राघोपुर (संख्या 128) विधानसभा सीट बिहार की सबसे हाई-प्रोफाइल सीटों में से एक है, जो वैशाली जिले में स्थित है।1 यह सीट दशकों से लालू परिवार का गढ़ मानी जाती है, जिसने दो मुख्यमंत्री (लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी) और एक उप-मुख्यमंत्री (तेजस्वी यादव) दिए हैं।

संभावित विजेता: तेजस्वी प्रसाद यादव (राष्ट्रीय जनता दल – RJD)2

(यह भविष्यवाणी लालू परिवार के ऐतिहासिक प्रभुत्व, यादव-मुस्लिम समीकरण की मजबूती और तेजस्वी यादव के राष्ट्रीय स्तर के नेतृत्व के कारण की गई है।)

जीत के मुख्य कारण और विश्लेषण (तेजस्वी यादव के पक्ष में तथ्य)

तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
पारंपरिक ‘माय’ (MY) समीकरण की ताकत राघोपुर में यादव मतदाताओं की आबादी लगभग 30% है, जो किसी भी अन्य जाति समूह से कहीं अधिक है। इसके अलावा, मुस्लिम मतदाता भी लगभग 15.10% हैं। यह संयुक्त 45% का मजबूत आधार पारंपरिक रूप से लालू परिवार और RJD के साथ मजबूती से खड़ा रहा है।
विशाल जीत का अंतर (2020) 2020 के पिछले चुनाव में तेजस्वी यादव ने भाजपा के सतीश कुमार को 38,174 वोटों के भारी अंतर से हराया था। यह जीत का अंतर (लगभग 19.50%) यह दर्शाता है कि यह सीट लालू परिवार के लिए एक अत्यंत सुरक्षित सीट है, जिसे भेदना NDA के लिए एक बड़ी चुनौती है।
महागठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा तेजस्वी यादव न केवल स्थानीय विधायक हैं, बल्कि पूरे महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार भी हैं। इससे उनके लिए सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि पूरे राज्य का समर्थन एकजुट होता है। मतदाता उन्हें केवल एक विधायक के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के मुख्यमंत्री के रूप में वोट देते हैं।
लालू परिवार की राजनीतिक विरासत लालू प्रसाद यादव (दो बार विधायक) और राबड़ी देवी (तीन बार विधायक) के साथ, यह सीट लालू परिवार की राजनीतिक विरासत का प्रतीक है। मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा इसे परिवार की अस्मिता से जोड़कर देखता है, जिससे भावनात्मक जुड़ाव वोट में बदल जाता है।

अन्य उम्मीदवार के न जीतने के प्रतिकूल तथ्य

1. सतीश कुमार (भाजपा/NDA उम्मीदवार) के लिए प्रतिकूल तथ्य

प्रतिकूल तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
यादव वोट बैंक में सेंधमारी की चुनौती भाजपा ने भी यादव उम्मीदवार (सतीश कुमार) को ही मैदान में उतारा है, लेकिन वे RJD के 30% यादव कोर वोट में निर्णायक सेंध लगाने में सफल नहीं हो पाए हैं। यादव मतदाताओं की एक बड़ी संख्या अभी भी लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत के साथ है।
ऐतिहासिक असफलता राघोपुर सीट पर भाजपा का अब तक खाता नहीं खुला है। 2010 में सतीश कुमार ने जदयू के टिकट पर राबड़ी देवी को हराया था, लेकिन तब जदयू और भाजपा का गठबंधन नहीं था। उसके बाद से भाजपा (2015 और 2020) यहां जीत हासिल नहीं कर पाई है।
विकास के दावों पर संदेह यह क्षेत्र दियारा (नदी के किनारे) में स्थित है और अभी भी सड़क और बाढ़ नियंत्रण जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है। NDA के लिए यह प्रचार करना मुश्किल हो जाता है कि उसने इस क्षेत्र में ‘लालू परिवार के गढ़’ में विकास किया है, क्योंकि स्थानीय लोग अभी भी विधायक (तेजस्वी) के क्षेत्र में पर्याप्त विकास न होने की शिकायत करते हैं।
2024 लोकसभा का मिश्रित परिणाम भले ही NDA ने 2024 लोकसभा में बढ़त हासिल की हो, लेकिन राघोपुर में तेजस्वी यादव की व्यक्तिगत अपील और मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी के कारण यह विधानसभा चुनाव का समीकरण बदल सकता है।

2. जन सुराज उम्मीदवार (चंचल कुमार सिंह) के लिए प्रतिकूल तथ्य

प्रतिकूल तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
त्रिकोणीय मुकाबले का कमजोर असर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने यहाँ से उम्मीदवार उतारा है, लेकिन बिहार की राजनीति अभी भी मुख्य रूप से NDA बनाम महागठबंधन के इर्द-गिर्द घूमती है। एक मजबूत तीसरा पक्ष बनाने के लिए आवश्यक बड़ा वोट आधार और संगठनात्मक ढांचा अभी इस सीट पर नहीं बन पाया है।
जातीय समीकरण का अभाव राघोपुर का चुनाव पूरी तरह से जातीय समीकरणों पर आधारित है, जहाँ यादव, मुस्लिम और भूमिहार, पासवान वोट निर्णायक हैं। जन सुराज का उम्मीदवार किसी भी बड़े कोर वोट बैंक को निर्णायक रूप से प्रभावित करने की स्थिति में नहीं है, जिससे वह मुख्य लड़ाई में पीछे रह जाएगा।

निष्कर्ष:

राघोपुर सीट पर तेजस्वी यादव की जीत की संभावनाएँ अत्यंत प्रबल हैं। लालू परिवार का अखंड ‘माय’ वोट बैंक, 2020 के चुनाव में 38,000 वोटों के भारी अंतर और उनके मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होने का तथ्य उनकी जीत को लगभग सुनिश्चित करता है। NDA अपनी पूरी ताकत लगाने के बावजूद, इस गढ़ को भेदने के लिए आवश्यक जातीय गणित को अपने पक्ष में करने में विफल रहा है। तेजस्वी यादव एक बार फिर यह सीट जीतने के लिए सबसे मजबूत दावेदार हैं।

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