस्लिम वोटों की विशाल संख्या के सामने एनडीए की चुनौती टिक नहीं पाएगी।

2. मुख्य चुनावी मुद्दे का कमजोर पड़ना:

  • अररिया में बाढ़ एक बड़ा मुद्दा है, जिसका सीधा असर मतदाताओं पर पड़ता है। हालांकि, विधायक रहमान खुद मुस्लिम समुदाय से हैं और उनका मजबूत वोट बैंक उन्हें इन स्थानीय मुद्दों के बावजूद जीत दिलाता रहा है।
  • प्रत्याशी की निर्भरता: चूंकि एनडीए/JDU यहां मुस्लिम प्रत्याशी (जैसे शगुफ्ता अजीम) पर निर्भर करता रहा है, इसलिए वोटों का ध्रुवीकरण होने पर गैर-मुस्लिम वोट भी अन्य छोटे दलों में बंट जाते हैं।

3. ऐतिहासिक रूप से कमजोर प्रदर्शन:

  • परिसीमन (2009) के बाद यह सीट मुस्लिम-बहुल हो गई है और तब से महागठबंधन/कांग्रेस यहां मजबूत स्थिति में रही है। एनडीए (भाजपा/जदयू) के लिए यहां लगातार जीत दर्ज करना हमेशा से कठिन रहा है।

निष्कर्ष:

अररिया विधानसभा सीट का चुनावी विश्लेषण स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि महागठबंधन के उम्मीदवार आबिदुर रहमान (कांग्रेस) अपनी मजबूत जातीय समीकरण, भारी जीत के अंतर और हालिया लोकसभा रुझानों के कारण 2025 का चुनाव भी जीतने के लिए सबसे मजबूत दावेदार हैं। एनडीए को इस सीट पर जीत के लिए एक बड़े जातीय ध्रुवीकरण की आवश्यकता होगी, जो वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कठिन दिखाई देता है।

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