परिणाम की भविष्यवाणी:

सिकटा विधानसभा सीट पर एक अत्यंत कड़ा और त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा। मौजूदा राजनीतिक समीकरण और गठबंधन की बदलती तस्वीर को देखते हुए, महागठबंधन (Mahagathbandhan) के उम्मीदवार और वर्तमान विधायक, सीपीआई (एमएल) (लिबरेशन) के वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता के अपनी सीट बचाने की अधिक संभावना है।

उनका मुख्य मुकाबला एनडीए (NDA) के उम्मीदवार, जेडीयू के समृद्ध वर्मा से होगा, जिनके पिता दिलीप वर्मा इस सीट से पाँच बार विधायक रह चुके हैं।


 

I. सीपीआई (एमएल) के वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता की जीत के पक्ष में विश्लेषण (अनुकूल तथ्य)

वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता (सीपीआई-एमएल) की जीत की संभावना को मजबूती देने वाले प्रमुख विश्लेषणात्मक कारक निम्नलिखित हैं:

1. एम-वाई + वामपंथ का ठोस आधार

  • जातीय समीकरण (एम-वाई फैक्टर): सिकटा एक ग्रामीण बहुल इलाका है जहाँ यादव और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है। ये दोनों समुदाय पारंपरिक रूप से महागठबंधन के मुख्य आधार हैं।
  • वामपंथ का कैडर और जनाधार: सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ग्रामीण और मजदूर वर्ग के बीच मजबूत संगठनात्मक पकड़ और जनाधार के लिए जानी जाती है। यह पार्टी के कोर वोट बैंक (गरीब, भूमिहीन, मजदूर) को एम-वाई फैक्टर के साथ मिलकर एक दुर्जेय चुनावी ताकत बनाता है।
  • सक्रिय विधायक: वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता एक सक्रिय विधायक रहे हैं और उन्होंने क्षेत्र के मुद्दों, खासकर पीसीसी निर्माण में अनियमितता जैसे मामलों पर विरोध प्रदर्शन किया है, जिससे उनकी छवि ‘जनता के लिए लड़ने वाले’ नेता के रूप में मजबूत हुई है।

2. 2020 की जीत का मनोवैज्ञानिक लाभ

  • ऐतिहासिक सफलता: 2020 में वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता ने एक निर्दलीय (दिलीप वर्मा) को 1$2,302$ वोटों के मामूली अंतर से हराकर, 1967 के बाद इस सीट पर वामपंथ की वापसी कराई थी।2 यह जीत यह साबित करती है कि गठबंधन के भीतर सीपीआई(एमएल) का उम्मीदवार भी एनडीए के मजबूत उम्मीदवार को हरा सकता है।
  • बहुकोणीय मुकाबले का लाभ: 2020 में, जेडीयू के फिरोज अहमद तीसरे स्थान पर थे और वोटों का विभाजन हुआ था। इस बार, अगर एनडीए से दिलीप वर्मा के पुत्र समृद्ध वर्मा मैदान में हैं, तो यह दिलीप वर्मा समर्थक वोटों को (जो पहले निर्दलीय को मिले थे) एनडीए की ओर मजबूत रूप से स्थानांतरित कर सकता है, जिससे मुकाबला कड़ा होगा। हालांकि, महागठबंधन के एक उम्मीदवार की एकजुटता उन्हें बढ़त दिला सकती है।

3. स्थानीय मुद्दे और किसान-मजदूर की सहानुभूति

  • बाढ़ की समस्या: सिकटा हर साल नेपाल से आने वाली बाढ़ की मार झेलता है। वामपंथी दल इन स्थानीय समस्याओं को जोर-शोर से उठाते हैं, जिससे ग्रामीण और किसान मतदाताओं की सहानुभूति उन्हें मिलती है।

 

II. एनडीए (जेडीयू/समृद्ध वर्मा) की हार के विपक्ष में विश्लेषण (प्रतिकूल तथ्य)

जेडीयू/एनडीए उम्मीदवार समृद्ध वर्मा (या कोई अन्य एनडीए उम्मीदवार) की जीत की संभावनाओं को कम करने वाले मुख्य कारक इस प्रकार हैं:

1. एनडीए के भीतर टिकट को लेकर खींचतान

  • सीट पर दावेदारी: सिकटा सीट को लेकर एनडीए गठबंधन (बीजेपी और जेडीयू) में टिकट को लेकर गहन खींचतान चल रही है।3 दोनों ही दल इस पर दावा कर रहे थे। (जेडीयू ने समृद्ध वर्मा को उतारा है।)
  • आंतरिक कलह का खतरा: यदि एनडीए के प्रमुख दलों के कार्यकर्ताओं में टिकट बंटवारे को लेकर असंतोष पैदा होता है, तो इसका सीधा लाभ महागठबंधन को मिलेगा और वोटों का एक हिस्सा सीपीआई (एमएल) के पक्ष में जा सकता है।

2. जातीय समीकरणों का असंतुलन

  • विरोध में कोर वोट: सिकटा में सबसे अधिक संख्या में मौजूद यादव और मुस्लिम मतदाता महागठबंधन के पक्ष में लामबंद होंगे, जिससे जेडीयू/एनडीए उम्मीदवार को उन पर सेंध लगाना मुश्किल होगा।
  • बाहुबली की छवि का दोहराव: समृद्ध वर्मा, पूर्व विधायक दिलीप वर्मा के पुत्र हैं, जो इस सीट से पांच बार जीत चुके हैं। हालांकि पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि मजबूत है, लेकिन अगर दिलीप वर्मा के पूर्व के कार्यकाल के कारण मतदाताओं के मन में एंटी-इनकम्बेंसी या बाहुबली की छवि है, तो इसका नकारात्मक असर समृद्ध वर्मा पर पड़ सकता है, भले ही वह खुद नए चेहरे हों।

3. मजबूत गठबंधन बनाम बिखराव का खतरा

  • महागठबंधन की मजबूती: इस बार सीपीआई (एमएल) लिबरेशन महागठबंधन के तहत लड़ रही है, जिससे उन्हें आरजेडी (यादव वोट) का सीधा और मजबूत समर्थन मिलेगा।
  • 2015 की हार की याद: 2015 में, जेडीयू (तब महागठबंधन में) के फिरोज अहमद ने जीत हासिल की थी।4 2020 में, फिरोज अहमद तीसरे स्थान पर रहे।5 यह दर्शाता है कि जेडीयू (NDA में) की अपनी ताकत उतनी निर्णायक नहीं है, जितनी महागठबंधन के साथ मिलकर होती है।

4. युवा चेहरा और अनुभव की कमी

  • समृद्ध वर्मा राजनीति में एक नए चेहरे हैं।6 हालांकि उनके पिता का प्रभाव है, लेकिन सीपीआई (एमएल) के वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता एक अनुभवी और स्थापित विधायक हैं। पहली बार के उम्मीदवार के लिए एक मौजूदा और सक्रिय विधायक को हराना चुनौतीपूर्ण होगा।

निष्कर्ष: सिकटा की लड़ाई मुख्य रूप से महागठबंधन के वामपंथी आधार और एम-वाई समीकरण बनाम एनडीए के मजबूत कोर वोट और बाहुबली परिवार के प्रभाव के बीच है। एनडीए में टिकट की खींचतान, मजबूत एम-वाई समीकरण और वामपंथी पार्टी के सक्रिय कैडर के कारण, वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता के सिकटा में अपनी जीत दोहराने और महागठबंधन के लिए यह सीट बरकरार रखने की प्रबल संभावना है। मुकाबला बहुत करीबी होगा।

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