1️⃣ प्रमुख उम्मीदवार और मुकाबला

गठबंधन/पार्टी उम्मीदवार (संभावित) स्थिति और पृष्ठभूमि
महागठबंधन (RJD) (नया उम्मीदवार, क्योंकि प्रहलाद यादव चुनाव मैदान से बाहर हैं) RJD की जीत अब ‘MY’ समीकरण और तेजस्वी लहर पर निर्भर करेगी।
NDA (JDU/BJP) रामानंद मंडल (JDU) या प्रेम रंजन पटेल (BJP) NDA में यह सीट किस पार्टी को जाएगी, इस पर खींचतान है। 2020 में JDU के रामानंद मंडल उपविजेता रहे थे।
निर्दलीय/अन्य रविशंकर प्रसाद सिंह उर्फ अशोक सिंह (भूमिहार नेता) 2020 में LJP से लड़कर 44,797 वोट लाए थे। इस बार निर्दलीय मैदान में होने से भूमिहार वोटों का बड़ा हिस्सा काट सकते हैं।
अन्य अमित सागर (जनसुराज) कुर्मी समुदाय से आते हैं, जिससे NDA के पारंपरिक कुर्मी-धानुक वोटों में सेंधमारी हो सकती है।

2️⃣ 🏆 NDA उम्मीदवार (संभावित) की जीत के कारण (अनुकूल तथ्य)

चूंकि RJD के दिग्गज नेता प्रहलाद यादव इस बार मैदान से बाहर हैं, इसलिए NDA को इस सीट पर जीत का सबसे बड़ा मौका दिख रहा है।

  • RJD का नेतृत्व संकट: RJD के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनके 5 बार के विधायक और पार्टी के बड़े चेहरे प्रहलाद यादव इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। उनकी अनुपस्थिति में यादव और मुस्लिम (MY) समीकरण को बूथों तक ले जाना RJD के नए उम्मीदवार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी, जिससे एंटी-इनकम्बेंसी का फायदा NDA को मिल सकता है।
  • कुर्मी-भूमिहार ध्रुवीकरण की संभावना: सूर्यगढ़ा में कुर्मी-धानुक और भूमिहार वोटर निर्णायक भूमिका में हैं। यदि NDA किसी मजबूत कुर्मी (जैसे JDU के रामानंद मंडल) या भूमिहार (जैसे BJP के प्रेम रंजन पटेल) उम्मीदवार को मैदान में उतारती है और अपने बागी वोटों को नियंत्रित कर पाती है, तो महागठबंधन के MY समीकरण को चुनौती देना आसान होगा।
  • सत्ता विरोधी लहर (स्थानीय) का RJD पर असर: वर्तमान विधायक (RJD) के खिलाफ स्थानीय लोगों में विकास कार्यों के प्रति नाराजगी है। डिग्री कॉलेज और अनुमंडल की मांग 40 वर्षों से अधूरी है। यदि मतदाता विकास के मुद्दों पर वोट करते हैं, तो यह सीधे तौर पर RJD को नुकसान पहुंचाएगा।
  • एनडीए का संगठित वोट: 2024 के लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र से NDA को बढ़त मिली थी, जो दिखाता है कि बड़े चुनावों में राष्ट्रीय और राज्य नेतृत्व के नाम पर मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा संगठित होता है।

3️⃣ ❌ महागठबंधन (RJD) उम्मीदवार की हार के कारण (प्रतिकूल तथ्य)

RJD के लिए इस सीट को बरकरार रखना बहुत मुश्किल साबित हो सकता है।

  • प्रहलाद यादव की अनुपस्थिति: RJD की जीत की सबसे बड़ी गारंटी प्रहलाद यादव का व्यक्तिगत प्रभाव था। उनके बिना, यादव वोटों को बांधे रखना और पार्टी के नए उम्मीदवार को स्थापित करना एक बड़ी चुनौती है, जिससे RJD का पारंपरिक वोट बैंक कमजोर पड़ सकता है।
  • विकास कार्यों का अभाव: स्थानीय मतदाताओं में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि कई बार विधायक चुनने के बावजूद डिग्री कॉलेज, अनुमंडल, बेहतर स्वास्थ्य केंद्र और गाँव की सड़कों जैसे मूलभूत काम नहीं हुए हैं। यह स्थानीय एंटी-इनकम्बेंसी RJD को भारी नुकसान पहुंचा सकती है।
  • जातीय समीकरण में बिखराव: भूमिहार वोटों को निर्दलीय उम्मीदवार अशोक सिंह अपनी ओर खींचेंगे, वहीं जनसुराज के अमित सागर कुर्मी वोटों में सेंध लगा सकते हैं। इस बिखराव का लाभ NDA को मिल सकता है।
  • त्रिकोणीय/बहुकोणीय मुकाबला: 2020 में भी RJD की जीत का अंतर 10 हजार से कम था, जब LJP के उम्मीदवार अशोक सिंह ने 44 हजार वोट काटकर JDU को भारी नुकसान पहुँचाया था। इस बार अशोक सिंह के निर्दलीय खड़े होने और कुर्मी नेता अमित सागर की उपस्थिति से मुकाबला जटिल हो गया है, जिससे RJD को 2020 वाला लाभ मिलना मुश्किल हो सकता है।

4️⃣ निर्णायक फैक्टर: वोट का बिखराव

सूर्यगढ़ा का परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि निर्दलीय/अन्य उम्मीदवार (अशोक सिंह और अमित सागर) किसका वोट बैंक काटते हैं।

  • RJD के लिए खतरा: यदि RJD का नया उम्मीदवार प्रहलाद यादव जैसा व्यक्तिगत प्रभाव नहीं छोड़ पाता है, और भूमिहार वोट निर्दलीय अशोक सिंह को जाते हैं, तो भी NDA का संगठित कुर्मी/अतिपिछड़ा वोट RJD पर भारी पड़ सकता है।
  • NDA के लिए खतरा: यदि निर्दलीय अशोक सिंह (भूमिहार) और अमित सागर (कुर्मी) दोनों मजबूत होते हैं, तो वे NDA के पारंपरिक वोट बैंक (कुर्मी-भूमिहार) को इस हद तक विभाजित कर देंगे कि RJD का मजबूत MY समीकरण त्रिकोणीय मुकाबले में विजयी हो सकता है।

निष्कर्ष: प्रहलाद यादव की अनुपस्थिति RJD के लिए एक बड़ा झटका है, जबकि NDA में भी टिकट को लेकर खींचतान है। हालांकि, मौजूदा राजनीतिक रुझानों और RJD के खिलाफ स्थानीय एंटी-इनकम्बेंसी को देखते हुए, NDA (संभावित JDU या BJP उम्मीदवार) के लिए यह सीट जीतना आसान हो सकता है, बशर्ते वे अपने बागी वोटों को नियंत्रित कर लें।

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