कटिहार जिले की बरारी विधानसभा सीट बिहार चुनाव 2025 में कांटे की टक्कर के लिए तैयार है। यह सीट अपने अत्यधिक जटिल जातिगत समीकरणों और हर चुनाव में बदलती जीत के लिए जानी जाती है।
गहन विश्लेषण के आधार पर, यह चुनाव पिछली बार की तरह ही बेहद करीबी होगा, लेकिन मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए महागठबंधन (तौकीर आलम, कांग्रेस) के उम्मीदवार के जीतने की संभावना थोड़ी अधिक है।
विजेता की संभावित जीत के पक्ष में विश्लेषण (महागठबंधन – तौकीर आलम, कांग्रेस)
संभावित विजेता: तौकीर आलम (कांग्रेस) (या महागठबंधन का कोई अन्य मुस्लिम उम्मीदवार)
1. “MY” (मुस्लिम-यादव) वोट का ध्रुवीकरण:
- मुस्लिम मतदाता: बरारी में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 30% (लगभग 81,000) है, जो किसी भी उम्मीदवार की जीत या हार तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पारंपरिक रूप से, यह वोट बैंक महागठबंधन के साथ मजबूती से खड़ा रहता है।
- यादव मतदाता: क्षेत्र में यादवों की संख्या भी निर्णायक है, जो RJD (महागठबंधन का मुख्य घटक) का कोर वोट बैंक है। मुस्लिम और यादव मतदाताओं का एक साथ आना महागठबंधन के लिए एक अभेद्य वोट बेस तैयार करता है। 2020 में RJD के नीरज कुमार की हार का अंतर (10,438 वोट) इस बात का संकेत देता है कि यह समीकरण किसी भी समय पलटा जा सकता है।
2. 2020 में कांग्रेस का चुनावी गणित:
- 2020 में यह सीट JDU (NDA) ने जीती थी, लेकिन महागठबंधन से RJD उम्मीदवार नीरज कुमार ने 71,314 वोट पाकर कड़ी टक्कर दी थी।
- इस बार कांग्रेस ने बरारी से तौकीर आलम को उम्मीदवार बनाया है (जैसा कि शुरुआती रिपोर्ट्स में बताया गया है)। मुस्लिम उम्मीदवार होने के नाते, उन्हें मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण का सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है, जिससे NDA उम्मीदवार के लिए मुकाबला करना मुश्किल होगा।
3. सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency):
- मौजूदा विधायक: बिजय सिंह (JDU) पिछले 5 वर्षों से विधायक हैं। राज्य सरकार (NDA) के खिलाफ किसी भी तरह की सत्ता विरोधी लहर का सीधा नुकसान उन्हें उठाना पड़ सकता है, खासकर तब जब उन्होंने पिछली बार केवल 10,438 वोटों के मामूली अंतर से जीत हासिल की थी।
अन्य उम्मीदवार की संभावित हार के प्रतिकूल तथ्य (NDA – बिजय सिंह, JDU)
मुख्य चुनौती/संभावित उपविजेता: बिजय सिंह (JDU)
1. जीत का बहुत छोटा अंतर (2020):
- बिजय सिंह ने 2020 में केवल 5.80% (10,438 वोट) के छोटे अंतर से जीत हासिल की थी। इतना छोटा अंतर इस बात का संकेत है कि उनकी सीट कभी भी पलट सकती है।
- उनकी जीत का मुख्य कारण LJP के विभाश चंद्र चौधरी रहे थे, जिन्होंने NDA से बगावत करके 7,920 वोट काटे थे। ये वोट मुख्य रूप से NDA के पारंपरिक वोट बैंक (राजपूत, ब्राह्मण, भूमिहार) के थे।
2. NDA के सवर्ण और EBC वोटों का गणित:
- JDU का निषाद कार्ड: बिजय सिंह निषाद समुदाय से आते हैं, और JDU उन पर EBC/अति पिछड़ा वर्ग का भरोसा कायम रखने के लिए दांव लगाती है। यह वोट बैंक NDA के लिए महत्वपूर्ण है।
- सवर्ण वोट की चुनौती: बरारी में राजपूत और ब्राह्मण मतदाता भी निर्णायक संख्या में हैं। 2020 में NDA का एक हिस्सा LJP के बागी उम्मीदवार के पक्ष में चला गया था। 2025 में NDA की एकजुटता ही बिजय सिंह की जीत सुनिश्चित कर सकती है। यदि NDA गठबंधन के भीतर (BJP, JDU, LJP) के बीच वोटों का पूर्ण ट्रांसफर नहीं होता है, तो बिजय सिंह की हार लगभग निश्चित है।
3. जातीय विभाजन की जटिलता:
- बरारी का इतिहास बताता है कि यहां 5 बार कांग्रेस, 2-2 बार RJD और BJP ने जीत हासिल की है। इसका मतलब है कि यह सीट किसी एक पार्टी का गढ़ नहीं है।
- मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण: महागठबंधन के मुस्लिम उम्मीदवार के कारण यदि मुस्लिम वोट 90% से अधिक दर से महागठबंधन के पक्ष में एकजुट हो जाते हैं, तो NDA के लिए मुकाबला करना नामुमकिन हो जाएगा, भले ही उनका अपना कोर वोट पूरी तरह से एकजुट हो जाए।
निष्कर्ष
बरारी विधानसभा सीट पर महागठबंधन (कांग्रेस) के उम्मीदवार तौकीर आलम की जीत की संभावना अधिक है। इसका मुख्य कारण मुस्लिम-यादव (MY) वोट बैंक की विशाल संख्या और उनका एक तरफा झुकाव है।
JDU के बिजय सिंह के लिए यह सीट बचाना एक बड़ी चुनौती होगी। उनकी जीत तभी संभव है जब वह LJP के बागी वोटों को पूरी तरह से NDA गठबंधन में वापस ला पाएं और EBC/निषाद वोट को एकजुट रखते हुए सत्ता विरोधी लहर को नियंत्रित कर सकें। 2020 के परिणामों को देखते हुए, यह मुकाबला कांटे का होगा, लेकिन संख्यात्मक लाभ महागठबंधन के पक्ष में है।