जोकीहाट (Jokihat) विधानसभा सीट पर 2025 के चुनाव में महागठबंधन (RJD) के उम्मीदवार शाहनवाज आलम के जीतने की प्रबल संभावना है।
यह सीट हमेशा से पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. तस्लीमुद्दीन के परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही है, और इस बार का मुकाबला भी परिवार और मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण के मजबूत होने के कारण महागठबंधन के पक्ष में जा सकता है।
विजेता की संभावित जीत के पक्ष में विश्लेषण (महागठबंधन उम्मीदवार – शाहनवाज आलम, RJD)
जोकीहाट सीट पर शाहनवाज आलम (RJD) की जीत के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. मजबूत मुस्लिम-बहुल समीकरण का एकीकरण:
- वोट बैंक की वापसी: जोकीहाट एक स्पष्ट रूप से मुस्लिम-बहुल सीट है, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2020 में, AIMIM के शाहनवाज आलम ने RJD के सरफराज आलम को हराकर जीत हासिल की थी।
- महागठबंधन में वापसी: अब शाहनवाज आलम स्वयं AIMIM को छोड़कर RJD (महागठबंधन) में शामिल हो गए हैं और उन्हें ही टिकट मिला है। इससे मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा (जो 2020 में AIMIM के कारण बंटा था) वापस RJD के खाते में एकजुट होने की उम्मीद है।
- MY समीकरण का लाभ: RJD का पारंपरिक मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण यहां सबसे मजबूत राजनीतिक आधार है, जिसका सीधा लाभ शाहनवाज आलम को मिलेगा।
2. वर्तमान विधायक की पकड़ और राजनीतिक विरासत:
- निवर्तमान विधायक: शाहनवाज आलम वर्तमान में विधायक हैं (पिछली बार AIMIM से जीते थे, लेकिन बाद में RJD में शामिल हुए)। विधायक के रूप में उनकी स्थानीय पकड़ और पहचान मजबूत है।
- तस्लीमुद्दीन परिवार का करिश्मा: वह स्वर्गीय तस्लीमुद्दीन के छोटे बेटे हैं। इस परिवार का 1969 से ही इस सीट पर दबदबा रहा है। शाहनवाज आलम की उम्मीदवारी इस विरासत को आगे बढ़ाती है, जिससे उन्हें परिवार के वफादार वोट बैंक का समर्थन मिलेगा।
3. त्रिकोणीय/चतुष्कोणीय मुकाबले से लाभ:
- प्रमुख मुकाबला: इस चुनाव में मुख्य मुकाबला RJD के शाहनवाज आलम, JDU के पूर्व मंत्री मंजर आलम और तस्लीमुद्दीन के दूसरे बेटे सरफराज आलम (जन सुराज) के बीच होने की संभावना है।
- वोट-विभाजन का फायदा: यदि NDA (JDU) और जन सुराज के बीच मुस्लिम वोट बंटते हैं (JDU के मंजर आलम और जन सुराज के सरफराज आलम के कारण), तो यह सीधा फायदा RJD के शाहनवाज आलम को मिलेगा, जो अपने पक्ष में वोटों को सबसे ज्यादा एकजुट करने में सफल हो सकते हैं।
विपक्षी दलों (NDA/JDU और अन्य) की संभावित हार के प्रतिकूल तथ्य
1. एनडीए (JDU) के मंजर आलम के लिए चुनौतियां:
- जातीय समीकरण का अभाव: मंजर आलम भी मुस्लिम उम्मीदवार हैं। NDA को यह सीट जीतने के लिए मुस्लिम वोटों के साथ-साथ गैर-मुस्लिम वोटों (पिछड़े, सवर्ण) को बड़े पैमाने पर एकजुट करना होगा।
- वोट बंटवारे का खतरा: मंजर आलम को तस्लीमुद्दीन परिवार के ही दो प्रभावशाली नेताओं (शाहनवाज आलम और सरफराज आलम) से सीधी चुनौती मिल रही है, जिससे मुस्लिम वोट तीन हिस्सों में बंट सकते हैं।
- पिछला प्रदर्शन: 2020 में, JDU इस सीट पर नहीं लड़ी थी, और 2010 में मंजर आलम की जीत के बाद से यह सीट JDU के हाथ से निकलती रही है। NDA के कोर वोट (गैर-मुस्लिम) भी मुस्लिम उम्मीदवार को लेकर पूरी तरह उत्साहित नहीं हो सकते हैं।
2. सरफराज आलम (जन सुराज) की चुनौती:
- परिवार का आंतरिक संघर्ष: सरफराज आलम की उम्मीदवारी परिवार के वोटों को विभाजित करेगी। 2020 में भी शाहनवाज आलम (AIMIM) ने सरफराज आलम (RJD) को हराया था। इस बार जन सुराज से लड़ने पर, वह केवल वोटों को काटेंगे, जिससे सीधे तौर पर RJD के शाहनवाज आलम को मदद मिलेगी, क्योंकि परिवार के वोटों का बड़ा हिस्सा (My-समीकरण के कारण) RJD के पक्ष में जा सकता है।
- संगठन की कमी: जन सुराज एक नई पार्टी है, जिसके पास RJD या JDU जितना मजबूत संगठनात्मक ढांचा और चुनावी मशीनरी नहीं है, खासकर सीमांचल के इस मुस्लिम-बहुल क्षेत्र में।
3. 2020 के परिणाम का सबक:
- 2020 में, RJD के सरफराज आलम केवल 7,383 वोटों से हारे थे, क्योंकि AIMIM ने मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा काट लिया था। इस बार, वह AIMIM फैक्टर RJD के पक्ष में आ गया है, जिससे शाहनवाज आलम की स्थिति सबसे मजबूत हो गई है।
निष्कर्ष:
जोकीहाट विधानसभा सीट का चुनावी रण इस बार भी बेहद दिलचस्प है, लेकिन महागठबंधन के उम्मीदवार शाहनवाज आलम की स्थिति सबसे मजबूत दिखती है। तस्लीमुद्दीन परिवार की विरासत, RJD के MY समीकरण का एकीकरण, और विपक्षी वोटों के बंटवारे (JDU और जन सुराज के बीच) के कारण उनके जीतने की संभावना सबसे अधिक है। NDA के लिए यह सीट एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी, जब तक कि वह गैर-मुस्लिम वोटों को पूरी तरह से ध्रुवीकृत नहीं कर पाती।