1️⃣ प्रमुख उम्मीदवार और चुनावी समीकरण

 

गठबंधन/पार्टी संभावित/वर्तमान उम्मीदवार प्रमुख जाति/पहचान स्थिति और टिप्पणी
NDA (BJP) नंद किशोर यादव (वर्तमान विधायक/अध्यक्ष) या सम्राट चौधरी (प्रदेश अध्यक्ष/उपमुख्यमंत्री) यादव / कुशवाहा नंद किशोर यादव यहाँ से लगातार 7 बार (1995 से 2020) जीत चुके हैं। इस बार सम्राट चौधरी को उतारने की चर्चा भी है।
महागठबंधन (RJD) नया चेहरा (भाजपा नेता का पुत्र?) यादव/अन्य पिछली बार कांग्रेस (INC) उपविजेता थी। इस बार महागठबंधन (RJD) ने सीधे यह सीट लड़ने की रणनीति बनाई है।

 

2️⃣ 🌟 NDA (BJP) की संभावित जीत के कारण (अनुकूल तथ्य)

 

पटना साहिब सीट BJP के लिए सुरक्षित सीटों में से एक है, जिसके कारण NDA की जीत की संभावनाएँ अत्यधिक प्रबल रहती हैं:

  • अजेय व्यक्तिगत रिकॉर्ड: BJP के दिग्गज नेता नंद किशोर यादव इस सीट से 1995 से लगातार 7 बार जीत चुके हैं। उनका ‘व्यक्तिगत विकास’ और ‘जनप्रिय नेता’ की छवि पार्टी के आधार को और मज़बूत करती है।
  • पारंपरिक शहरी गढ़: यह सीट भारतीय जनसंघ के समय से ही भाजपा का गढ़ रही है। यह 100% शहरी निर्वाचन क्षेत्र है जहाँ वैश्य, कायस्थ, ब्राह्मण और शहरी मध्यम वर्ग के मतदाताओं का वर्चस्व है, जो परंपरागत रूप से BJP के कोर वोटर रहे हैं।
  • सर्वाधिक वैश्य मतदाता: इस सीट पर वैश्य मतदाताओं की संख्या सर्वाधिक है, जो BJP का अटूट वोट बैंक है। यह फैक्टर किसी भी विरोधी समीकरण को हावी नहीं होने देता।
  • विकास और सुशासन फैक्टर: यह सीट शहरी है और मतदाता विकास, कानून व्यवस्था तथा राष्ट्रीय नेतृत्व (पीएम मोदी) के नाम पर वोट करते हैं।4 नंद किशोर यादव के कार्यकाल में हुए सड़क निर्माण और बुनियादी ढांचे के काम का सकारात्मक असर है।
  • 2020 का परिणाम: 2020 के चुनाव में, BJP के नंद किशोर यादव ने INC के प्रवीण सिंह को 18,300 वोटों के अंतर से हराया था।5 यह अंतर विपक्ष के लिए बड़ा चुनौतीपूर्ण है।

     


 

3️⃣ 📉 अन्य उम्मीदवारों की हार के कारण (प्रतिकूल तथ्य और आंकड़े)

 

विपक्ष के लिए पटना साहिब सीट जीतना एक दुर्गम चुनौती है, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • RJD का शहरी विरोध: RJD का मुख्य आधार ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण है, लेकिन यह शहरी सीट होने के कारण RJD की ‘जातिगत राजनीति’ और ‘जंगलराज’ की छवि यहां के उच्च-मध्यम वर्ग के मतदाताओं के बीच स्वीकार्य नहीं है।
  • कमज़ोर प्रतिद्वंद्विता का इतिहास: RJD ने 1990 के बाद से यह सीट कभी नहीं जीती। यहाँ तक कि महागठबंधन के घटक दल (INC) भी पिछली बार (2020) 18,300 वोटों के अंतर से हारे थे।6 शहरी मतदाताओं को लुभाने के लिए RJD/कांग्रेस के पास कोई मज़बूत, विश्वसनीय और स्थानीय चेहरा नहीं है।
  • जातिगत विभाजन: इस सीट पर यादव, कोइरी, कुर्मी और मुस्लिम मतदाता अच्छी संख्या में हैं, लेकिन यह वोट बैंक हमेशा एकजुट नहीं रहता है और वैश्य-सवर्ण के विशाल एकीकृत वोट बैंक को चुनौती देने के लिए पर्याप्त नहीं है।
  • नए उम्मीदवार पर दांव: इस बार RJD ने कांग्रेस से यह सीट लेकर खुद लड़ने की रणनीति बनाई है, जिसमें किसी नए चेहरे को उतारने की चर्चा है। BJP के दिग्गज और अनुभवी चेहरे (नंद किशोर यादव/सम्राट चौधरी) के सामने एक नए उम्मीदवार का टिकना अत्यंत कठिन होगा, भले ही वह किसी बड़े नेता का पुत्र हो।
  • अध्यक्ष/उपमुख्यमंत्री फैक्टर: यदि BJP वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष नंद किशोर यादव को फिर से उम्मीदवार बनाती है, या उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को उतारती है, तो उनकी राजनीतिक कद-काठी विपक्ष के किसी भी उम्मीदवार को फीका कर देगी।

निष्कर्ष:

पटना साहिब विधानसभा सीट BJP का एक दुर्जेय किला है जिसे भेदना लगभग असंभव है। यहाँ दशकों से वैश्य-सवर्ण मतदाताओं का BJP के प्रति अटूट विश्वास रहा है, जो ‘मोदी फैक्टर’ और ‘नंद किशोर यादव फैक्टर’ (या संभावित ‘सम्राट चौधरी फैक्टर’) से और भी मज़बूत होता है।

महागठबंधन की नई रणनीति, जिसमें RJD सीधे यह सीट लड़ रही है, इस किले को हिला सकती है, लेकिन तोड़ नहीं सकती। जब तक RJD शहरी मतदाताओं के लिए एक विश्वसनीय विकल्प पेश नहीं करती और वैश्य-सवर्ण वोट बैंक में कोई बड़ा बिखराव नहीं होता, तब तक NDA (BJP) उम्मीदवार की जीत की संभावनाएँ लगभग सुनिश्चित हैं।

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