वैशाली विधानसभा सीट (संख्या 125) ऐतिहासिक और राजनीतिक दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। यह सीट वर्तमान में जनता दल यूनाइटेड (JDU) के पास है, जिसने 2005 से ही इस पर अपना वर्चस्व बनाए रखा है। 2020 में, JDU के सिद्धार्थ पटेल ने कांग्रेस के संजीव सिंह को 7,413 वोटों (3.90% अंतर) के मामूली अंतर से हराया था। इस बार महागठबंधन में ‘दोस्ताना संघर्ष’ (Friendly Fight) की स्थिति ने मुकाबले को त्रिकोणीय और अनिश्चित बना दिया है।

यहां 2025 के संभावित विजेता और उसका विस्तृत विश्लेषण हिंदी में प्रस्तुत है:


संभावित विजेता: राष्ट्रीय जनता दल (RJD) / महागठबंधन उम्मीदवार (अजय कुशवाहा)

(यह भविष्यवाणी JDU की कम जीत के अंतर, महागठबंधन के मजबूत जातीय समीकरण (M-Y + कुशवाहा) और NDA में संभावित सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) को देखते हुए की गई है।)

जीत के मुख्य कारण और विश्लेषण (फेवर में जाने वाले तथ्य)

तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
कम जीत का अंतर (Weak Margin) 2020 में JDU की जीत का अंतर केवल 7,413 वोट (3.90%) था, जो इस सीट को बेहद संवेदनशील बनाता है। एक मामूली बदलाव भी परिणाम को पलट सकता है।
M-Y (मुस्लिम-यादव) और कुर्मी-कुशवाहा समीकरण वैशाली सीट पर यादव, मुस्लिम और कुर्मी-कुशवाहा वोटर निर्णायक भूमिका में हैं। RJD का M-Y कोर वोट (यादव+मुस्लिम) और JDU से अलग होने के कारण कुशवाहा/EBC वोट का एक हिस्सा महागठबंधन की तरफ जा सकता है। RJD ने अजय कुशवाहा को टिकट देकर ‘लव-कुश’ समीकरण में सेंध लगाने की मजबूत कोशिश की है।
LJP फैक्टर का निष्प्रभावी होना 2020 में, चिराग पासवान की LJP ने 33,351 वोट काटकर JDU की जीत के अंतर को कम कर दिया था। इस बार LJP (रामविलास) के NDA के साथ होने से वह वोट सीधे JDU/NDA को मिलेगा, लेकिन JDU के खिलाफ एक मजबूत महागठबंधन उम्मीदवार (RJD) उस वोट को NDA से दूर खींच सकता है।
सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) JDU इस सीट पर लगभग डेढ़ दशक (2005 से) से काबिज है। इस लंबी अवधि के कारण मौजूदा विधायक के खिलाफ एक सत्ता विरोधी लहर स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हो सकती है, जिसका सीधा फायदा RJD को मिलेगा।

अन्य उम्मीदवार (सिद्धार्थ पटेल/JDU/NDA) के न जीतने के प्रतिकूल तथ्य

प्रतिकूल तथ्य एवं सांख्यिकी विश्लेषण एवं कारण
महागठबंधन में ‘दोस्ताना टकराव’ (Friendly Fight) सबसे बड़ा नकारात्मक पहलू यह है कि वैशाली सीट पर RJD और कांग्रेस दोनों ने अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं (RJD से अजय कुशवाहा और कांग्रेस से संजीव कुमार)। यदि यह टकराव वोट विभाजन करता है, तो NDA उम्मीदवार आसानी से जीत सकते हैं। 2020 में कांग्रेस उपविजेता थी, इसलिए उनके वोट कटने से JDU को सीधा लाभ होगा।
सिद्धार्थ पटेल की जातीय पृष्ठभूमि JDU के विधायक सिद्धार्थ पटेल (कुर्मी) की मजबूत जातीय पृष्ठभूमि है। JDU पिछड़ों का समीकरण साधकर लंबे समय से इस सीट पर काबिज रहा है। RJD द्वारा कुशवाहा उम्मीदवार देने के बावजूद, कुर्मी वोट JDU के पक्ष में पूरी तरह एकजुट रह सकता है, जिससे RJD का ‘लव-कुश’ दांव कमजोर हो जाएगा।
स्वयंसेवक और पासवान वोट का एकजुट होना हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र में चिराग पासवान का प्रभाव है। SC/पासवान और सवर्ण (जैसे राजपूत) मतदाताओं का मजबूत समर्थन JDU/NDA को मिलेगा, जो M-Y के प्रभाव को संतुलित कर सकता है।
कम जीत का अंतर, लेकिन जीत की निरंतरता भले ही जीत का अंतर कम रहा हो, लेकिन JDU ने लगातार इस सीट पर जीत दर्ज की है (2005 से)। यह संगठनात्मक मजबूती और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ को दर्शाता है, जिसे तोड़ना RJD के लिए चुनौती होगी।

निष्कर्ष:

वैशाली विधानसभा सीट का मुकाबला NDA (JDU) और महागठबंधन (RJD) के बीच कांटे की टक्कर वाला है।

  • RJD की जीत की कुंजी: RJD की जीत पूरी तरह से गठबंधन के वोटों को एकजुट करने पर निर्भर करती है। यदि RJD अपने M-Y कोर वोट और नए कुशवाहा वोट बैंक को मजबूती से साध पाती है, और सबसे महत्वपूर्ण, कांग्रेस अपने उम्मीदवार को बैठाने में सफल होती है, तो RJD की जीत निश्चित है।
  • JDU की जीत की कुंजी: यदि महागठबंधन में फूट बनी रहती है और कांग्रेस उम्मीदवार संजीव सिंह मैदान में रहते हैं (जैसा कि रिपोर्ट किया गया है), तो वोटों का विभाजन JDU के सिद्धार्थ पटेल को कम अंतर से फिर से जीत दिला देगा, भले ही उनके खिलाफ सत्ता विरोधी लहर हो।

वर्तमान में, गठबंधन में आंतरिक खींचतान को देखते हुए, RJD को अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अधिक प्रयास करने होंगे, लेकिन बदलाव की लहर (अगर हो) और जातीय समीकरण उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाते हैं।

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